सुजाता ने दूध की घूंट भरते हुए रिया से कहा, “देखा बेटी, इसे कहते हैं दिमाग! अब बस दो दिन की बात और है। उस सीधे-साधे गिरीश के कान ऐसे भरे हैं कि वह खुद इस मनहूस को पागलखाने छोड़ आएगा। एक बार यह रास्ते से हटी, फिर यह सारा मकान, बैंक बैलेंस और जायदाद सिर्फ तुम्हारी होगी। और यह महारानी वहां जिंदगी भर पागलों के बीच सड़ेगी!” रिया ने ताली बजाकर कहा, “मम्मी, आप सच में बहुत होशियार हो!”
कॉलोनी के लोग उन्हें देखकर अक्सर कहा करते थे कि खून के रिश्ते तो नसीब से मिलते हैं, मगर यह सहेलियां पिछले जनम की सगी बहनें रही होंगी।
पर खुशियों के दिन कभी एक जैसे नहीं रहते। नियति ने उस हंसते-खेलते संसार पर ऐसा वार किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। अनन्या की मां सरिता, जो पूरे घर की धुरी थीं, अचानक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गईं। छह महीने तक अस्पतालों के चक्कर, दवाइयों की गंध और लगातार घटती उम्मीदों के बीच एक दिन सरिता ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। ग्यारह साल की अनन्या के लिए यह सदमा किसी भयानक जलजले जैसा था। जिस मां के आंचल में वह हर रात अपनी सारी थकान भूल जाती थी, उसी मां को जब सफेद कफन में विदा किया गया, तो अनन्या की जुबान पर जैसे ताला लग गया। वह न रोई, न चीखी, बस शून्य में ताकती रही।
महक ने अपनी सहेली को गले से लगाया, उसके आंसुओं को बहाने की खातिर उसे झकझोरा, अपनी गुड़िया उसके हाथों में थमाई, पर अनन्या की पथराई आंखों से एक बूंद पानी नहीं टपका। भीतर दबा वह अथाह दर्द एक ऐसा गहरा अवसाद बन गया जिसने बच्ची के कोमल मन को भीतर से सुन्न कर दिया था। वह स्कूल जाने से कतराने लगी, खाने की थाली सामने आते ही मुंह फेर लेती और घंटों एक ही कोने में बैठी दीवारों को देखती रहती। महक रोज उसके पास आती, अपने हाथों से निवाले खिलाने का जतन करती, पर अनन्या किसी टूटी हुई शाख की तरह बेजान पड़ी रहती। महक अपनी सहेली की इस खामोशी को देखकर रात-रात भर अपने बिस्तर में मुंह छिपाकर रोती थी।
गिरीश अपनी पत्नी के चले जाने के गम में डूबे थे, पर उससे भी ज्यादा उन्हें अपनी नन्ही बेटी की यह मानसिक दशा तोड़ रही थी। वे दिनभर दफ्तर में रहते और घर पर बच्ची की देखभाल के लिए कोई न था। रिश्तेदारों और पड़ोस के कुछ बुजुर्गों ने गिरीश को समझाया कि बच्ची अभी बहुत छोटी है, उसे औरत के साए और ममता की सख्त जरूरत है। अगर घर में कोई मां बनकर नहीं आया तो यह बच्ची हमेशा के लिए अपनी सुध-बुध खो बैठेगी। गिरीश ने पहले तो मना किया, पर अनन्या के भविष्य की चिंता ने उन्हें विवश कर दिया।
आनन-फानन में एक परिचित के जरिए सुजाता का रिश्ता सामने आया। सुजाता अपने पहले पति से अलग हो चुकी थी और उसके साथ उसकी बारह साल की बेटी रिया भी थी। गिरीश ने सोचा कि एक मां जिसके पास पहले से एक बेटी है, वह अनन्या के दर्द को बेहतर समझेगी और दोनों बच्चियां साथ रहकर घुल-मिल जाएंगी। मंदिर में सादे तरीके से विवाह संपन्न हुआ और सुजाता अपनी बेटी रिया के साथ गिरीश के घर आ गई।
शुरुआत के चंद हफ्ते तो सुजाता ने गिरीश के सामने बहुत सलीका दिखाया, लेकिन जैसे ही गिरीश के दफ्तर का नियमित समय शुरू हुआ, घर का माहौल पूरी तरह बदलने लगा। सुजाता की नीयत में खोट था। वह जानती थी कि गिरीश के पास शहर के पॉश इलाके में करोड़ों का पुश्तैनी मकान और अच्छी जमा-पूंजी है। उसके मन में लालच का बीज पनपने लगा कि अगर किसी तरह अनन्या रास्ते से हट जाए, तो यह पूरी जायदाद उसकी अपनी बेटी रिया के नाम हो जाएगी।
सुजाता ने अनन्या की उस सदमे वाली खामोशी को अपनी ढाल बना लिया। वह गिरीश के दफ्तर जाते ही अनन्या पर कहर बरपाने लगी। नन्ही बच्ची से फर्श पर पोछा लगवाया जाता, रसोई के जूठे बर्तन मंजवाए जाते और जरा सी भी चूक होने पर उसे चिमटे या बेलन से डराया जाता। खाने के नाम पर उसे सूखी रोटियां या बासी खाना दिया जाता, जबकि सुजाता और रिया मेज पर बैठकर तरह-तरह के पकवान उड़ातीं। सबसे क्रूर बात यह थी कि जब भी अनन्या दर्द से कराहती या विरोध में हाथ हिलाती, सुजाता जोर-जोर से चिल्लाने लगती, “देखो, यह लड़की पागल हो गई है! मुझ पर हमला कर रही है!”
इतना ही नहीं, सुजाता ने सबसे पहले महक के आने-जाने पर पाबंदी लगा दी। उसने दरवाजे पर ही महक को डांटकर भगाना शुरू कर दिया, “खबरदार जो इस घर में कदम रखा। तुम्हारी सहेली का दिमाग फिर चुका है, वह मेरी बेटी को नोचती है। दूर रहो उससे।”
महक अपनी खिड़की से सब देख रही थी। एक दिन उसने देखा कि अनन्या के हाथ पर जलने का ताजा निशान था और उसके कपड़े फटे हुए थे। जब महक ने छत की दीवार से झांककर पूछा, तो अनन्या सिर्फ अपनी सूनी आंखों से उसे देखती रही और थर-थर कांपने लगी। महक का कलेजा छलनी हो गया। उसे समझ आ गया कि जिस मां के नाम पर अनन्या को सहारा दिया गया था, वही उसके लिए साक्षात काल बन चुकी है।
उस शाम जब गिरीश दफ्तर से लौटे, तो सुजाता ने अपने बाल बिखेर रखे थे और रिया कोने में बैठकर नकली सिसकियां भर रही थी। गिरीश के पूछते ही सुजाता ने रोने का नाटक करते हुए कहा, “सुनिए जी, अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। आपकी बेटी सचमुच पागल हो चुकी है। आज उसने रिया की गर्दन दबाने की कोशिश की और जब मैं छुड़ाने आई तो मेरे ऊपर चाय का खौलता पानी फेंकने लगी। खुद को भी नोचती है और दीवारों पर सिर पटकती है। मैं अपनी और अपनी बच्ची की जान जोखिम में नहीं डाल सकती। मोहल्ले के डॉक्टर से बात कीजिए और इसे किसी मानसिक आरोग्यशाला में दाखिल कर दीजिए। वहीं इसका इलाज संभव है, यह घर पर रहने लायक नहीं बची।”
गिरीश के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वे अनन्या के कमरे में गए, तो देखा वह कोने में दुबकी बैठी थी। गिरीश ने जब प्यार से हाथ बढ़ाना चाहा, तो डर के मारे अनन्या पीछे हट गई क्योंकि उसे लगा कि फिर कोई मारने आया है। गिरीश ने अपनी मासूम बेटी की इस बेरुखी को उसका पागलपन समझ लिया। उनका दिल बैठ गया। वे सुजाता की चालाकी को भांप नहीं पाए और सोचने लगे कि शायद सचमुच उनकी बेटी अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है।
अगले ही दिन महक ने अपनी मां और पिता को रो-रोकर पूरी दास्तान सुनाई। महक के माता-पिता बेहद सुलझे हुए और भले इंसान थे। उन्होंने गिरीश से बात करने का फैसला किया। जब वे गिरीश के पास पहुंचे और कहा कि अनन्या पर जुल्म हो रहा है, तो गिरीश ने भारी मन से सिर झुका लिया।
गिरीश ने बेबसी से कहा, “भाभी जी, आप नहीं समझेंगी। मां के जाने के बाद वह गहरे सदमे में है। सुजाता तो उसकी देखभाल की पूरी कोशिश करती है, पर अनन्या खुद को और दूसरों को नुकसान पहुंचा रही है। अब तो नौबत यहां तक आ गई है कि मुझे उसे किसी शरणालय या पागलखाने में दाखिल कराना पड़ेगा ताकि उसका सही इलाज हो सके।”
यह सुनकर महक आगे आई और उसने गिरीश के हाथ पकड़ लिए। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी, “अंकल, ईश्वर के लिए ऐसा मत कीजिए! अनन्या पागल नहीं है। वह तो बस अपनी मां की जुदाई से सहमी हुई है। आंटी आपसे सफेद झूठ बोल रही हैं। जब आप सुबह चले जाते हैं, तब उस पर जो गुजरती है, वह मैंने अपनी इन आंखों से देखा है। उसे भूखा रखा जाता है, उससे नौकरों की तरह काम कराया जाता है और विरोध करने पर पीटा जाता है। अगर आपने उसे उस पागलखाने भेज दिया तो वह सचमुच मर जाएगी अंकल!”
महक के पिता ने भी गिरीश के कंधे पर हाथ रखा, “गिरीश भाई, हमारी महक कभी झूठ नहीं बोलती। ये दोनों बच्चियां सिर्फ सहेलियां नहीं, सगी बहनों से बढ़कर हैं। आप एक बार अपनी आंखों से सच क्यों नहीं परख लेते? आप कल दफ्तर के बहाने निकलिए और ठीक बारह से साढ़े बारह के बीच अचानक बिना किसी आहट के घर लौट आइए। अगर हमारी बात गलत निकली, तो हम कभी आपके पारिवारिक मामलों में दखल नहीं देंगे।”
गिरीश का मन गहरे संशय में घिर गया। एक तरफ उनकी नई पत्नी की बातें थीं और दूसरी तरफ एक मासूम बच्ची के सच्चे आंसुओं की गुहार। उन्होंने मन ही मन तय किया कि वे सच का सामना करेंगे।
अगली सुबह गिरीश सामान्य दिनों की तरह तैयार होकर दफ्तर के लिए निकल गए। सुजाता ने दरवाजे पर खड़े होकर मुस्कुराते हुए उन्हें विदा किया। पर गिरीश दफ्तर जाने के बजाय अपनी कॉलोनी के नुक्कड़ पर एक परिचित की दुकान पर बैठ गए। उनकी नजरें लगातार अपनी कलाई घड़ी पर टिकी थीं। दिल की धड़कनें तेज थीं और मन में प्रार्थना चल रही थी कि काश महक की बात गलत साबित हो और उनकी बच्ची सुरक्षित हो।
घड़ी की सुइयां जैसे ही बारह बजकर बीस मिनट पर पहुंचीं, गिरीश ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की। वे अपने घर के मुख्य लोहे के गेट के सामने रुके। उन्होंने गाड़ी का हॉर्न नहीं बजाया। अपनी निजी चाबी से मुख्य दरवाजा बेहद आहिस्ता से खोला और बिना कोई आवाज किए ड्रॉइंग रूम की दहलीज पार की।
अंदर का जो नजारा गिरीश की आंखों के सामने आया, उसने उनके पैरों के नीचे से पूरी कायनात खिसका दी।
ड्रॉइंग रूम में सोफे पर सुजाता अपने पैर फैलाए बैठी थी और पास ही रिया आराम से टीवी देख रही थी। कांच की मेज पर काजू, बादाम, पिस्ता और केसरिया दूध के भरे हुए गिलास रखे थे। दोनों मां-बेटी जोर-जोर से ठहाके लगा रही थीं। और उस भव्य कमरे के फर्श पर, फटे हुए पुराने कुर्ते में, ग्यारह साल की अनन्या घुटनों के बल बैठकर भारी पोछा लगा रही थी। उसकी नन्ही हथेलियां लाल थीं, चेहरे पर पसीने और आंसुओं की सूखी लकीरें जमी थीं और वह कमजोरी के कारण कांप रही थी।
सुजाता ने दूध की घूंट भरते हुए रिया से कहा, “देखा बेटी, इसे कहते हैं दिमाग! अब बस दो दिन की बात और है। उस सीधे-साधे गिरीश के कान ऐसे भरे हैं कि वह खुद इस मनहूस को पागलखाने छोड़ आएगा। एक बार यह रास्ते से हटी, फिर यह सारा मकान, बैंक बैलेंस और जायदाद सिर्फ तुम्हारी होगी। और यह महारानी वहां जिंदगी भर पागलों के बीच सड़ेगी!” रिया ने ताली बजाकर कहा, “मम्मी, आप सच में बहुत होशियार हो!”
सुजाता की हंसी अभी थमी भी नहीं थी कि सामने खड़े गिरीश के हाथ से दफ्तर का ब्रीफकेस छूटकर भारी आवाज के साथ संगमरमर के फर्श पर गिर पड़ा।
उस आवाज को सुनकर सोफे पर बैठी मां-बेटी के चेहरे का रंग ऐसे उड़ा मानो उनके सामने मौत आकर खड़ी हो गई हो। दोनों के हाथों से मेवे की कटोरी छिटक गई।
“आ… आप? आप इस वक्त?” सुजाता की जुबान लड़खड़ा गई, उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं।
गिरीश का चेहरा गुस्से, नफरत और पश्चाताप से लाल हो चुका था। उनकी आंखें सुजाता पर अंगारों की तरह बरस रही थीं।
“हाँ! मैं आ गया!” गिरीश की दहाड़ से पूरा कमरा गूंज उठा। “तुम सोचती थीं कि तुम्हारा यह घिनौना खेल हमेशा अंधेरे में रहेगा? मेरी फूल जैसी बच्ची, जिसकी मां अभी कुछ महीने पहले ही दुनिया छोड़कर गई थी, उसे तुमने नौकरानी बना दिया? अपनी हवस और लालच की खातिर तुमने मेरी नन्ही जान को पागल साबित करने का षड्यंत्र रचा? और मैं… मैं अंधा बनकर तुम्हारी बातों पर यकीन कर रहा था!”
गिरीश का गला भर आया। वे तेजी से आगे बढ़े और फर्श पर बैठी कांपती हुई अनन्या को अपने दोनों हाथों से उठाकर अपने सीने से चिपका लिया। अनन्या जो पिछले कई महीनों से एक बेजान पत्थर बनी हुई थी, अपने पिता की उस पुरानी, जानी-पहचानी और ममतामयी छाती की गर्माहट पाते ही अचानक टूट पड़ी। उसके भीतर का बरसों पुराना बांध टूट गया। वह फूट-फूटकर, चीख-चीखकर रोने लगी, “पापा… पापा… मुझे मत भेजना… मैं पागल नहीं हूँ पापा… मुझे बहुत मारती हैं… मुझे भूख लगती है पापा…”
अनन्या का रोना सुनकर गिरीश की अपनी आंखें भी आंसुओं से धुंधला गईं। उन्होंने अपनी बेटी का माथा चूमा, उसके आंसुओं को अपने हाथों से पोंछा और बार-बार कहने लगे, “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… तेरा यह नाकारा बाप अपनी आंखों पर पट्टी बांधे बैठा था। अब कोई तुझे हाथ भी नहीं लगा सकता बेटा, कोई नहीं।”
गिरीश ने पलटकर सुजाता और रिया की तरफ देखा। उनकी आवाज में अब फैसला था, “सुजाता, जिस पवित्र रिश्ते की आड़ में तुम मेरे घर पर कब्जा करने और मेरी बच्ची को जीते जी नर्क में धकेलने आई थीं, वह रिश्ता आज और इसी वक्त खत्म होता है। अपना और अपनी बेटी का सामान समेटो और इसी क्षण मेरे घर की चौखट से बाहर निकल जाओ। अगर पुलिस में तुम्हारे खिलाफ इस अमानवीय अत्याचार की शिकायत नहीं कर रहा हूँ, तो सिर्फ इसलिए कि मैं अपने घर को और तमाशा नहीं बनाना चाहता। पर अगर एक पल भी यहां रुकीं, तो सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेज दूंगा!”
सुजाता ने मिन्नतें करने की कोशिश की, पैर पकड़ने चाहे, पर गिरीश का फैसला पत्थर की लकीर बन चुका था। आधे घंटे के भीतर सुजाता और उसकी बेटी अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर सिर झुकाए उस घर से हमेशा के लिए बाहर निकल गईं।
इसके बाद गिरीश ने बाहर जाकर महक और उसके माता-पिता को सादर भीतर बुलाया। गिरीश ने महक के पिता के आगे हाथ जोड़ दिए और महक के सिर पर हाथ रखकर भरे मन से कहा, “अगर आज तुम्हारी यह बेटी न होती, तो मैं अपनी ही बच्ची का कातिल बन चुका होता। महक, तुमने आज अपनी सहेली को केवल बचाया नहीं है, तुमने मुझे मेरा खोया हुआ संसार वापस लौटाया है। तुम्हारी इस दोस्ती का कर्ज मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकता।”
महक दौड़कर अनन्या के पास पहुंची। दोनों सहेलियां एक-दूसरे के गले लगकर ऐसे रोईं मानो सदियों का बिछोह एक पल में पिघल गया हो। अनन्या की आंखों में अब कोई डर या खालीपन नहीं था, बल्कि एक ऐसा सुकून था जिसकी छांव में उसका खोया हुआ बचपन फिर से सांस लेने लगा था। महक ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और अनन्या के आंसू पोंछते हुए कहा, “चल अब रोना बंद कर, देख मैं तेरे लिए वही वाली कॉमिक्स लाई हूँ जो हम दोनों साथ पढ़ते थे।”
अनन्या के चेहरे पर महीनों बाद एक हल्की, मगर सच्ची मुस्कान खिल उठी। उस आंगन में अब कोई अंधेरा नहीं था, बल्कि दोपहर की सुनहरी धूप चारों तरफ फैल चुकी थी। उस दिन एक पिता को अपनी गलती का अहसास हुआ, एक दुष्ट षड्यंत्र का अंत हुआ, और सबसे बढ़कर, दो सहेलियों के निस्वार्थ और अटूट विश्वास ने यह साबित कर दिया कि जब दोस्ती रूह से निभाई जाती है, तो वह दुनिया के सबसे बड़े अंधेरे को भी चीरकर उजाला ले आती है।
सच्चे रिश्ते केवल खून के मोहताज नहीं होते; कभी-कभी दोस्ती और आत्मिक जुड़ाव का धागा दुनिया के हर रिश्ते से कहीं अधिक मजबूत और जीवनदायी साबित होता है। विपत्ति के समय में अपनों की पहचान और बिना किसी स्वार्थ के किसी की ढाल बन जाना ही मानवीयता की सबसे बड़ी मिसाल है।
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा सच्चा दोस्त या फरिश्ता बनकर आया है जिसने कठिन वक्त में आपकी ढाल बनकर साथ निभाया हो? क्या गिरीश का तुरंत कड़ा फैसला लेना सही था? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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