माता पिता भगवान का दूसरा रूप होते हैं – बीना शर्मा

उम्र 65 घुटनों में दर्द कहां तक वह भागदौड़ कर सकती थी अपने और अपने पति के लिए खाना बनाते बनाते सरला देवी मन ही मन यही सोच रही थी जिस उम्र में औरतें आराम से बैठकर खाना खाती हैं उस उम्र में वह अभी घर का सारा काम करती थी।        कितने चाव से उसने … Read more

चकल्लस – रवीन्द्र कान्त त्यागी

“अरे नामाकूलो, मेरा चश्मा कहाँ मर गया” मां जी पूरी ताकत से चिल्लाईं। “फिर ये शैतान की औलाद मेरा चश्मा उठाकर ले गए। मेरा तो इस घर में जीना मुहाल हो गया है। पता नहीं क्या खाकर पैदा किया है इन चुड़ैलों ने औलादों को। सारे दिन मेरे ही सामानों के पीछे पड़े रहते हैं। … Read more

“ये जीवन है…।” – रवीन्द्र कान्त त्यागी

आह… कितनी देर सोया। पता ही नहीं चला। सुबह होने वाली है शायद। मगर… मगर अभी तो अंधेरा सा है। ओह, कई दिन की थकान से पूरा शरीर दुख रहा है। तेरह दिन तक जमीन पर बैठे बैठे। और उसके बाद… उसके बाद मौत का उत्सव। मेरी बीवी की मौत का जश्न। ओह… मेरी परम्पराओं … Read more

शायद माँ हमें माफ कर दें – स्वाति जैन

“पापा, यह क्या? मेरी पत्नी मेरी — मेरी पत्नी लगा रखा है आपने! आपकी पत्नी कोई अनूठी फरिश्ता या परी नहीं है। जब से आए हैं, एक ही राग लगाए बैठे हैं — राखी बांध दी कि इस घर में हिस्सा नहीं देंगे, इन पैसों पर तुम्हारा कोई हक नहीं है, मैं तो मेरे घर … Read more

 सोच – परमा दत्त झा

आज राजेश मिश्र खुशी से भरे हुए थे कारण बहू राधा ने इनको मौत के मुंह से छीन लिया था। हुआ यह कि राजेश बाबू एक शिक्षक थे और बड़ी मुश्किल से बेटे को बी टेक ,एम बी ए कराया था।बेटा पढ़ाई के दौरान एक विजातीय लड़की से प्रेम करने‌ लगा था और इनके मना … Read more

स्त्री से अपेक्षा – शिव कुमारी शुक्ला

दीपा मात्र छब्बीस की उम्र में छः माह के बेटे को गोद में लिए, वैधव्य की चादर ओढ़,सूनी आंखें लिए पिता की चौखट पर पुनः खड़ी थी। शादी को अभी दो बर्ष भी नहीं हुए थे कि यश मात्र एक माह के बच्चे को उसकी झोली में डाल स्वयं काल का ग्रास बन गया। ऑफिस … Read more

झूठा अहम् – शिव कुमारी शुक्ला

आज सुबह सुबह ही परेश और निशा में फिर खट-पट हो गई।यह खट-पट उनके जीवन का आवश्यक अंग बन गई थी और परेश का पूर्ण प्यार पाने के वावजूद भी समय असमय आने वाले तूफानों ने निशा को तोड़कर रख दिया था। निशा आज तक परेश को अपनी मानसिक स्थिति नहीं समझा सकी थी। उनकी … Read more

आग पर तेल छिड़कना –  हेमलता गुप्ता

मैं तो पहले ही कह रही थी कि नूपुर को  अगर बढ़िया कोचिंग में डलवाते तो यह नतीजा नहीं आता, देख लो जैसे तैसे करके 12वीं पास हुई है! मैंने तो अपनी कृति को सबसे टॉप की कोचिंग में डलवाया था और देखो उसका इस साल ही हो सकता है 12वीं के साथ ही मेडिकल … Read more

गृहणी की भी उम्र बढ़ती है – लतिका पल्लवी

सुनाइ नहीं दे रहा है? कब से डोरबेल बज रहा है।कहाँ हो खोलना नहीं है?सुन रही हूँ।आ ही रही हूँ। मुकुंद जी की बात को सुनकर उनकी पत्नी कालिंदी जी नें जबाब देते हुए दरवाजा खोला। दरवाज़े पर पड़ोस के वर्मा जी खडे थे। उन्हें देखकर कालिंदी जी नें कहाँ आइये भाई साहब अंदर आइये. … Read more

अनजाना भय – विभा गुप्ता

          ‘ शांति पार्क ‘ की बेंच पर बैठे सुदर्शन जी अपने दो मित्र- श्रीकांत दुबे और जमनालाल से बातें करते हुए सुबह की धूप का आनंद ले रहें थे कि अचानक कलाई पर बँधी घड़ी पर उनकी नज़र पड़ी तो वो उठकर जाने लगे।      ” इतनी ज़ल्दी चल दिये..आज तो संडे है..क्या आज भी दफ़्तर..।” … Read more

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