स्वाभिमानी बालिका – कांता नेगी 

सुजाता एक नन्ही बालिका थी,जिसकी उम्र मात्र दस साल थी।उसके पिता काम के सिलसिले मे अपने मित्र के साथ दूसरे गांव गए तो थे पर अभी तक वापस नही आए थे। मां पास के जंगल से घास काटकर लाती और उसे बेचकर जो पैसे मिलते उसी से गुजर -बसर हो रही थी। सुजाता के घर … Read more

स्वाभिमान  – दीपा माथुर 

अरे ये कर्टेन ढ़ंग से लगाओ ,और ये क्या ये चेयर अभी तक धुली नहीं। माया जल्दी जल्दी हाथ चलाओ अभी लड़के वाले आते ही होंगे। और बिंदिया ( पुत्र वधू) जाकर मार्या ( बिंदिया की बिटिया) तैयार होने को कह दो। दादी जी बड़े जोश में घर को सेट करवा रही थी आखिर पोती … Read more

“स्वाभिमान  के लिए स्वयं ही पहल करनी पड़ती है।” – अमिता कुचया

आज नीना बहुत ही आहत हुई उसके मन को इतनी पीड़ा हुई कि चाहकर भी किसी से कुछ कह नहीं पा रही थी।काम हर घर में होता है, कभी -कभी देर सबेर तो हो ही जाती है। हमेशा इस बात पर ननद रानी सासुमा को भड़का देती और फिर मां जी मुझे सुनाती कि घर … Read more

माँ की खांसी – नरेश वर्मा 

   रात्रि के बारह बज रहे थे।माँ कीं खांसी का दौरा था कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था ।खांसी के धँसके बहु-बेटे के बग़ल वाले कमरे तक दस्तक दे रहे थे ।  “ उफ़्फ़ ! माँ जी न ख़ुद सोतीं हैं और न किसी को सोने देती हैं ।”- बहु अलका भुनभुनाई।  “ … Read more

कंधों का होना   –  डॉ अंजना गर्ग

तनु को इस शहर में नौकरी ज्वाइन किए 2 साल होने को थे। मां बाबा के साथ वह तब से ही फ्रेंड्स कॉलोनी के फ्लैट में रह रही थी उसकी दुनिया दफ्तर और स्मार्टफोन तक सिमटी हुई थी। कई बार तनु की मां जय श्री उसे कहती कि आसपास वाले लोगों को कभी कभी मिला … Read more

अपनी पहचान – मीनाक्षी सिंह 

हमारे विद्यालय की आंगनवाड़ी की मैडम आज सुबह आयी ! और ये निमंत्रण पत्र देते हुए बोली ! मैडम बेटे की शादी हैँ ! आईयेगा ज़रूर पूरे परिवार के साथ ! घर के बुजूर्गों के नाम से तो हजारों  निमंत्रण देखें हैँ उनका नाम तो सदियों से समाज में प्रतिष्ठित होता हैँ !! बात तो … Read more

स्वाभिमान जाग उठा – संगीता त्रिपाठी 

छनाक…. आवाज सुन कर रमा जी भागी -भागी बाहर के कमरे में आई, जहाँ शीशे का गिलास कई भाग में टूटा पड़ा था। निगाहें कोने में गई, जहाँ पाखी आँखों में आँसू भरे थर -थर काँपती खड़ी थी। रमा जी समझ गई, आज फिर प्रसून और पाखी में झगड़ा हुआ।   “हड़बड़ी में कोई काम ठीक … Read more

दर्द की अधिकता ही दवा बन जाती है – लतिका श्रीवास्तव 

…..सारे समाचार पत्रों की सुर्खियों में थी वो आज…..मीडिया ने चटखारे लेते हुए उसके ऊपर लगे आरोपों को छापा  था….अचानक सबकी नजरों में वो निहायत घटिया भ्रष्ट कामचोर और फर्जी साबित हो गई थी…..उसके खासमखास भी उसके बारे में मनगढ़ंत फर्जी कहानियां यत्र यत्र सुना रहे थे मजे ले रहे थे ..! शमिता के लिए … Read more

“मनहूसियत” (भाग दो) – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा 

माँ,तुमने तो मेरे मूंह की बात कह डाली। मैं तो सोच रहा था पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कहने की। आखिर किस तरह और कैसे कहता…समझ नहीं आ रहा था। चलो अच्छा हुआ तुमने मेरे मन की बात खुद ही कह दिया। छोटी को देख रिया भी खुश हो जायेगी।  मैं तीन टिकट … Read more

मानिनी  –   डॉ. सुनील शर्मा

” मानिनी और वह चली गई! हमारे यहां काम-काज करने वाले गणेशी की नवविवाहिता कुछ ही दिन विवाहोपरांत साथ रहने के बाद एक दिन चली गई मायके. लाख समझाने बुझाने तथा गणेशी के गिड़गिड़ाने का भी कुछ प्रभाव नहीं पड़ा उस मानिनी पर… पीछे मुड़कर देखती हूं तो यादों के पन्ने फड़फड़ाने लगे हैं. साफ … Read more

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