कटपुतली – कमल राठौर

  सरिता किचन में अपने पति के लिए लंच तैयार कर रही थी।  बच्चे अभी अभी स्कूल गए थे।  बच्चों के लंच से  फ्री होकर पति का लंच बड़े प्यार से बनाने में बिजी थी।  इतने में संतोष की आवाज आई ” सरिता मेरी घड़ी कहां है ”  ?  किचन में से ही सरिता बोली … Read more

त्यौहार तो बहाना है परिवार की एकता बनाना है – सरगम भट्ट 

इस दिवाली पर रीता ने कुछ अलग ही करने को सोच रखा था , उसने पूरे परिवार को एक करने की कसम जो खा रखी है । पूरे परिवार के नफरत को खत्म करके , सबको प्यार से एक साथ देखना चाहती है । यह उसके लिए एक सपना ही था । हुआ यह था … Read more

“कोमल निष्ठुर”  – ऋतु अग्रवाल 

  “बहुत गुस्सा आता है मुझे अंकुश पर। जब देखो चेहरे पर गंभीरता का आवरण ओढ़े रहते हैं। ना कोई हँसी मजाक, ना प्रेम प्रदर्शन, ना कोई मनुहार। बस सुबह से रात तक एक निश्चित दिनचर्या। नहीं! नहीं! ऐसा नहीं कि वह अपनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करते या मेरी आवश्यकताओं का ख्याल नहीं रखते। असल … Read more

दादी की सीख –  मधु शुक्ला

अनुपमा की आदत थी। जब उसकी कोई फरमाइश माँ नहीं सुनतीं थीं। तो वह दादी से सिफारिश करवाती थी। तीन भाइयों मे सबसे छोटी थी वह, और कुटुम्ब की इकलौती लाड़ली बिटिया थी। उसकी माँ को लगता था। सबसे ज्यादा लाड़ दुलार मिलने के कारण अनुपमा जिद्दी हो रही है। और मनमानी करने लगी है।जो … Read more

सही अर्थ – शालिनी गुप्ता

” पापा, मुझे अपनी बोर्ड की परीक्षा के बाद आगे पढ़ने के लिए विदेश जाना है”, नकुल अपने पापा शिव नारायण से बोला। ” पर बेटा, अपने देश में कितने अच्छे व प्रतिष्ठित संस्थान है जहां से तुम आगे की पढ़ाई अच्छे से कर सकते हो”, शिवनारायण अपने बेटे को समझाते हुए बोले। ” मुझे … Read more

रंगीन पेंसिलें – नताशा हर्ष गुरनानी

बेटे की शादी होने वाली है घर में ढेरों काम अभी बचे हैं पर मन मे इतनी खुशी है की समाएँ नहीं जाती। रोज रात में बैठकर समान लिखना, काम लिखना फिर दूसरे दिन वो काम निपटाना। मुझे रंगो से बहुत प्यार हैं, बहुत ज्यादा इसलिए मै ये सारे काम अपनी रंगीन पेंसिलो से लिखती … Read more

आखिर कब तक? – शालिनी गुप्ता

” सर आपसे रमेश जी मिलने आए हैं”, मेरे चपरासी विनोद ने आकर जब यह मुझसे कहा तब अजीब सा मन हो गया था मेरा लेकिन महज औपचारिकता के कारण मुझे उनसे मिलने बाहर आना पड़ा। ” बेटा, आप मुझे यहां देख कर अवश्य ही असमंजस में पड़ गए होंगे लेकिन क्या करूं? जब सुशीला … Read more

बड़का बिल्ला! – सारिका चौरसिया

संस्मरणों की दुनिया हठात् हमें हमारे अतीत के तरफ़ ले जाती है, जहां हमारे यादों के पिटारे में उम्र के भी दुगुनी-तिगुनी खट्टी-मीठी यादें और कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे से फ़साने करीने से तह लगा कर रखे होते हैं,, कुछ यादें रुला जाती हैं और कुछ हँसी और खिलखिलाहटों की सौगात बनी हस्तांतरित होती है। … Read more

अपना अपना दर्द – विनोद प्रसाद ‘विप्र’

पार्क में एक बेंच पर दो अनजान महिलाएं बैठी थी। पति से अनबन के कारण दोनों महिलाएं परेशान लग रही थी। दोनों के चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही थी। संकोचवश दोनों एक-दूसरे से बात नहीं कर रही थी। पर थोड़ी देर बाद ही पहली महिला ने पहल करते हुए बातचीत का सिलसिला शुरू किया। … Read more

लगन – नताशा हर्ष गुरनानी

“पापा पापा आप ना मम्मा को कुछ कहते क्यो नहीं हमेशा मेरे साथ भेदभाव करती हैं। भैया के लिये हर चीज़ लेकर आती हैं और मेरे लिए कुछ नहीं”  “भैया के लिये सब कुछ और मेरे लिए कुछ भी नहीं” रोते रोते पीहू बोली “अरे अरे मेरी गुडिया रानी ऐसे रोते नही, पापा है ना, … Read more

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