जरूरत – लतिका श्रीवास्तव

रमिया क्या कर रही है कब से पुकार रही हूं जल्दी से बर्तन धोकर दे  साहब का लंच भी तो बनना है ।तू है तो सुन ही नहीं रही है मालिनी जी ने पीछे वाले आंगन में तेजी से घुसते हुए जोर से कहा तो देखा रमिया अपने जिद मचाते सुबकते तीन वर्ष के पुत्र … Read more

अपनों से तो गैर भले – रश्मि झा मिश्रा 

“…इस बार सोचती हूं, मां पापा की एनिवर्सरी में उन्हें सरप्राइज दिया जाए… वैसे भी उनके नए घर में मुझे रहने का मौका नहीं मिला है… इसी बहाने चार दिन रह भी लूंगी उनके साथ… ठीक है ना रजत…!” “… जो तुम्हें ठीक लगे… देख लो… टिकट कर लेना, या फिर मुझे बता देना…!”  बात … Read more

अपनों से तो गैर भले – स्वाती जैंन

साहिल के  फोन की स्क्रिन पर किसी मोना नाम की लड़की के मैसेज का नोटिफिकेशन देखकर राखी से रहा नहीं गया और वह फोन हाथ में लेकर चेक करने लगी ! साहिल का फोन लॉक था और सहिल वैसे भी अपना पासवर्ड कभी राखी को बताता नहीं था मगर उपर आए नोटिफिकेशन में मोना का … Read more

मैं भी तो एक बेटी हूं। – सीमा गुप्ता

सुबह के साढ़े चार बजे थे। अभी अँधेरा पूरी तरह छँटा नहीं था। अलार्म की घंटी के साथ अनन्या की नींद खुल गई। वह कुछ पल चुपचाप लेटी रही। पास ही सो रहे पति आदित्य की नींद न टूटे, इसलिए वह धीरे से उठी।  नहाने के बाद उसने तुलसी के सामने दीपक जलाया। हाथ जोड़ते … Read more

अभिमान – खुशी

प्रमिला एक बेटे नरेंन  की मां थी उसके पिता गल्फ में नौ करी करते थे। तो उसके पास अनाप-शनाप पैसा था। जिसे वह जैसे चाहे खर्च करती । क्योंकि उसके पति तीन-चार साल। में  घर आता पर महीने में अच्छा पैसा भेजता।जिससे प्रमिला और नरेन  बहुत घमंडी हो गए थे उस पर सोने पर सुहागा … Read more

इतना अभिमान ठीक नहीं – आराधना श्रीवास्तव

शैलजा बस 19 वर्ष की थी जब रमैया की दुल्हन बनकर आई थी । रमैया सीधा-साधा ग्रामीण अंचल में पला- बढा प्रकृति को ही अपना इष्ट देव मानता और खेतों में लहलहाते  फसलों को अन्नदाता ।  जी तोड़ मेहनत करता।  मेहनत तो उसके रंग रंग में बसा था खेती -बाड़ी तथा बीजों का ज्ञान उसे … Read more

इतना अभिमान सही नहीं। – मधु वशिष्ठ

   माधवी बेहद सुंदर पढ़ी-लिखी और और संपन्न परिवार की लड़की थी। अभी उसने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। आजकल लड़कों के लिए लड़की ढूंढना भी इतना सरल काम नहीं है। अच्छी लड़की और अच्छा परिवार देख कर बहुत से रिश्ते भी स्वत: ही आने लगते हैं। ऐसे ही माधवी के लिए बहुत से … Read more

परिवार साथ खाए तो अच्छा लगता है – आरती कुशवाहा

सुबह के पाँच बज रहे थे। रसोई में हल्की-हल्की खटर-पटर की आवाज़ आ रही थी। गैस पर चढ़ी चाय उफान मारने को थी और स्नेहा जल्दी-जल्दी उसे उतारने की कोशिश कर रही थी। आज भी उसने अलार्म बजने से पहले ही आँख खोल ली थी। आदत बन चुकी थी—घर के उठने से पहले उठ जाना, … Read more

विदाई का आँसू – शालिनी तिवारी 

स्टेशन पर गाड़ी के आने की घोषणा होते ही अनन्या का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी भीड़, सामान से भरे ट्रॉली बैग, बच्चों की किलकारियाँ और चायवाले की आवाज़—सब कुछ जैसे अचानक बहुत दूर चला गया हो। वह अपने हाथ में पकड़े टिकट को बार-बार देख रही थी, मानो उस पर लिखा … Read more

मेरी पत्नी मेरी जिंदगी है, और मेरी माँ मेरी जड़। – गरिमा चौधरी

  रसोई में गैस जल रही थी, मसालों की खुशबू फैल रही थी, शारदा देवी ने आँखों पर चढ़े चश्मे को थोड़ा ऊपर किया, फिर धीमे से कमर पकड़कर खड़ी हुईं। घुटने में दर्द था, पर आज दर्द की छुट्टी नहीं थी। आज उनके बेटे सिद्धार्थ का जन्मदिन था। और सिद्धार्थ… बचपन से एक ही चीज़ … Read more

error: Content is protected !!