‘कोई भेद नहीं ‘ – विभा गुप्ता

छह महीने पहले जब रीमा के पति का इस कस्बे में तबादला हुआ था तब यहाँ सुविधाओं की कमी थी।साथ ही,एक समस्या यह भी थी कि यहाँ नीची जाति के लोग ज़्यादा थें।उसके ससुराल में जात-पात को बहुत महत्व दिया जाता था।उसकी सास तो छुआछूत को इतना मानती थी कि काम करने वाला या वाली … Read more

एक प्रेम कहानी ऐसी भी – अनिल कान्त 

प्रेरणा कहना चाहती थी की क्यों अपनी जिंदगी ख़राब कर रहे हो…पर वो कह नहीं पाती…कुछ भी कहने से पहले उसे हमेशा ख्याल आ जाता था कि वो ये हक़ तो कब का खो चुकी है…कॉफी ख़त्म हो जाती है…वो कहती है अच्छा अब चलती हूँ मुझे जल्दी जाना है…ह्म्म्म ठीक है चलो मैं भी … Read more

अब भेदभाव नहीं सहूँगी – अर्चना कोहली “अर्चि”

जैसे ही सुमिता ने घर में प्रवेश किया, उसे बिठाकर बिना किसी भूमिका के दादी ने एक ही साँस में कई प्रश्न दाग दिए। मानो कोई परीक्षक परीक्षा ले रहा हो। सभी प्रश्नों का मुख्य केंद्र सिर्फ़ शशांक ही था। “शशांक कैसा लड़का है? कब से तुम्हारे साथ काम करता है? स्वभाव कैसा है? कितनी … Read more

माँ माँ में भेदभाव क्यों – सुभद्रा प्रसाद

“मम्मी जी, मेरी माँ की तबियत खराब है |पापा ने सुबह फोन किया था| मैं दो चार दिन के लिए मायके जाना चाहती हूँ |” नैना ने सुबह की चाय देते हुए अपनी सासू माँ मालती जी से कहा|         “निखिल से पूछ लिया? क्या कहा उसने ? ” मालती जी ने पूछा |           “उन्हें अभी … Read more

बच्चे की समझदारी – कांता नेगी 

रीमा एक पढ़ी-लिखी नवयुवती थी।उसका छोटा-सा परिवार था।वह और उसका पति रीतेश एक ही आफिस मे काम करते थे,घर में सास-ससुर थे।जब वह ब्याह कर आयी काफी खुश थी।सास-ससुर का खूब सम्मान करना पर जब से ससुर को दिल का दौरा पड़ा,उसके स्वभाव में बदलाव आ गया था। रीतेश को उसके पिता ने काफी मेहनत … Read more

दाई माँ – ऋतु गुप्ता

कैसी हो बहुरिया,अब  कौन सा महीना चल रहा है ,बताओ तो.. सोसायटी में सफाई करने आती परसन्दी काकी ने कुछ ही समय पहले रहने आये रितेश की पत्नी रीमा से पूछा… रितेश और रीमा को लगभग 1 वर्ष हो गया था, बिहार के गांव से यहां शहर आए।रितेश यहां किसी कंपनी में कार्यरत है, उसके … Read more

एक सच एक भूल –   सुधा शर्मा

अभी अभी रीमा का फोन आया कि वह अपनी माँ के पास चली आई है।हमेशा के लिए । सीमा के घर से थोड़ी दूर ही था उसका घर । उसका मन नहीं माना वह उसी समय रीमा से मिलने पहुंच गई । रीमा उसे देख कर भावुक हो गयी ।कहने लगी,’ अब  सब कुछ खत्म … Read more

क्यों संदेह के कटघरे में हमेशा औरत ही खड़ी की जाती है – गीतू  महाजन

संध्या दफ्तर से निकली तो रात की सब्ज़ी के लिए सोचते हुए वह मेट्रो से उतर  सब्ज़ी मंडी की तरफ मुड़ गई।वहीं से हफ्ते भर की सब्ज़ियां इकट्ठी लेकर घर आई तो नीचे पास वाले घर में आई नई पड़ोसन मृदुला मिल गई।मृदुला के साथ बातचीत करते हुए उसे 10 मिनट ही बीते होंगे कि … Read more

रिक्त स्थान (भाग 11) – गरिमा जैन

जितेंद्र से बिछड़े रेखा को पूरे 24 घंटे बीत चुके थे ।यह 24 घंटे बिताना रेखा के लिए आसान नहीं था ।उसे पल-पल जितेंद्र के कहे हुए एक-एक शब्द याद आते ” रेखा मेरे जीवन में पड़े रिक्त स्थान को भर जाओ, रुक जाओ ,रुक जाओ रेखा,” रेखा अपने कान बंद कर लेती है। उसका … Read more

रिक्त स्थान (भाग 10) – गरिमा जैन

रेखा गहरी नींद सो रही थी तभी अचानक उसके फोन की घंटी बजती है। कमरे में बिल्कुल अंधेरा था शायद बाहर रोशनी भी नहीं हुई थी।वह समझ नहीं पाती कि आखिर समय क्या हो रहा होगा और इतनी रात में कौन कॉल कर रहा होगा। मोबाइल में टाइम देखती है तो सुबह के 5:00 बज … Read more

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