दामन – कंचन श्रीवास्तव

सभी जगह गंध मची हो खुद की तो चुप बैठना चाहिए, क्योंकि जितनी सफाई दोगे लोगों के मन में शंका और भी  पैठ बनाती जाएगी। हां यही सच्चाई है क्योंकि दुनिया उधर भागती है जिधर भीड़ हो,अकेले चलने वाले के साथ कभी नहीं चलती,यह जानते हुए भी कि सच्चाई इसी के साथ है, क्या करें … Read more

*अनुकरणीय* –  नम्रता सरन “सोना 

राजेश्वरी मैडम टेडी रूम मे ले गई…. वहाँ अलग अलग पालनों मे नन्हे नन्हे शिशु लेटे हुए थे… कोई अपने नन्हे नन्हे हाथ पैर हिला रहा था…कोई सो रहा था…कोई मुस्कुरा रहा था… तो कोई रो रहा था। “मिसेस सिन्हा आईए ..मै आपको बताती हूँ.. कौन बेबी है…कौन बाबा है…उम्र तो लगभग एक माह के … Read more

अम्मा की पाती – कंचन श्रीवास्तव

डोर बेल बजी तो रेखा ‘ आई ‘ कहते हुए किचन से बाहर आई और दरवाजा खोलते ही देखा तो डाकिया खड़ा था। उसे देख उसकी आंखें चौड़ी हो गई।जरूर बैंक का पासबुक आया होगा सोच ही रही थी कि डाकिए ने एक लिफाफा पकड़ाते हुए कहां । बहुरानी चिट्ठी आई है चिट्ठी । तो … Read more

जिम्मेदार – ऋतु अग्रवाल

रम्यक अक्सर ऑफिस देर से आता। बाॅस उससे नाराज रहते। कभी-कभी देर से आने के लिए डाँटते भी पर रम्यक को बर्खास्त नहीं करते थे। एक तो वह मृदु स्वभाव का व्यक्ति था, दूसरे प्रत्येक कार्य को निपुणता के साथ करता था पर इसके अलावा कुछ ऐसा भी था कि बाॅस उसे काम पर रखे … Read more

अनजानें रिश्तें – गुरविंदर टूटेजा

अजय निधी पर चिल्ला रहा था कि…निधी तुम भी ना रोज एक नया रिश्ता बनाकर बैठ जाती हो…तुम्हें समझ क्यूँ नहीं आता कि ये दुनिया सिर्फ फायदा उठाती है…!!    देखो अजय मैं वही जाती हूँ जहाँ कोई मजबूर होता है या जरूरतमंद होता है और मैं अकेली तो हूं नहीं हम पाँच है आप तो … Read more

स्नेह की गरिमा – रीमा महेंद्र ठाकुर

गरिमा सुनो  “ सोनम ने पीछे से आवाज, दी” गरिमा ने पलट कर देखा!  सोनम के पैर की एक चप्पल टूट गयी थी!  वो   लगडा कर  चल रही थी!  उसे शायद ठोकर लगी थी” उसका अंगूठा फट गया था!  अरे कैसे लग गयी ” गरिमा दौडकर उसके पास आयी!  गरिमा ने अपने बैग से … Read more

मसाला दोसा: – मुकेश कुमार (अनजान लेखक)

वो ठेले वाला भी ना अजीब है, सुबह-सुबह तो इडली बेचने साईकिल से आता है और शाम होते ही मोहल्ले में ठेला लगा कर इडली-दोसा दोनों बेचता है। पता नहीं ऐसा क्यों करता है, फ़ालतू में झगड़ा करवा दिया उसने। भुनभुनाते हुए योगेश सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, शायद छत पर ही अब मन का चिड़चिड़ापन ख़त्म … Read more

दूर के ढोल सुहावने – डा. मधु आंधीवाल

आजकल शौर्य का व्यवहार बिलकुल उजड्ड होता जा रहा था । बात बात पर गुस्सा होना और मां रीना और पापा उमेश से उल्टा सीधा बोलना । रीना और उमेश का अकेला बेटा था शौर्य । एक मध्यम वर्गीय परिवार बस दोनों की तमन्ना थी कि शौर्य अच्छी तरह पढ़ ले किसी अच्छी लाइन में … Read more

*वो लम्हें* – सरला मेहता

धड़धड़ाती ट्रेन की आवाज़ नव्या की धड़कने बढ़ा देती है। वह इस नई जगह आकर अपना अतीत भूल जाना चाहती थी। आफ़िसवालों  को पहले ही ताक़ीद दी थी कि शहर के शोरगुल से दूर उसके लिए फ्लेट ढूंढे। यूँ तो यह कालोनी शांत इलाके में है। किंतु रात के आठ बजते ही ट्रेन के गुज़रने … Read more

छतरी – रश्मि स्थापक

“अम्माँ …तू दवा लेने जा रही है न अपनी…मैं भी आता हूँ।” “नौ बरस का हो रहा है…अब तो अम्माँ का पीछा छोड़…।” दौड़ते हुए आए गोपाला का हाथ पकड़ते हुए अम्माँ बोली। “अम्माँ मुझे …नयी वाली छतरी चाहिए।” अम्माँ के संग तेज-तेज चलता हुआ गोपाल बोला। “क्यों रे… अभी-अभी तो सुधरवाई तेरी छतरी… अब … Read more

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