बेटियां संस्कारों के साथ ही आगे बढ़ पाएंगी – मंजू तिवारी 

क्योंकि यह पुरुष प्रधान समाज है।,,,, पापा सबके घर में केवल कनेक्शन है। आप भी घर में केवल का कनेक्शन करवा लो उसमें बहुत सारे देखने वाले प्रोग्राम आते हैं डीडी नेशनल पर कुछ भी नहीं आता,,,,, बोर हो जाते हैं।  बोर क्यों हो जाते हो,,,, समाचार लिया लगा लिया करो ,,, उसमें सारी दुनिया … Read more

बराबरी – संगीता अग्रवाल

” बहनजी हमें तो आपकी बेटी बहुत पसंद है बस लड़का लड़की दोनों आपस में बात कर लें फिर रिश्ता पक्का कर देते हैं आखिर जिंदगी तो इन्हे ही बितानी है साथ में !” लड़की देखने आई लड़के की मां स्मिता बोली। ” सही कहा बहनजी जाओ श्रीति ( लड़की) देवांश ( लड़का) को टैरेस … Read more

संस्कारहीन – गीता वाधवानी

शायद आप लोगों में से कुछ लोगों को यह विषय पसंद ना आए, लेकिन यह सच्चाई है कि कुछ लोग संस्कार हीन होते हैं और किसी की परवाह नहीं करते।  कहानी-मध्यम वर्गीय परिवार, धर्मशाला में शादी, यह वर्ग कहां कर पाता है बड़े-बड़े आलीशान होटलों में इंतजाम। निम्न वर्ग “हम गरीब हैं” कह कर छूट … Read more

हमारे दिए गए संस्कार जाया नहीं गए –  सविता गोयल

अरूण जी बार बार बरामदे का चक्कर लगा रहे थे ।  उन्हें इस तरह बेचैन देखकर उनकी बहू मीता पूछ बैठी , “क्या बात है पापाजी? आपको कुछ चाहिए क्या?” “नहीं…. बहू… वो … मैं बस यूं ही ….  वैसे तनुज नहीं आया अभी तक आफिस से”   बात घुमाते हुए अरूण जी बोले । … Read more

बुढ़ापा किसी का सगा नहीं होता – अनु अग्रवाल

“अब कान लगाए दरवाजे पर ही खड़े रहोगे या बत्ती बन्द करके सोओगे भी”- मीनाक्षी ने तीखे स्वर में कहा। “बाबूजी के खाँसने की आवाज़ बहुत देर से आ रही है….लगता है तबियत ज्यादा खराब हो रही है…….ज़रा देखकर आता हूँ” बस इतना ही कहना था रामानुज जी का…कि मीनाक्षी बिफर पड़ी…….देखकर क्या आते हो….ऐसा … Read more

संस्कार हमारी थाती – कुमुद चतुर्वेदी

कुहू और पिहू दोनों बहनें रोज स्कूल से शाम चार बजे तक लौटती थीं।फिर एक घंटे में नाश्ता,दूध,फल खाकर पाँच बजे तक ट्यूशन पढ़ने चली जातीं।वहाँ से छैः बजे वापिस आकर थोड़ा टी.वी.या बीतचीत में समय निकल जाता और रात को खाना खाकर पढ़तीं थीं।दस बजे सोने का समय था।सुबह फिर पाँच बजे उठना और … Read more

तुम्हारी मॉं के संस्कार..!! – भाविनी केतन उपाध्याय 

कृष्णकांत जी पलंग पर लेटे-लेटे सोच रहे हैं और उनकी आंखों से अश्रु बह रहे हैं, नन्हा पांच साल का उनका पोता भौतिक जो पास में बैठकर खिलौने से खेल रहा है। उसने अपने दादाजी को रोते देख अपनी मा सुनिता को पुकारा, “मां देखो ना दादाजी रो रहे हैं।” सुनिता जो रसोईघर में कृष्णकांत … Read more

अधूरी तलाश – नीरजा कृष्णा

“हमारे मोहित को तो मीना कुमारी  ही चाहिए। उसे और कुछ नहीं चाहिए। बस उसकी भावी पत्नी पढ़ी लिखी, समझदार और मीना कुमारी  जैसी सुंदर होनी चाहिए।” मदनमोहन जी बड़ी शान से अपने योग्य पुत्र का बखान कर रहे थे। वे लोग श्यामसुंदर जी की बेटी निशि को देखने आए हुए थे। तभी मोहित की … Read more

मैं क्यों चुप रही? – विभा गुप्ता

 कभी-कभी सबकुछ जानते हुए भी हम चुप रह जाते हैं।अपनी चुप्पी को कभी परंपरा तो कभी संस्कार का नाम दे देते हैं और फिर बाद में पछताते हैं कि काशः हम बोल दिये होते।           छोटा- सा मेरा परिवार था।दादी,पापा,माँ, दीदी और मैं।पापा की आमदनी में हम सभी बहुत खुश थें।दादी के नाम की थोड़ी ज़मीन … Read more

खाली लिफ़ाफ़ा – सुधा शर्मा

“कहाँ  खो गए आप?”पूछा सुमि ने।’ क्या कहता उससे?उसके अलावा कहीं मन लगता है  क्या?’ पहली बार चाची के घर मेरी कविताएँ सुनने आई थी, तब देखा था मैंने उसे।तब ही मेरे मन को भा गई थी वह।न जाने कितनी गहराई थी उसकी आँखों में कि मै डूबता चला गया ।सहमी सी, सकुचाई सी, ‘सादगी … Read more

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