मिताली – गीता अस्थाना

——— शिवेंद्र ने ट्रेन के कोच में भरी पैसेंजर के बीच तेज़ आवाज़ में कहा, ‘ कब तुमने मुझे रुपए दिए ‘ उनकी तेज़ आवाज़ से भयभीत सी होकर नीचे देखने लगी। उसकी आंखों में आंसू आ गए। रात्रि का सफर था, सो वह अपने बर्थ पर जाकर लेट गई। काफी देर तक वह जागती … Read more

गर्व – खुशी

नीला एक जिम्मेदार और लाडली बेटी थी पिता आशय और आरजू दोनो की मुराद मांगी बेटी जिस पर दोनों जान छिड़कते थे।नीला का जन्म शादी के 12 साल बाद हुआ।आशय और आरजू दोनो कॉलेज में प्रोफेसर थे।आशय हिंदी पढ़ाते थे और आरजू pshycology । आरजू और आशय की लव मैरिज थी दोनो एक ही कॉलेज … Read more

तू बेमिसाल है – विभा गुप्ता 

 ” बस..बहुत हो चुका तेरा गाना-बजाना..स्कूल से आकर चुपचाप रसोई में जाकर अपनी माँ से खाना पकाना सीख… रंग देखकर तो कोई भी लड़का तुझे पसंद नहीं करेगा,कम से कम घर का कामकाज सीख लेगी तो शायद कोई ढ़ंग का परिवार मिल जाए…।” निधि के घर में घुसते ही उसकी दादी उस पर फट पड़ी … Read more

एक मां की चुप्पी को उसकी कमजोरी मत समझना – स्वाती जैंन

दरवाजे की बेल बजी वैसे ही तान्या बोली -लो आ गई तुम्हारी मां पार्क से , आज ऐसी डांट लगाना रोहित कि तुम्हारी मां पार्क जाना ही भूल जाए !! रोहित ने दरवाजा खोला और यशोदा जी से बोला – मां यह बार – बार पार्क घूमने क्यों चली जाती हो ?? घर में कितने … Read more

आखिर कब तक? – परमा दत्त झा

गोविंद सिर झुकाकर बैठा था जबकि मां बहन भाई सभी सबाल की बौछार कर रहे थे। खासकर छोटे भाई की पत्नी (बहुरिया)का रोकर बुरा हाल था। हुआ यह कि छोटी बहन रानी का विवाह एक एन आर आई लड़के से ठीक किया।लड़का स्वजातीय है और अमेरिका की किसी प्रतिष्ठित कंपनी में काम करता है। करीब … Read more

कलह – लक्ष्मी त्यागी

शांतपुर—नाम के विपरीत, अब वह गाँव शांत नहीं रहा था। चौधरी देवेंद्र सिह जी की हवेली के भीतर उठी एक छोटी-सी ‘कलह’ ने पूरे गाँव की नींद छीन ली थी।  चौधरी देवेंद्र सिंह, उम्र साठ के पार, गाँव के सबसे सम्मानित व्यक्ति माने जाते थे। उनके दो बेटे—राघव और विवेक—एक ही छत के नीचे रहते … Read more

ज़हर का घूंट पीना। – लक्ष्मी त्यागी

सुबह की हल्की धूप आंगन में बिखरी थी, चिड़ियाँ आंगन में पेड़ों पर चहचहा रही थीं किन्तु राधा पर तो जैसे इस वातावरण का कोई असर नहीं था। राधा चुपचाप तुलसी के पौधे में जल चढ़ा रही थी उसकी आँखों में न तो आँसू थे, न ही कोई चमक — बस एक गहरी खामोशी थी, … Read more

कलह – सीमा सिंघी

अरे भाभी मैं तो मायके आई हूं और तुम अपने मायके चल दी यह क्या बात हुई भला। भाभी तुम्हें इतना तो समझना चाहिए कि जब ननद मायके आती है तो भाभी को अपने मायके नहीं जाना चाहिए। क्या तुम्हें अपने मायके से यह संस्कार भी नहीं मिले। शुभ्रा यही नहीं रुकी वह फिर कहने … Read more

कलह – सुदर्शन सचदेवा 

ज़िंदगी बाहर से बहुत खुशहाल लगती थी। बड़ी नौकरी, सुंदर घर, कार, और आधुनिक सुविधाएँ — सब कुछ था। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी चीज़ थी जो धीरे-धीरे उनके घर की दीवारों को खोखला कर रही थी — कलह। हर सुबह आवाज़ों का संग्राम शुरू हो जाता — “तुमने फिर देर कर दी!” “बच्चों … Read more

मुक्ति का मार्ग… – रश्मि झा मिश्रा

“…अम्मा कौशल की बहू है… आशीर्वाद दो…!” अम्मा ने हाथ उठाकर जमुना के सिर पर रख दिया… फिर अचानक भरे गले से, थरथराती आवाज में चिल्ला कर बोली… “आज भी मेरे कंगन दोगी या नहीं… अरे मुझे नहीं दिए, कम से कम बहू को मुंह दिखाई में देने को तो दे दो… सब धोखेबाज हैं… … Read more

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