कोख का नहीं, दिल का रिश्ता

 आज निशा  और समीर की शादी की पांचवीं सालगिरह थी। पूरा घर फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजा हुआ था। ड्रॉइंग रूम में रखी मेज पर एक शानदार केक रखा था, जिसके पास ही समीर की तरफ से लाया गया एक महंगा तोहफा भी था। सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी इस घर में। समीर शहर का एक नामी आर्किटेक्ट था और निशा  एक कॉलेज में प्रोफेसर। दोनों का जीवन बाहर से देखने पर किसी भी आम इंसान के लिए एक परफेक्ट सपने जैसा था। लेकिन इस परफेक्ट तस्वीर में एक रंग गायब था, और वह रंग था किसी नन्हे मेहमान की किलकारी का। निशा  बेडरूम की खिड़की के पास खड़ी बाहर गिरती बारिश को देख रही थी, लेकिन उसकी आँखों से गिरते आँसू बाहर की बारिश से कहीं ज्यादा तेज थे।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और समीर अंदर आया। उसने निशा  को पीछे से गले लगाया और उसके कंधे पर ठुड्डी रखते हुए बोला, “हैप्पी एनिवर्सरी, निशा ! तुम यहाँ अँधेरे में क्यों खड़ी हो? बाहर सब तैयार है, चलो केक काटते हैं।”

निशा  ने खुद को थोड़ा छुड़ाया और अपनी आँखें पोंछते हुए कृत्रिम मुस्कान लाने की कोशिश की, “हाँ, बस चल रही हूँ।”

समीर ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में थाम लिया। वह अपनी पत्नी को बहुत अच्छी तरह समझता था। “तुम फिर से रो रही हो? निशा , ईश्वर ने हमें सब कुछ दिया है। हमारे पास एक दूसरे का साथ है, एक अच्छा घर है, सुकून है। फिर तुम इतनी उदास क्यों रहती हो? क्या तुम्हें मेरी मोहब्बत में कोई कमी लगती है?”

“नहीं समीर…” निशा  की आवाज़ भर्रा गई। “तुम्हारे प्यार में कभी कोई कमी नहीं रही, लेकिन…”

“लेकिन क्या निशा ? आखिर किस बात की शून्यता तुम्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही है?” समीर ने उसकी आँखों में गहराई से झांकते हुए पूछा।

निशा  अब और अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई। वह सिसकते हुए बोली, “औलाद की, समीर! पांच साल हो गए हमारी शादी को। मेरे साथ की सारी सहेलियों के बच्चे अब स्कूल जाने लगे हैं। जब भी हम किसी पारिवारिक समारोह में जाते हैं, तो रिश्तेदारों की वो चुभती हुई निगाहें और उनके वो सवाल मुझे अंदर तक छलनी कर देते हैं। ‘खुशखबरी कब दे रही हो?’, ‘कोई इलाज क्यों नहीं करवाती?’… समीर, अगर हमारा एक भी बेटा या बेटी होती, तो मैं अपने जीवन को सार्थक समझती। इस आलीशान घर का मैं क्या करूँ, जहाँ कोई खिलौना बिखेरने वाला ही नहीं है?”

समीर ने एक गहरी साँस ली और उसे सोफे पर बैठाया। वह जानता था कि यह दर्द नया नहीं है, लेकिन आज यह दर्द एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा था। उसने निशा  का हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत ही शांत स्वर में बोला, “निशा , मैं तुम्हारी तकलीफ समझता हूँ। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि क्या अपनी औलाद सच में हमेशा ‘अपनी’ ही होती है?”

निशा  ने हैरानी से समीर की तरफ देखा, “तुम्हारा क्या मतलब है?”

समीर ने समझाते हुए कहा, “मेरा मतलब यह है कि क्यों ना हम कोई बच्चा गोद ले लें? इस दुनिया में ऐसे अनगिनत बच्चे हैं जिन्हें एक घर की तलाश है, और हमारे पास एक घर है जिसे एक बच्चे की तलाश है। हम दोनों मिलकर एक पूरा परिवार बन सकते हैं।”

निशा  एकदम से पीछे हट गई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी दुविधा थी। “समीर, तुम कैसी बातें कर रहे हो? गोद लेना? लेकिन पराया खून तो पराया ही होता है न! हम उसे चाहे जितना भी प्यार दें, क्या वो हमारा सगा कहलाएगा? क्या मैं उस बच्चे को अपना खून मान पाऊंगी?”

समीर हल्का सा मुस्कुराया, “निशा , यह सिर्फ हमारी सोच का फर्क है। तुम खून के रिश्ते की बात करती हो? तुम खुद अखबार पढ़ती हो। आजकल क्या सगी औलादें अपने माता-पिता के खून की कीमत चुका पाती हैं? कितनों को तो उनके सगे बच्चे ही जायदाद के लिए छोड़ देते हैं या बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में फेंक आते हैं। अगर खून का रिश्ता ही सब कुछ होता, तो इस दुनिया में कोई वृद्ध माता-पिता अकेले नहीं मरते। तो फिर यह सगे और पराए का भ्रम क्यों?”

निशा  अभी भी अपने विचारों में उलझी हुई थी। उसने रुंधे हुए गले से कहा, “लेकिन समीर, दुनिया क्या कहेगी? बच्चा गोद लेने के बाद भी तो समाज मुझे बाँझ ही कहेगा न? लोग कहेंगे कि अपनी कोख से तो ये कुछ पैदा नहीं कर पाई।”

समीर का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया। उसने निशा  के आंसू पोंछे और बहुत ही दृढ़ता से कहा, “निशा , इस दुनिया का काम है कहना। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, एक माँ कभी बाँझ नहीं होती। मातृत्व किसी गर्भाशय की मोहताज नहीं है, यह तो दिल का एक अहसास है। जो एक बच्चे को नौ महीने पेट में रखती है, वो माँ होती है, लेकिन जो उम्र भर उसे अपने दिल में रखती है, वो भी तो माँ ही होती है।”

समीर की इन बातों ने निशा  के अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी। उसने कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं था। वह हमेशा खुद को एक अधूरी औरत मानती रही, लेकिन समीर के शब्दों ने जैसे उसके अंदर के अंधकार में एक छोटी सी रोशनी की किरण जगा दी थी।

उस रात दोनों ने केक काटा, लेकिन निशा  ख्यालों में खोई रही। अगले कुछ दिनों तक समीर ने इस विषय पर दोबारा बात नहीं की। वह चाहता था कि निशा  खुद इस बात को समझे। धीरे-धीरे निशा  ने इंटरनेट पर उन परिवारों के बारे में पढ़ना शुरू किया जिन्होंने बच्चे गोद लिए थे। उसने उन माताओं के अनुभव पढ़े जो बता रही थीं कि जब बच्चे ने पहली बार उन्हें ‘माँ’ कहा, तो उन्हें लगा ही नहीं कि वो उनके अपने खून से नहीं हैं।

एक दिन रविवार की सुबह निशा  ने खुद समीर से कहा, “समीर, क्या हम आज अनाथालय जा सकते हैं? मैं बस… मैं बस देखना चाहती हूँ।”

समीर के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। वह बिना कुछ कहे तुरंत तैयार हो गया। दोनों शहर के सबसे पुराने अनाथालय ‘उम्मीद की किरण’ पहुंचे। वहां का माहौल बहुत अलग था। कहीं बच्चे खेल रहे थे, कहीं कोई रो रहा था, तो कहीं कोई खिलौनों से बातें कर रहा था। अनाथालय की संचालिका उन्हें अंदर ले गईं।

वहां बहुत से बच्चे थे, लेकिन निशा  की नज़र एक छोटी सी बच्ची पर जाकर टिक गई। वह मुश्किल से डेढ़ या दो साल की रही होगी। वह कोने में बैठी एक टूटी हुई गुड़िया के बाल संवार रही थी। उसकी बड़ी-बड़ी भूरी आँखें और घुंघराले बाल थे। निशा  अनजाने में ही उसके पास खिंची चली गई। जैसे ही निशा  उस बच्ची के पास घुटनों के बल बैठी, बच्ची ने अपनी गुड़िया छोड़ दी और अपनी छोटी-छोटी उँगलियों से निशा  की साड़ी का पल्लू पकड़ लिया।

निशा  के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। उस नन्हे से स्पर्श में इतना जादू था कि निशा  की आँखों से आंसू बह निकले। बच्ची ने अपनी मासूम आँखों से निशा  को देखा और अपने दोनों हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिए, जैसे वह उसे गोद में उठाने के लिए कह रही हो।

निशा  ने कांपते हाथों से उसे अपनी छाती से लगा लिया। बच्ची ने अपना छोटा सा सिर निशा  के कंधे पर टिका दिया। उस एक पल में निशा  को लगा जैसे उसकी सालों की शून्यता, सालों का दर्द और वो सारे ताने कहीं हवा में गायब हो गए हों। उसे महसूस हुआ कि यह बच्ची उसके गर्भ से भले ही नहीं जन्मी, लेकिन इसके साथ जो तार जुड़ रहा था, वह किसी भी डीएनए से कहीं ज्यादा मजबूत था।

समीर दूर खड़ा यह सब देख रहा था और उसकी आँखों में भी नमी थी। निशा  ने पीछे मुड़कर समीर को देखा और उसकी आँखों में अब कोई सवाल या कोई डर नहीं था। उसकी आँखों में सिर्फ और सिर्फ एक माँ की चमक थी।

छह महीने बाद, कानूनी कागजी कार्यवाही पूरी होने के बाद, वो बच्ची—जिसका नाम उन्होंने ‘अद्विका’ रखा था—हमेशा के लिए उनके घर आ गई। अद्विका के आने से वह आलीशान मकान, जो पहले एक शांत और उदास ईंट-पत्थर का ढांचा लगता था, अब एक सच्चे घर में बदल गया था। घर के हर कोने में खिलौने बिखरे रहते थे। निशा  अब कॉलेज से भागकर घर आती थी, क्योंकि उसे पता था कि कोई दरवाज़े पर उसका इंतज़ार कर रहा है।

एक शाम, जब अद्विका निशा  की गोद में सिर रखकर सो रही थी, समीर उसके पास आकर बैठा। उसने पूछा, “कैसा लग रहा है अब? क्या अभी भी लगता है कि वो ‘अपना’ नहीं है?”

निशा  ने अद्विका के माथे को चूमा और मुस्कुराते हुए बोली, “तुम सही थे समीर। माँ कभी बाँझ नहीं होती। मैंने इसे अपनी कोख में नहीं, अपने दिल में पाला है। और दुनिया का कोई भी खून का रिश्ता इस एहसास से बड़ा नहीं हो सकता।”

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