सर्दियों की एक धुंधली और सर्द सुबह थी। लखनऊ के गोमती नगर इलाके में स्थित ‘आनंद कुंज’ नाम की एक विशाल और खूबसूरत हवेली, जो कभी बच्चों की किलकारियों और मेहमानों के ठहाकों से गूंजा करती थी, आज एक अजीब से सन्नाटे में डूबी हुई थी। उस सन्नाटे को चीरती हुई सिर्फ एक ही आवाज़ आ रही थी, और वह थी हवेली के सबसे बड़े कमरे में रखी पुरानी लकड़ी की आरामकुर्सी के हिलने की आवाज़। उस कुर्सी पर तिरसठ वर्षीय सुधा देवी बैठी थीं। उनके हाथों में एक पुरानी, धुंधली पड़ चुकी तस्वीर थी, और आंखों में एक ऐसा सूनापन था जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन था। उनके चेहरे की झुर्रियों में मानो अनगिनत सवाल और इंतज़ार की परतें जम गई थीं। तस्वीर में उनके दिवंगत पति आनंद जी, उनका इकलौता बेटा रोहन, बहू नताशा और प्यारी सी पोती टिया मुस्कुरा रहे थे।
सुधा देवी आज सुबह से ही अपनी सुध-बुध खो बैठी थीं। आज उनके पति आनंद जी की चौथी पुण्यतिथि थी। चार साल पहले आज ही के दिन एक भयंकर हार्ट अटैक ने आनंद जी को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया था। पति के जाने का दुख तो था ही, लेकिन सुधा देवी को अंदर से जिस बात ने सबसे ज्यादा तोड़ दिया था, वह था उनके बेटे रोहन का व्यवहार। रोहन अपने पिता के अंतिम संस्कार में तो आया था, लेकिन तेरहवीं का काम खत्म होते ही उसने अपनी माँ के सामने विदेश जाकर बसने का प्रस्ताव रख दिया। रोहन ने कहा था कि उसे लंदन में एक बहुत बड़ी नौकरी मिल रही है और वह अपना भविष्य संवारने के लिए वहां जाना चाहता है। उसने अपनी माँ से वादा किया था कि वह हर छह महीने में भारत आएगा और हर रोज़ फोन पर बात करेगा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, वादे धुंधले पड़ते गए।
अचानक बाहर लोहे के भारी गेट के खुलने की आवाज़ आई। उसके बाद हल्के कदमों की आहट उनके कमरे की तरफ बढ़ने लगी। सुधा देवी ने अपनी नम आंखें उठाईं। दरवाज़े पर पैंतीस-छत्तीस साल की एक सांवली सी, लेकिन बहुत ही सौम्य महिला खड़ी थी। वह विमला थी। विमला पिछले छह सालों से उनके घर की देखरेख कर रही थी। वह सिर्फ एक सहायिका नहीं थी, बल्कि आनंद कुंज की हर एक ईंट और सुधा देवी के हर एक दर्द से वाकिफ थी। विमला खुद एक विधवा थी और एक छोटी बच्ची की माँ थी। सुधा देवी उसे अपनी बेटी से कम नहीं मानती थीं और विमला भी उनका पूरा ख्याल रखती थी।
विमला ने कमरे में प्रवेश किया और सबसे पहले उसकी नज़र मेज पर रखे चाय के कप पर गई, जो बिल्कुल ठंडा हो चुका था। चाय पर एक मोटी मलाई जम गई थी, जो बता रही थी कि चाय कई घंटों पहले लाकर रखी गई थी। उसने सुधा देवी को देखा, जो अभी भी तस्वीर को अपने सीने से लगाए बैठी थीं।
“अम्मा जी, यह क्या? आज फिर से आपने सुबह की चाय नहीं पी? और यह दवाइयां भी वैसे ही रखी हैं। क्या बात है, आज आप फिर से उसी पुरानी दुनिया में खो गई हैं?” विमला ने हल्की सी डांट लगाते हुए कहा, जिसमें एक बेटी का अधिकार और फिक्र साफ झलक रही थी।
सुधा देवी ने कोई जवाब नहीं दिया। उनकी आंखें बस खिड़की के बाहर गिरते हुए सूखे पत्तों को देख रही थीं। विमला उनके पास आई और धीरे से उनके हाथों से वह तस्वीर लेकर मेज पर रख दी।
“अम्मा जी, मैं जानती हूं कि आज बाबूजी की पुण्यतिथि है। मैं जानती हूं कि आपके दिल पर आज क्या बीत रही होगी। लेकिन अगर आज बाबूजी यहां होते और आपको इस तरह बिना कुछ खाए-पिए खुद को तकलीफ देते हुए देखते, तो क्या उन्हें अच्छा लगता? वे तो हमेशा कहते थे न कि सुधा की मुस्कान ही इस घर की असली रौनक है।” विमला ने सुधा देवी के पैरों के पास फर्श पर बैठते हुए उनके ठंडे हाथों को अपने हाथों में लेकर सहलाते हुए कहा।
विमला की इस अपनत्व भरी छुअन और उसके शब्दों ने सुधा देवी के सब्र का बांध तोड़ दिया। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “विमला, मुझे आज भी याद है जब रोहन छोटा था और उसे हल्की सी खांसी भी आ जाती थी, तो मैं और आनंद पूरी रात नहीं सोते थे। हमने अपनी हर एक ख्वाहिश को मारकर उसकी हर जिद पूरी की। हमने अपना पेट काटकर उसे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाया। जब आनंद जी गए, तो मुझे लगा कि मेरा बेटा अब मेरा सहारा बनेगा, मेरी लाठी बनेगा। लेकिन वह तो अपनी एक अलग ही दुनिया बसा कर बैठ गया। आज तीन साल हो गए हैं उसे गए हुए… तीन साल, विमला! इन तीन सालों में उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा कि उसकी बूढ़ी माँ इस बड़े से मकान में अकेले कैसे जी रही है।”
विमला चुपचाप सुनती रही, क्योंकि वह जानती थी कि आज सुधा देवी के मन में दबा हुआ सारा गुबार बाहर आना जरूरी है।
सुधा देवी ने अपने आंसू पोंछते हुए आगे कहा, “शुरुआत में वह हर रविवार वीडियो कॉल करता था। मुझे टिया का चेहरा दिखाता था। फिर कॉल्स महीने में एक बार होने लगे। और अब… अब तो सिर्फ त्योहारों पर एक मैसेज आ जाता है। जब भी मैं उसे फोन करती हूं, तो नताशा फोन उठाकर कहती है कि रोहन बहुत बिजी है, किसी मीटिंग में है। क्या कोई इंसान इतना बिजी हो सकता है कि अपनी माँ से दो मिनट बात करने का भी वक्त न निकाल पाए? विमला, जब इंसान बूढ़ा हो जाता है, तो उसे अच्छे कपड़ों, बड़े मकान या बैंक बैलेंस की जरूरत नहीं होती… उसे बस अपनों के साथ की, उनके दिए हुए वक्त की और दो प्यार भरे शब्दों की जरूरत होती है।”
विमला ने तुरंत उठी और कहा, “अम्मा जी, आप यहीं बैठिए, मैं आपके लिए ताज़ा और गरमा-गरम अदरक वाली चाय और आपका पसंदीदा उपमा बनाकर लाती हूं। जब तक आप कुछ नहीं खाएंगी, मैं भी इस घर का एक काम नहीं करूंगी।”
कुछ ही देर में रसोई से एक बहुत ही भीनी और सोंधी महक आने लगी। विमला एक ट्रे में नाश्ता लेकर आई। उसने अपने हाथों से सुधा देवी को उपमा का पहला निवाला खिलाया। सुधा देवी को उस निवाले में वह स्वाद और प्यार मिला, जो वह अपने बेटे से उम्मीद कर रही थीं। उन्होंने प्यार से विमला के सिर पर हाथ फेरा। “तू सच में मेरी बेटी है विमला। अगर तू न होती, तो शायद मैं इस खालीपन में घुट-घुट कर कब की मर चुकी होती।”
नाश्ता खत्म ही हुआ था कि अचानक सुधा देवी के मोबाइल की रिंगटोन बजी। स्क्रीन पर ‘रोहन कॉलिंग’ चमक रहा था। सुधा देवी की उदास आंखों में अचानक एक अनोखी चमक आ गई। जैसे किसी डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो। उन्होंने कांपते हाथों से तुरंत फोन उठाया।
“हेलो! रोहन बेटा… कैसे हो तुम? टिया कैसी है? बहू कैसी है?” सुधा देवी ने एक ही सांस में सारे सवाल पूछ डाले।
दूसरी तरफ से रोहन की बहुत ही जल्दबाजी और हड़बड़ाहट भरी आवाज़ आई, “मॉम! मैं ठीक हूं। सब ठीक हैं। सुनिए मॉम, मैं अभी ऑफिस के लिए निकल रहा हूं और आज एक बहुत बड़ी क्लाइंट मीटिंग है। मेरे पास बिल्कुल टाइम नहीं है। मैंने आपके बैंक अकाउंट में पिछले महीने के और इस महीने के पैसे एक साथ ट्रांसफर कर दिए हैं। आप चेक कर लेना। अगर कोई मेडिकल इमरजेंसी हो तो मुझे मैसेज ड्रॉप कर देना। मैं वीकेंड पर बात करता हूं। ओके बाय!”
इससे पहले कि सुधा देवी यह कह पातीं कि “बेटा, आज तुम्हारे पापा की पुण्यतिथि है, क्या तुम्हें याद है?”, फोन कट चुका था।
कमरे में एक बार फिर से सन्नाटा छा गया। लेकिन इस बार का सन्नाटा पहले से बहुत अलग था। इस बार सुधा देवी रोई नहीं। उनकी आंखों से एक भी आंसू नहीं गिरा। फोन के उस एक मिनट के वार्तालाप ने उनके अंदर के इंतज़ार को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। उन्हें यह कठोर लेकिन सत्य बात समझ आ गई थी कि रोहन अब उनका वह बेटा नहीं रहा जो कभी उनकी उंगली पकड़कर चलना सीखता था। रोहन अब एक ऐसी मशीन बन चुका था जो भावनाओं को पैसों के तराजू पर तौलता था। उसके लिए अपनी माँ की चिंता बैंक अकाउंट में जमा की जाने वाली एक रकम तक सीमित रह गई थी।
सुधा देवी ने एक गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर छाई हुई निराशा की लकीरें अचानक एक अजीब सी शांति में बदल गईं। उन्होंने फोन को एक तरफ रख दिया।
विमला, जो दरवाजे के पास खड़ी यह सब देख और सुन रही थी, उसकी आंखों में आंसू आ गए। वह धीरे से सुधा देवी के पास आई और बोली, “अम्मा जी, आप उदास मत होइए। बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो अपनी दुनिया में उलझ जाते हैं। लेकिन आप अकेली कहां हैं? मैं हूं न आपके पास।”
सुधा देवी ने मुस्कुराते हुए विमला को देखा। उन्होंने विमला का हाथ पकड़ा और उसे अपने पास कुर्सी पर बैठा लिया।
“विमला, तू पागल है जो मेरे लिए रो रही है। आज तो मुझे खुश होना चाहिए। आज मुझे इस बात का अहसास हो गया है कि परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनता। परिवार वो होता है जो आपके दर्द में आपका साथ दे, जो आपकी एक आहट से आपकी तकलीफ समझ जाए। रोहन मेरा खून है, लेकिन तू मेरी आत्मा का हिस्सा है। तूने इन सालों में बिना किसी स्वार्थ के मेरी सेवा की है। आज से मैं अपने इस खाली घर और सूने आंगन में किसी का इंतज़ार नहीं करूंगी। आज से तू और तेरी बेटी ही मेरा परिवार हो।”
विमला की आंखें फटी रह गईं। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इतने बड़े घर की मालकिन उसे इतना बड़ा सम्मान दे रही है।
सुधा देवी उठीं, उन्होंने अपनी अलमारी खोली और उसमें से एक सुंदर सी लाल रंग की सिल्क की साड़ी और सोने की एक पतली सी चेन निकाली। “यह साड़ी मैंने अपनी बहू नताशा के लिए खरीदी थी कि जब वह भारत आएगी तो उसे दूंगी। लेकिन अब इसका असली हकदार मुझे मिल गया है। यह ले विमला, यह तेरी है। और आज शाम को तू अपनी बेटी को भी यहीं ले आना। आज हम तीनों मिलकर बाबूजी की याद में उनके अनाथालय जाएंगे और वहां बच्चों के साथ समय बिताएंगे। अब मैं रोकर नहीं, बल्कि बाबूजी की यादों को खुशियों में बदलकर जिऊंगी।”
उस दिन आनंद कुंज की हवेली में सालों बाद एक नई सुबह हुई थी। एक ऐसी सुबह जिसने रिश्तों के पुराने पैमानों को तोड़कर एक नया रिश्ता कायम किया था। सुधा देवी ने अपने अंदर के उस खालीपन को हमेशा के लिए मिटा दिया था, और विमला को एक ऐसी माँ मिल गई थी, जिसकी छांव में वह अपनी और अपनी बेटी की जिंदगी सुरक्षित महसूस कर रही थी। सच ही कहा गया है कि खून के रिश्ते अगर साथ छोड़ भी दें, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में एक फरिश्ता भेज ही देता है, जो सूने आंगन में फिर से गूंज भर देता है।
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