“रिश्तों में सन्देह ठीक नहीं”  -अनु अग्रवाल

“रिश्तों के बीच विश्वास का एक पतला धागा होता है”…..तुम्हें इतनी छोटी सी बात समझ में क्यों नहीं आती? रोज़ नये नये पैंतरे अपनाती हो उसे परखने के लिए….ये अपनी बहु पर शक करने की आदत कब छोड़ेंगी आप?- दीनदयाल जी ने अपनी धर्मपत्नी प्रेमा जी से कहा। प्रेमा जी- “अरे कैसी बातें कर रहे … Read more

उम्मीद – माता प्रसाद दुबे

बारिश थम चुकी थी..रामू बहुत खुश था..”अरे मुन्नी बिटिया!बीज वाला थैला लेकर जल्दी आओ?”रामू ने अपनी छोटी बेटी मुन्नी को आवाज दी।”अभी लाती हूं बाबू! मुन्नी बीज वाला थैला रामू के हाथ में थमाते हुए बोली।”बाबू मुझे भी ले चलो अपने साथ?”मुन्नी उछलते हुए बोली।”अच्छा चल बिटिया! रामू मुन्नी को साथ लेकर अपने खेत की … Read more

“ममता की छाँव” – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

 बहुत सालों बाद भतीजे की शादी में वह गांव आई थी। माँ बाबूजी के गुजरने के बाद आने का कोई प्रयोजन ही नहीं था । ऐसा नहीं है कि भाई भाभी ने बुलाया नहीं था। पर इच्छा ही नहीं होती थी या यूं कहें कि बिन माँ का मायका कैसा !  जैसे बिना खुशी का … Read more

बुजुर्ग भी प्यार के हकदार हैं  – कृष्णा विवेक

बड़ा से आँगन के बीच में तुलसी जी  बड़े से गमले में शोभायमान हो रहीं हैं,  दीवार से लगी चारपाई पर कमला देवी जी बैठी है उम्रदराज लगती हैं। चूल्हे पर बन रही खीर की महक पूरे घर में मिठास फैला रहीं हैं, इतने में कमला जी का पोता (रमन) फोन ले के भागता हुआ … Read more

 बद्दुआओं और आहों से मुक्त कर दो मुझे! – मीनू झा

पता नहीं दूसरों की ज़िंदगी में जहर भरकर कैसे लोग अपना जीवन खुशहाल बना पाते हैं,इस आदमी की सूरत देखकर मेरा खून खौल रहा है,अगर सामने आ गया तो पता नहीं मैं इसका क्या कर डालूंगी।बहुत तकलीफ़ दिया इसने मेरे पूरे परिवार को–शीतल सोशल साइट पर प्रभात की प्रोफाइल देख धीरे धीरे बुदबुदाती हुई अंदर … Read more

अपने बेगाने – आरती झा आद्या

मां मां मेरा मेडिकल का रिजल्ट आ गया.. अनूप उछलता हुआ अपने कमरे से निकला। कुछ मत बोलना बेटा। जा ये खुशखबरी सबसे पहले अपनी यशोदा आंटी को बता आ.. अनूप की मां जया कहती है। खुशखबरी है तुम्हें कैसे पता मां। अभी तक तो मैंने तुम्हें रिजल्ट बताया ही नहीं.. अनूप मां के आंचल … Read more

एक तीर दो निशाने – सीमा वर्णिका 

•••••••••••••••••••• “मेहरा साहब आपने वही सुना जो हमने सुना,” गुप्ता जी बोले । “अरे! वही ‘अग्निवीर भर्ती योजना’ की बात कर रहे हैं,” मेहरा साहब व्यंग्यात्मक मुस्कान लाते हुए बोले । ” अच्छा मौका है एक तीर से दो निशाने ,”गुप्ता जी की शातिर आँखों में चमक आ गई । ” सही कह रहे हो … Read more

मेरे मकान मालिक का अपनापन – मीनाक्षी सिंह

उन दिनों मैं कृष्ण की नगरी मथुरा रहा करती थी ! मकान मालिक जाति से भारद्वाज थे ! और बहुत ही सम्पन्न थे ! पंडितों का घर था ! खूब पूजा पाठ होती थी ! मैं केन्द्रिय विद्यालय में शिक्षिका थी ! मेरा आठवां महीना चल रहा था ! पतिदेव दिल्ली नौकरी करते थे ! … Read more

माॅ॑ का जाना – प्रियंका सक्सेना

“सुधा, बेटा माॅ॑ को दूसरा अटैक आया है…” सुबह-सुबह फोन का रिसीवर उठाते ही कानों में पापा की आवाज़ पड़ी तो अश्रुधारा अनायास ही कब नेत्रों से बहकर आंचल भिगोने लगी, पता ही नहीं चला। पास में सोए अमर की नींद भी मुंह अंधेरे बजती फोन की घंटी से टूट चुकी थी, लपककर फोन सुधा … Read more

 लगाव – विनय कुमार मिश्रा

एक साहब के घर का शिफ्टिंग हो रहा था। मैं मूवर्स एंड पैकर्स में शिफ्टिंग कराने का काम करता हूँ। कंपनी में ट्रेनिंग के दौरान जाना था कि इन साहब लोगों को कई बार अपने सहेजे सामान के प्रति भावनात्मक लगाव होता है। अच्छे से सुरक्षित एक स्थान से दूसरे स्थान तक इनके सामान को … Read more

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