लड़का – लड़की दोस्त नहीं हो सकते – रिंकी श्रीवास्तव

नमिता  घर का सामान लाने के लिए बाजार गयी थी,घर लौटी तो शाम के सात बज गये थे| घर मे घुसी तो देखा उसके पति राकेश आफिस से आ गये थे ,उसने कहा अरे आज आप जल्दी आ गये ,रोज तो आप नौ बजे तक आते हैं | राकेश ने कोई जवाब नही दिया  | … Read more

कड़वे बोल जो बदले सोच – संगीता त्रिपाठी

 बचपन में तो हर दोस्त न्यारा लगता था, जो खेलने को मिल जाये वही पक्का दोस्त। बचपन में कृष्ण -सुदामा की दोस्ती पढ़ी थी। मन के अंदर कुछ ऐसा ही करने का जज्बा जोर मारने लगा था, पर जज्बे से क्या होता। हम भी छोटे थे दोस्त भी छोटे थे।बड़े हुये तो दोस्ती की परिभाषा … Read more

कहां ऐसा यारना – कमलेश राणा 

  सहकारी कृषि पर दुनिया भर के लेख लिखे जा रहे हैं,,कोर्स में भी पढ़ाया जाता है पर असल के धरातल पर अभी यह कोसों दूर है,,   पर आज से 45 साल पहले मैने अपने गाँव में इसका सुन्दर रूप देखा ही नहीं बल्कि मैं खुद इसका हिस्सा भी बनी और इसके आनंद को … Read more

 ” दोस्ती _यारी हो तो ऐसी ” –   रणजीत सिंह भाटिया 

” अरे बेटा राजू.. जा तीन चाय तो तो बोल कर आ और हाँ.. आज जो  बिस्किट बनाए हैं वह भी लेता आ…. ” रेहमत चाचा अपने नौकर राजू से कह रहे थे l उनका पड़ोसी और दोस्त धनीराम भी पास ही में बैठा था l और तीसरे दोस्त मंगल राम को आते देख कर … Read more

 माँ का दूध अमृत है ‘ –  विभा गुप्ता 

  दिव्या की प्रेग्नेंसी का सातवाँ माह लग चुका था।आठवें माह में ट्रेवलिंग करना रिस्क है,यही सोचकर उसकी माँ ने उसे सातवें माह के अंत में ही अपने पास बुलवा लिया था।वैसे तो कोई काॅम्प्लीकेशन नहीं था,सब कुछ नाॅर्मल था लेकिन यह उसकी पहली प्रेग्नेंसी थी, इसलिए कभी नये मेहमान के केयरिंग को लेकर तो कभी … Read more

“जो साथ निभाए वह है दोस्त” – ऋतु अग्रवाल 

“सुनो जी! यह प्रभाकर भैया तो आपके साथ ही नौकरी करते हैं। फिर इनके और हमारे जीवन स्तर में इतना अंतर, मुझे समझ नहीं आता। इनके पास हमारी ही तरह कोई पुश्तैनी जमीन जायदाद भी नहीं है।” आभा ने चाय का कप विवेक को पकड़ते हुए कहा।    “हाँ! पहले मैं भी यही सोचता था पर … Read more

अध्यापक-  -देवेंद्र कुमार

रामेश्वर कभी खाली बस में नहीं चढ़ता। वह हमेशा उस बस में चढ़ता है, जिसमें यात्री ठसाठस भरे होते हैं। कोई उससे इसका कारण जानना चाहे तो वह हँसकर रह जाएगा। जवाब उसकी आंखें दे रही होंगी, ‘क्या किया जाए अपना धंधा ही ऐसा है।’ बस में रामेश्वर की आंखें उस काली टोपी वाले की … Read more

एक मजबूत डोर-दोस्ती – तृप्ति शर्मा

अलमारी के सामने खड़ी पाखी हैंगर में टंगी साड़ियों को देख रही थी। ये वहीं साड़ीयां थी जो उसकी मां ने उसके लिए अपने आशीर्वाद और स्नेह के साथ इकट्ठी की थी।  तभी मोहित की नजर पाखी पर पड़ी, “हां देखती ही रहा कर, पहन लेगी तो 5 गज की साड़ी 2 गज की ना … Read more

अपनेपन की खुशबू – कंचन श्रीवास्तव

डोर बेल ने रीमा का चेहरा खिला दिया। मोबाइल छोड़कर दरवाजे की तरफ लपकी,हो न हो पापा या भाई होंगे। हो भी क्यों न रईस घर की इकलौती बेटी जो ठहरी मुंह से निकला नहीं कि  डिमांड पूरी अब वो चाहे जैसा हो तभी तो यहां उसकी शादी हो गई। कोई तो नहीं चाहता था … Read more

राखी का उपहार – ऋतु गुप्ता

कुसुम बैठी दीवार पर सोना (रक्षाबंधन के चित्र) बना रही थी, तभी उसे पता चला कि उसके भाई कमल की कटने को तैयार खड़ी सारी फसल आग से बर्बाद हो गई।    सुनकर उसका जी हलक को आ गया,उसका मन हुआ  कि अभी भाग कर मायके पहुंच जाएं। उसके मायके ससुराल में कहने को ज्यादा … Read more

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