वो ‘निकम्मा’ बेटा

रात के करीब ढाई बज रहे थे। अचानक मास्टर महेश जी  जी के सीने में तेज दर्द उठा। दर्द इतना भयानक था कि वे बिस्तर पर ही तड़पने लगे। उनकी पत्नी कौशल्या घबराहट में उठ बैठीं। वे समझ नहीं पा रही थीं कि इतनी रात गए, इस भयंकर तूफ़ान में क्या करें। उनके दो बड़े बेटे, सुमित और अमित, जो मल्टीनेशनल कंपनियों में बड़े पदों पर थे, एक बेंगलुरु में था और दूसरा अमेरिका में। वे दोनों तो वैसे भी बस नाम के ही थे, साल में एक बार दीवाली पर शक्ल दिखाते थे।

तभी उनके कमरे का दरवाजा खुला। आहट पाते ही उनका सबसे छोटा बेटा, राघव उनके सामने खड़ा था। राघव को घर में सब ‘निकम्मा’ ही कहते थे। मास्टर जी की नजर में वह जीवन की सबसे बड़ी विफलता था।

“माँ, क्या हुआ बाबूजी को?” राघव ने घबराते हुए पूछा।

“पता नहीं बेटा, अचानक सीने को पकड़ कर तड़प रहे हैं। मुझे बहुत डर लग रहा है। बाहर इतनी बारिश है, एम्बुलेंस भी कैसे आएगी?” कौशल्या रोने लगी थीं।

राघव ने एक पल नहीं सोचा। उसने अपनी माँ को ढांढस बंधाया, “आप चिंता मत करो माँ, मैं हूँ ना।” उसने झट से अपनी पुरानी गाड़ी की चाबी उठाई। एक हाथ से बाबूजी को सहारा दिया और अपने मजबूत कंधों पर उनका वजन डालते हुए उन्हें कार तक ले गया। मास्टर जी दर्द से कराह रहे थे, लेकिन उनकी जुबान से राघव के लिए ताने निकलना बंद नहीं हुए थे।

“गाड़ी धीरे निकाल निकम्मे… एक तो तुझे ढंग से चलानी भी नहीं आती। गड्ढे में गिराएगा क्या मुझे?” मास्टर जी हांफते हुए बोले।

राघव ने चुपचाप गाड़ी स्टार्ट की। “बाबूजी, आप बस लम्बी सांसें लेते रहिए। ज्यादा बोलिए मत, हम बस अस्पताल पहुँच ही रहे हैं।”

बारिश चीरते हुए कार शहर के बड़े अस्पताल में जा रुकी। राघव ने बाबूजी को तुरंत इमरजेंसी वॉर्ड में भर्ती करवाया। डॉक्टरों की टीम ने उन्हें अपनी निगरानी में ले लिया। राघव बाहर भीगते हुए कपड़ों में, एक कोने में खड़ा था। उसका मन बहुत अशांत था। बचपन से लेकर आज तक उसने सिर्फ यही शब्द सुना था- ‘निकम्मा’।

उसे याद आ रहा था कि कैसे स्कूल में जब उसके नंबर कम आते थे, तो बाबूजी पूरे मोहल्ले के सामने उसे जलील करते थे। “सुमित और अमित को देखो, हमेशा क्लास में फर्स्ट आते हैं, और एक ये निकम्मा है, जो मेरी नाक कटवाने के लिए पैदा हुआ है।” जब दोनों बड़े भाई अपनी पढ़ाई पूरी करके शहर से बाहर चले गए, तो राघव ने घर की जिम्मेदारियां संभालने के लिए पुश्तैनी किराने की दुकान पर बैठना शुरू कर दिया। उसे किसी ने नहीं पूछा कि वह क्या करना चाहता था।

रिश्तेदारों में भी उसकी यही पहचान थी। जब उसकी शादी हुई, तो लोग उसकी पत्नी रमा के लिए तरस खाते थे। “बेचारी कितनी समझदार और सुंदर है, पर किस्मत देखो, इस निकम्मे के पल्ले पड़ गई। बड़े भाइयों की पत्नियां तो मेमसाहब बनकर बड़े शहरों में घूम रही हैं।”

राघव को इन सब बातों की आदत पड़ चुकी थी। उसने अपने दिमाग में यह बात अच्छी तरह बिठा ली थी कि वह सचमुच किसी काम का नहीं है। बस एक उसकी माँ थी, जो कभी-कभी उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे उसके असली नाम ‘राघव’ से बुलाती थी। लेकिन आज, अगर उसके बाबूजी को कुछ हो गया, तो शायद वह इस दुनिया में बिल्कुल ही अकेला पड़ जाएगा। इसी विचार ने उसे अंदर तक झकझोर दिया। वह अस्पताल के एक शांत कोने में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा और ईश्वर से अपने कठोर पिता की सलामती की प्रार्थना करने लगा। उसकी प्रार्थनाओं में इतनी शिद्दत थी कि शायद ऊपर वाले को भी पिघलना ही पड़ा। सुबह होते-होते डॉक्टरों ने बताया कि खतरे की कोई बात नहीं थी, बस गैस और बढ़े हुए ब्लड प्रेशर के कारण दर्द उठा था। कुछ दवाइयों के बाद मास्टर जी को घर ले जाने की इजाजत मिल गई।

घर वापस लौटकर, जब राघव ने बाबूजी को उनके कमरे में बिस्तर पर लेटाया और रजाई ओढ़ाई, तो मास्टर जी ने मुँह बनाते हुए कहा, “रहने दे निकम्मे! तुझे तो अंदर ही अंदर लग रहा होगा कि बुड्ढा आज रात को ही टपक जाएगा तो दुकान और मकान दोनों तेरे नाम हो जाएंगे।”

राघव का दिल एक बार फिर छलनी हो गया। वह खामोशी से सिर झुकाकर कमरे से बाहर निकल गया।

लेकिन आज कौशल्या का सब्र जवाब दे गया था। उन्होंने दरवाजे को बंद किया और मास्टर जी के सामने आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों थे।

“बहुत हो गया जी! अब एक शब्द भी मेरे बेटे के खिलाफ मत कहिएगा। इतना सब कुछ करता है वो आपके लिए, रात के तीन बजे तूफ़ान में अपनी जान पर खेलकर आपको अस्पताल ले गया, वहां पूरी रात एक पैर पर खड़ा रहा, और आपके लिए वो अभी भी निकम्मा ही है?”

मास्टर जी ने करवट बदलते हुए कहा, “तो क्या गलत कहा मैंने? क्या उखाड़ लिया है उसने जिंदगी में?”

“अरे क्या कमी है मेरे राघव में?” कौशल्या रोते हुए चीखीं। “हाँ, मानती हूँ कि वो सुमित और अमित की तरह अंग्रेजी नहीं बोल पाता, उसने कोई बड़ी डिग्री नहीं ली। तो क्या हुआ? क्या सिर्फ डिग्रियां होने से ही इंसान लायक बन जाता है? आपके वो दोनों लायक बेटे कहाँ हैं आज? एक ने फोन तक नहीं उठाया और दूसरे ने मैसेज करके पूछ लिया कि ‘हाउ इज डैड?’ बस खत्म! और ये जिसे आप रात-दिन कोसते हैं, यही आपका पूरा घर, आपका समाज, आपकी दुकान और आपकी हर बीमारी का खर्च उठा रहा है।”

कौशल्या हांफने लगी थीं, पर वे रुकी नहीं। “आपके वो दोनों लायक बेटे अपनी बीवियों और बच्चों के साथ अपनी दुनिया में मस्त हैं। उन्हें तो यह भी याद नहीं रहता कि आपको कौन सी दवाई कब खानी है। अगर कल रात को कुछ अनहोनी हो जाती, तो वो दोनों सिर्फ आपका मुँह देखने आते। और आप हैं कि जो लड़का साये की तरह आपके साथ खड़ा है, उसे शर्मिंदा करने और ताने मारने का कोई मौका नहीं छोड़ते।”

कमरे में कुछ देर के लिए भारी सन्नाटा छा गया। मास्टर जी ने अपनी पत्नी की तरफ एक अजीब सी, नम आँखों से देखा। उनका वह कठोर चेहरा अचानक बहुत कमजोर और बूढ़ा लगने लगा था। उन्होंने गहरी सांस ली और अपनी नजरें नीचे झुका लीं।

“कौशल्या… क्या इतने सालों में तुम भी मेरी भावनाओं को नहीं समझ पाईं?” मास्टर जी की आवाज भर्रा गई थी। “तुमने सिर्फ मेरे कठोर शब्द सुने, उसके पीछे की मेरी तड़प नहीं देखी?”

कौशल्या चौंकी। “तड़प? कैसी तड़प?”

मास्टर जी की आँखों से आंसू बह निकले। “क्या तुम्हें सच में लगता है कि मुझे यह नहीं दिखता कि मेरा राघव मेरे लिए क्या करता है? क्या मुझे यह नहीं पता कि वही मेरा असली श्रवण कुमार है? क्या मेरा दिल पत्थर का है कि मैं उसे अपने गले से लगाकर ‘मेरा बच्चा’ नहीं कहना चाहता?”

“तो फिर क्यों करते हैं आप ऐसा? क्यों उसे हर पल जलील करते हैं?” कौशल्या ने हैरान होते हुए पूछा।

मास्टर जी ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। “क्योंकि मुझे डर लगता है कौशल्या… मुझे बहुत डर लगता है। मैंने अपने दोनों बड़े बेटों को उनके बचपन से ही बहुत ‘लायक’ होने का एहसास दिलाया था। मैंने उन्हें उड़ने के लिए पंख दिए, और वो ऐसे उड़े कि उन्होंने वापस इस घोंसले की तरफ मुड़कर ही नहीं देखा। वो लायक बन गए, इसलिए वो हमसे दूर हो गए।”

मास्टर जी फफक कर रो पड़े। “अगर मैंने अपने राघव को भी यह बता दिया कि वो कितना लायक है, अगर मैंने उसे उसके हिस्से का सम्मान दे दिया, तो शायद उसे भी अपनी अहमियत का एहसास हो जाएगा। शायद वो भी सोचेगा कि वो हमारे बिना कहीं और बेहतर जिंदगी जी सकता है। अगर यह निकम्मा भी लायक बनकर इस घर से चला गया, तो हम दोनों बुढ़ापे में घुट-घुट कर मर जाएंगे कौशल्या। मेरी यह गालियां, मेरे यह ताने… यह सब मेरी एक स्वार्थी पिता की चाल है। मैं इसे ‘निकम्मा’ सिर्फ इसलिए कहता हूँ ताकि इसे हमेशा यह लगे कि यह दुनिया के किसी काम का नहीं है और इसे हमारी जरूरत है… ताकि यह हमेशा हमारे पैरों के पास, हमारी नजरों के सामने रहे।”

मास्टर जी फूट-फूट कर रो रहे थे। “मैं बहुत बुरा पिता हूँ कौशल्या, मैं अपने ही बेटे के आत्मसम्मान को कुचल कर अपना बुढ़ापा सुरक्षित कर रहा हूँ। तुम चाहो तो मुझे पापी कह लो।”

कौशल्या अवाक् रह गईं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि वे क्या कहें। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर अपने पति के जोड़े हुए हाथों को थाम लिया और खुद भी रोने लगीं। “अरे, ये आप क्या कर रहे हैं? मुझे क्यों पाप में डाल रहे हैं? मैं तो आपको कभी अंदर से जान ही नहीं पाई।”

इस पूरे भावुक दृश्य से बेखबर, मास्टर जी और कौशल्या यह नहीं जानते थे कि कमरे के दरवाजे के ठीक बाहर खड़ा राघव, यह सारी बातें सुन रहा था।

राघव बुत बनकर वहां खड़ा था। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह रही थी, लेकिन यह आंसू दुख के नहीं थे। यह एक अजीब सी तृप्ति और सुकून के आंसू थे। आज उसे पता चला था कि उसके बाबूजी की उन चुभने वाली गालियों के पीछे दरअसल उसे खोने का डर था। वो जिसे अपनी कमजोरी समझता था, वो असल में उसके बाबूजी का उस पर सबसे बड़ा अधिकार और प्यार था।

उसके मन में एक पल के लिए आया कि वह दरवाजा खोलकर अंदर जाए और अपने बाबूजी के गले लग जाए। वह उन्हें बताना चाहता था कि वह उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएगा। लेकिन अगले ही पल उसके कदम रुक गए। वह जानता था कि उसके बाबूजी कितने स्वाभिमानी हैं। अगर उन्हें पता चल गया कि राघव ने उनका यह कमजोर रूप और उनका यह राज जान लिया है, तो वे शर्मिंदगी से नजरें नहीं मिला पाएंगे।

पिता के उस झूठे, लेकिन मजबूत आवरण को बचाए रखने के लिए राघव ने अपने आंसुओं को तुरंत पोंछा और तेजी से अपने कमरे की तरफ भागने लगा।

वह अभी अपने कमरे तक पहुँचा भी नहीं था कि पीछे से बाबूजी की जानी-पहचानी, कड़क आवाज पूरे घर में गूंजी।

“अरे ओ निकम्मे! मेरे चश्मे का डब्बा क्या तूने अस्पताल में ही छोड़ दिया है? कितनी बार कहा है कि तुझसे एक काम भी ढंग से नहीं होता। जल्दी ढूंढ कर ला।”

राघव के चेहरे पर एक बहुत ही खूबसूरत और प्यारी सी मुस्कान खिल उठी। उसने फिर से अपनी आँखें पोंछीं और लगभग दौड़ते हुए बोला, “आया बाबूजी… कार में ही छूट गया था शायद, अभी लेकर आता हूँ!”

वह तेजी से कार की तरफ दौड़ा। आज उसे ‘निकम्मा’ शब्द दुनिया की सबसे मीठी धुन लग रही थी।

दोस्तों, कभी-कभी हमारे माता-पिता का कठोर व्यवहार सिर्फ उनकी असुरक्षा और हमसे बेइंतहा प्यार का नतीजा होता है। क्या आपने भी कभी अपने बड़ों के गुस्से के पीछे छुपे उनके प्यार को महसूस किया है? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं।

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