प्यार का ज़ायका: एक अनकही वसीयत

 रिया को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर, घर का सबसे बुजुर्ग और सम्मानीय व्यक्ति, सुबह-सुबह रसोई में नाश्ता बना रहा था! शर्म, संकोच और अपराधबोध से रिया का चेहरा लाल हो गया। वह तुरंत रसोई के अंदर गई और कांपती हुई आवाज़ में बोली, “बाबूजी! ये… ये आप क्या कर रहे हैं? आप प्लीज हटिए, मैं अभी सब कर देती हूँ। मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी, मुझे उठने में बहुत देर हो गई। अलार्म शायद बजा ही नहीं या मुझे सुनाई नहीं दिया। आपको मुझे आवाज़ दे देनी चाहिए थी।”

रिया की आँख खुली तो कमरे में हल्की-हल्की धूप आ चुकी थी। उसने झटके से सामने दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ देखा। सुबह के साढ़े सात बज रहे थे! रिया का दिल धक से रह गया। आज रविवार था और उसकी शादी को हुए मुश्किल से पंद्रह दिन ही बीते थे। मायके में विदाई के समय माँ ने उसे कितनी बार समझाया था, “देख रिया, ससुराल में चाहे जो हो जाए, सुबह जल्दी उठने की आदत डाल लेना। ससुर जी पुराने ख्यालों के हो सकते हैं, उन्हें सुबह-सुबह बहू के हाथ की चाय और नाश्ता चाहिए होगा। इसी से तो लड़की के संस्कार दिखते हैं।”

और आज, वह साढ़े सात बजे तक सोती रह गई थी! पास ही बेफिक्री से सो रहे अपने पति, विवान को उसने मन ही मन कोसा कि उसने उसे जगाया क्यों नहीं। रिया हड़बड़ाहट में बिस्तर से उठी। उसने जल्दी से मुँह धोया, बालों को समेट कर एक जूड़ा बनाया और अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए लगभग दौड़ते हुए रसोई की तरफ भागी। उसके मन में सैकड़ों बुरे ख्याल आ रहे थे। ससुर जी, यानी दीनानाथ जी, क्या सोच रहे होंगे? यही ना कि आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियों को तो घर की ज़िम्मेदारी का कोई अहसास ही नहीं होता!

रसोई के करीब पहुँचते ही रिया के कदमों की रफ़्तार अचानक धीमी हो गई। वहाँ से छौंक की एक बहुत ही सोंधी और जानी-पहचानी खुशबू आ रही थी। साथ ही, इलायची और अदरक वाली चाय की महक ने पूरे घर को महका रखा था। रिया को लगा शायद विवान उठ गया होगा और उसकी मदद करने की कोशिश कर रहा होगा। लेकिन विवान तो अभी-अभी कमरे में सो रहा था! तो फिर रसोई में कौन है?

रिया ने दबे पाँव रसोई के दरवाज़े से अंदर झाँका और जो नज़ारा उसने देखा, उससे उसके पैर वहीं ज़मीन पर जम गए।

रसोई में दीनानाथ जी मौजूद थे। उन्होंने अपने साधारण से कुर्ते के ऊपर एक एप्रन पहन रखा था। गैस के एक चूल्हे पर चाय उबल रही थी और दूसरे पर वे बड़े ही सधे हुए हाथों से पोहा बना रहे थे। उनके होंठों पर एक बहुत ही पुरानी, क्लासिक गज़ल की धुन तैर रही थी, “चुपके चुपके रात दिन, आँसू बहाना याद है…”। उनका अंदाज़ ऐसा था जैसे वे कोई बहुत बड़े शेफ हों और यह रसोई उनका अपना साम्राज्य हो।

रिया को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर, घर का सबसे बुजुर्ग और सम्मानीय व्यक्ति, सुबह-सुबह रसोई में नाश्ता बना रहा था! शर्म, संकोच और अपराधबोध से रिया का चेहरा लाल हो गया। वह तुरंत रसोई के अंदर गई और कांपती हुई आवाज़ में बोली, “बाबूजी! ये… ये आप क्या कर रहे हैं? आप प्लीज हटिए, मैं अभी सब कर देती हूँ। मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी, मुझे उठने में बहुत देर हो गई। अलार्म शायद बजा ही नहीं या मुझे सुनाई नहीं दिया। आपको मुझे आवाज़ दे देनी चाहिए थी।”

दीनानाथ जी ने पोहे में चम्मच घुमाना बंद किया और मुड़कर रिया की तरफ देखा। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा या नाराज़गी नहीं थी, बल्कि एक बहुत ही शांत और स्नेही मुस्कान थी। उन्होंने गैस धीमी की और अपने हाथ तौलिये से पोंछते हुए बहुत ही मीठे स्वर में बोले, “अरे बहू! इसमें माफ़ी मांगने वाली कौन सी बात है? रविवार का दिन है, पूरे हफ्ते तुम दोनों ऑफिस में काम के बोझ तले दबे रहते हो। कम से कम एक दिन तो चैन की नींद सोना तुम्हारा हक़ बनता है।”

रिया ने लगभग झपटते हुए उनके हाथ से चम्मच लेना चाहा, “नहीं बाबूजी, ये मेरा काम है। आप घर के बड़े हैं, आप रसोई में काम करेंगे तो लोग क्या कहेंगे? मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही है। आप बाहर हॉल में बैठिए, मैं बस पाँच मिनट में आपके लिए गरमा-गरम चाय लेकर आती हूँ।”

दीनानाथ जी ने चम्मच रिया को नहीं दिया। इसके बजाय, उन्होंने चाय छानी, दो कपों में डाली और एक कप रिया की तरफ बढ़ाते हुए बोले, “लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता मैंने आज तक नहीं की बेटा। और जहाँ तक काम की बात है, तो यह किसने तय किया कि रसोई का काम सिर्फ तुम्हारा या इस घर की औरतों का ही है? चलो, चाय ठंडी हो रही है, बाहर डाइनिंग टेबल पर बैठते हैं।”

रिया झिझकते हुए डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई। दीनानाथ जी भी उसके सामने बैठ गए और चाय की चुस्की लेते हुए एक गहरी साँस ली। “रिया बेटा, मैं जानता हूँ तुम इस वक़्त क्या सोच रही हो। तुम्हारे मायके में या तुमने अपने आस-पास के समाज में हमेशा यही देखा होगा कि घर की औरतें सुबह सबसे पहले उठती हैं, सबकी पसंद का नाश्ता बनाती हैं, घर संभालती हैं और पुरुष आराम से सोकर उठते हैं या अखबार पढ़ते हुए चाय की फरमाइश करते हैं। है ना?”

रिया ने नज़रें झुकाए हुए धीरे से हाँ में सिर हिलाया।

दीनानाथ जी मुस्कुराए, “तुम्हें शायद लग रहा है कि मैं तुम पर कोई तंज कस रहा हूँ या तुम्हें नीचा दिखाने के लिए खुद काम कर रहा हूँ। लेकिन सच तो ये है बेटा, कि मैं बस अपने घर की एक बहुत पुरानी और खूबसूरत वसीयत को निभा रहा हूँ। एक ऐसी परंपरा, जिसे मेरे दादा जी ने शुरू किया था।”

रिया ने हैरानी से सिर उठाया, “परंपरा? कैसी परंपरा बाबूजी?”

दीनानाथ जी की आँखों में एक पुरानी यादों की चमक आ गई। वे अतीत के पन्नों को पलटते हुए बोले, “बात उन दिनों की है जब मेरे दादा जी ज़िंदा थे। वो आज़ादी से पहले का समय था। मेरी दादी बहुत मेहनती थीं। घर के काम, खेती-बाड़ी, मवेशियों को देखना… वो सुबह चार बजे उठकर चक्की पीसती थीं। दादा जी ने उनकी ये मेहनत और उनका संघर्ष देखा। उस ज़माने में पुरुषों का घर के काम में हाथ बंटाना पाप और मर्दानगी के खिलाफ समझा जाता था। लेकिन मेरे दादा जी ने समाज की खोखली परवाह नहीं की। उन्होंने नियम बना लिया कि सुबह की पहली चाय और नाश्ता वही बनाएँगे। ताकि दादी को सुबह कम से कम एक घंटे का अतिरिक्त आराम मिल सके।”

रिया मंत्रमुग्ध होकर सुन रही थी। उसने कभी किसी पुरुष के मुँह से ऐसी बातें नहीं सुनी थीं।

दीनानाथ जी ने आगे कहा, “जब मेरे पिताजी का समय आया, तो मेरी माँ भी एक स्कूल टीचर थीं। वो उन गिनी-चुनी महिलाओं में से थीं जो उस समय आज़ादी से नौकरी करती थीं। पिताजी ने दादा जी की उस परंपरा को आगे बढ़ाया। वो कहते थे कि जब औरत बाहर जाकर मर्दों के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर सकती है, तो मर्द घर के अंदर उसका हाथ क्यों नहीं बंटा सकते? और फिर…” दीनानाथ जी की आवाज़ थोड़ी भर्रा गई, “और फिर तुम्हारी सासू माँ, मेरी सुमेधा का समय आया।”

रिया जानती थी कि सुमेधा जी का देहांत कुछ साल पहले ही हुआ था। घर की दीवारों पर लगी उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीरें हमेशा रिया को एक अजीब से अपनेपन का अहसास कराती थीं।

“सुमेधा एक बेहतरीन डॉक्टर थीं,” दीनानाथ जी ने एक गर्व भरी मुस्कान के साथ कहा। “अस्पताल में उनकी नाईट ड्यूटी लगती थी। वो कभी रात को दो बजे आतीं, कभी सुबह चार बजे। ऐसे में मैं कैसे उम्मीद कर सकता था कि वो सुबह उठकर मेरे लिए चाय बनाएँ? मैंने अपने पिताजी से वो ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। मैं सुबह उठता, चाय बनाता, नाश्ता तैयार करता और जब सुमेधा उठती, तो हम साथ बैठकर चाय पीते। सुमेधा अक्सर हँसकर कहती थी, ‘दीनानाथ जी, आपकी इस सुबह की अदरक वाली चाय में जो जादू है न, वो मेरी सारी रात की थकान मिटा देता है। आपके हाथ की चाय मेरे लिए किसी अमृत से कम नहीं है।'”

दीनानाथ जी ने चाय का आख़िरी घूंट लिया और कप मेज़ पर रख दिया। उन्होंने रिया की तरफ बहुत ही स्नेह से देखा और बोले, “रिया बेटा, परंपराएं सिर्फ वो नहीं होतीं जो हमें मंदिर में पूजा करना सिखाती हैं या त्योहारों पर नए कपड़े पहनना सिखाती हैं। असली परंपराएं वो होती हैं जो एक परिवार को जोड़कर रखती हैं, जो एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्यार पैदा करती हैं। हमारी पीढ़ी ने औरतों को देवी का दर्ज़ा तो दे दिया, लेकिन उन्हें एक साधारण इंसान समझना भूल गए। हम भूल गए कि वो भी थकती हैं, उन्हें भी आराम की ज़रूरत होती है।”

रिया की आँखों में आँसू छलक आए। वे आँसू शर्मिंदगी के नहीं, बल्कि सम्मान और कृतज्ञता के थे। उसने अपने मायके में हमेशा औरतों को रसोई में खटते देखा था, जहाँ उनके दर्द या थकान की कोई कीमत नहीं थी। और यहाँ, उसका ससुर उसे एक ऐसी आज़ादी और सम्मान दे रहा था, जिसकी उसने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी।

तभी बेडरूम का दरवाज़ा खुला और विवान अपनी आँखें मलता हुआ बाहर आया। उसने रिया और अपने पिता को डाइनिंग टेबल पर बैठे देखा, तो मुस्कुरा दिया। वह सीधे रसोई में गया और वहाँ टंगा हुआ एप्रन पहन लिया।

रिया ने हैरानी से विवान को देखा। विवान ने बाहर झाँकते हुए रिया को आँख मारी और कहा, “गुड मॉर्निंग रिया! बाबूजी ने पोहा तो बना दिया है, लेकिन मुझे पता है तुम्हें संडे को आलू के पराठे खाने का मन करता है। तो आज के पराठे तुम्हारे इस पतिदेव के नाम! बाबूजी, आप बैठिए, आज का रसोई का डिपार्टमेंट पूरी तरह से मेरा है।”

दीनानाथ जी ने हँसते हुए रिया की तरफ देखा और बोले, “देखा बहू! वसीयत आगे बढ़ रही है। सुमेधा के जाने के बाद मैं ये काम बस इसलिए कर रहा था ताकि ये परंपरा कहीं टूट न जाए। मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब विवान की शादी हो और मैं ये अनकही ज़िम्मेदारी उसे सौंप दूँ। आज से रविवार की रसोई विवान के हवाले। और हाँ, बाकी दिन भी हम सब मिल-बांट कर ही काम करेंगे। ये घर हम सबका है, तो घर का काम सिर्फ तुम्हारा कैसे हो सकता है?”

रिया अब अपने आँसुओं को रोक नहीं पाई। वो उठी और उसने आगे बढ़कर दीनानाथ जी के पैर छू लिए। दीनानाथ जी ने उसे तुरंत उठा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे दिल से आशीर्वाद दिया।

“बाबूजी, मुझे नहीं पता मैं क्या कहूँ। आपने आज मुझे सिर्फ चाय नहीं पिलाई है, आपने मुझे एक बेटी होने का अहसास कराया है। मैं हमेशा डरती थी कि ससुराल में मुझे खुद को साबित करना होगा, लेकिन आपने तो मुझे बिना कोई परीक्षा दिए ही पास कर दिया,” रिया ने रुंधे हुए गले से कहा।

दीनानाथ जी हँसे, “अरे पगली, परिवार में कोई परीक्षा नहीं होती, सिर्फ प्यार होता है। जा, जा कर देख विवान पराठों का क्या हाल कर रहा है। कहीं पहली बार में ही जल न जाएँ!”

रिया मुस्कुराते हुए रसोई की तरफ बढ़ गई। वहाँ विवान आटा गूंथने की जद्दोजहद कर रहा था। रिया उसके पास गई, उसने विवान के गाल पर लगा थोड़ा सा सूखा आटा पोंछा और हँसते हुए बोली, “तुम्हें आटा गूंथना नहीं आता न?”

विवान ने भी हँसते हुए जवाब दिया, “सीख जाऊँगा रिया। जब बाबूजी सीख सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? आख़िरकार, मुझे भी तो ये परंपरा अपनी अगली पीढ़ी तक पहुँचानी है।”

उस दिन सुबह की धूप कुछ ज़्यादा ही सुनहरी लग रही थी। रिया को ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी पराए घर में नहीं, बल्कि अपने ही घर के किसी नए और खूबसूरत हिस्से में आ गई है। वो रसोई अब उसे कोई सज़ा की जगह नहीं, बल्कि प्यार और साझेदारी का एक पवित्र मंदिर लग रही थी। एक ऐसा मंदिर, जहाँ भगवान नहीं, बल्कि इंसान एक-दूसरे की इज़्ज़त करते थे। और यही तो असली परंपरा है, यही तो प्यार का असली ज़ायका है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक अनकही वसीयत की तरह आगे बढ़ता रहता है।

आपको क्या लगता है? क्या घर के कामों में पुरुषों का हाथ बंटाना समाज में एक नया बदलाव ला सकता है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ ज़रूर शेयर करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।  

error: Content is protected !!