“अम्मा, यह क्या है?” मैंने पूछा।
“तीस हजार हैं… रोहन की फीस के लिए। तुझे क्या लगा, तू मुझे कुछ नहीं बताएगा तो मुझे पता नहीं चलेगा? तेरी शक्ल देखकर मैं तेरा पूरा हाल पढ़ लेती हूँ। जब तू पैदा भी नहीं हुआ था, तब से जानती हूँ तुझे।” माँ की आवाज़ भर्रा गई थी।
मैं स्तब्ध था। “लेकिन अम्मा, तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आए? क्या तुमने भैया से…”
“नहीं!” माँ ने तुरंत इंकार किया। “उनसे माँगने की नौबत आती तो मैं खुद जहर खा लेती। मेरी वो सोने की जंजीर और पुराने कंगन पड़े थे ना… कल सुनार को घर बुलाकर बेच दिए। वैसे भी अब मुझे कौन सा श्रृंगार करना है। मेरा असली गहना तो मेरे पोते-पोतियों का भविष्य है।”
ट्रेन की खिड़की से बाहर भागते हुए पेड़-पौधों को देखते हुए भी मेरे दिमाग में एक ही दृश्य अटका हुआ था—मेरे बेटे रोहन का उदास चेहरा। इलाहाबाद से बनारस का यह सफर मुझे सदियों जितना लंबा लग रहा था। मैं अपने बड़े भाई, रविकांत से मिलने जा रहा था। बात ही कुछ ऐसी थी कि फोन पर नहीं कही जा सकती थी। पिछले दो सालों में हालात ऐसे बिगड़े थे कि मेरी छोटी सी प्रिंटिंग प्रेस पूरी तरह ठप हो गई। कर्ज चुकाते-चुकाते घर का आधा सामान बिक गया और अब नौबत यहाँ तक आ गई थी कि रोहन की इंजीनियरिंग के आखिरी साल की फीस भरने के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं थी। तीस हजार रुपयों का इंतजाम करना मेरे लिए पहाड़ लांघने जैसा हो गया था। पत्नी रमा ने रोते हुए कहा था कि ‘अपने बड़े जेठ जी से कह कर देखो, आखिर सगे भाई हैं, मुसीबत में काम नहीं आएंगे तो कब आएंगे?’
रमा की बात मानकर मैं बनारस तो आ गया, लेकिन पुश्तैनी घर की चौखट पर कदम रखते ही मुझे अपनी औकात का अहसास होने लगा था। बड़े भैया ने पुश्तैनी घर को तुड़वाकर एक आलीशान कोठी तान ली थी। उनका बिल्डिंग मटेरियल का व्यापार खूब फल-फूल रहा था। घर में कदम रखते ही माँ ने मुझे सीने से लगा लिया, लेकिन भैया और भाभी का व्यवहार… वह कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था।
पिछले तीन दिनों से मैं इसी उधेड़बुन में था कि भैया से बात कैसे शुरू करूँ। जब भी मैं उनके साथ अकेले में बैठने की कोशिश करता, भाभी, जिनका नाम सुलोचना था, न जाने कहाँ से टपक पड़तीं। उनके पास बातों का एक ऐसा मायाजाल था जिसमें वो मुझे उलझा कर रख देती थीं।
“अरे देवर जी, आप तो जानते ही हैं आजकल व्यापार में कितना मंदी का दौर है,” कल रात खाने की मेज पर भाभी ने सब्जी परोसते हुए कहा था। मैंने अभी भैया से अपने काम की चर्चा छेड़ी ही थी कि भाभी ने बीच में ही बात काट दी। “ऊपर से चिंटू के स्कूल का डोनेशन, और आपकी भतीजी की कोचिंग… बस पूछिए मत, लाख रुपये महीना तो ऐसे उड़ जाता है जैसे हवा। हम तो खुद बहुत मुश्किल से हाथ खींच कर चल रहे हैं।”
मैं निवाला चबाते हुए रुक गया था। मुझे अच्छे से पता था कि उनकी ‘मुश्किल’ क्या है। हर छह महीने में नई कार बदलना और हर साल छुट्टियों में विदेश जाना। लेकिन मैं क्या कहता? मैं तो वहाँ एक याचक बनकर गया था। भैया चुपचाप खाना खाते रहे, उन्होंने एक बार भी आँख उठाकर मेरी तरफ नहीं देखा। उनकी वो खामोशी मुझे अंदर तक चीर गई थी। मुझे लगने लगा था कि भाभी के शब्द दरअसल भैया की ही सोच का आइना हैं। वो जानबूझकर भाभी को ढाल बना रहे थे ताकि मुझे कुछ माँगने का मौका ही न मिले।
रात-रात भर मैं उस आलीशान गेस्ट रूम के मखमली गद्दे पर करवटें बदलता रहता। मुझे अपना वो सीलन भरा किराए का कमरा और उसमें मेरे लौटने की आस लगाए बैठे रमा और रोहन याद आते। मेरा मन करता कि आधी रात को ही अपना बैग उठाऊँ और वापस लौट जाऊँ। यहाँ आकर मैंने अपना बचा-खुचा स्वाभिमान भी दांव पर लगा दिया था। रमा वहाँ मोहल्ले में सिलाई मशीन चलाकर घर का राशन जुटा रही थी और मैं यहाँ अपने ही भाई के घर में एक अजनबी की तरह तिरस्कृत महसूस कर रहा था।
तीसरा दिन भी बीत गया और मैं एक शब्द नहीं बोल पाया। कल सुबह मेरी वापसी की ट्रेन थी। मैंने तय कर लिया था कि मैं कुछ नहीं माँगूंगा। चाहे मुझे मजदूरी करनी पड़े, लेकिन मैं इन लोगों के सामने हाथ नहीं फैलाऊँगा। मन में एक अजीब सी खिन्नता और खालीपन भर गया था।
अगली सुबह, जब मैं अपना सूटकेस बंद कर रहा था, तभी बाहर से माँ की आवाज़ आई।
“सुरेश… ओ सुरेश… जरा छत पर आना बेटा।”
आवाज़ में एक अजीब सी कांपन थी, जो सिर्फ एक माँ ही निकाल सकती है। मैं न चाहते हुए भी सीढ़ियां चढ़कर छत पर गया। मई की चिलचिलाती धूप में छत तवे की तरह तप रही थी। मैंने देखा कि माँ छत के एक कोने में बैठी लाल मिर्च और पापड़ सुखाने के लिए पुरानी साड़ियाँ बिछा रही थीं।
मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। मैं लगभग झपटते हुए उनके पास गया।
“अम्मा, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? इस उम्र में इतनी तेज धूप में यह सब करने की क्या जरूरत है? घर में इतने नौकर-चाकर हैं, दो-दो बहुएं हैं, फिर भी तुम खुद को क्यों हलकान कर रही हो?” मैंने उनके हाथ से मिर्च की टोकरी छीन ली। “चलो नीचे चलो, लू लग जाएगी।”
“तू चुप कर…” माँ ने मेरी बात काटते हुए इधर-उधर देखा। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं। उन्होंने झटके से अपने पल्लू की गांठ खोली और एक भारी सा कपड़े का रुमाल मेरे हाथ में थमा दिया। “इसे चुपचाप अपने सूटकेस की अंदर वाली जेब में रख लेना।”
मैं अवाक रह गया। रुमाल काफी भारी था।
“अम्मा, यह क्या है?” मैंने पूछा।
“तीस हजार हैं… रोहन की फीस के लिए। तुझे क्या लगा, तू मुझे कुछ नहीं बताएगा तो मुझे पता नहीं चलेगा? तेरी शक्ल देखकर मैं तेरा पूरा हाल पढ़ लेती हूँ। जब तू पैदा भी नहीं हुआ था, तब से जानती हूँ तुझे।” माँ की आवाज़ भर्रा गई थी।
मैं स्तब्ध था। “लेकिन अम्मा, तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आए? क्या तुमने भैया से…”
“नहीं!” माँ ने तुरंत इंकार किया। “उनसे माँगने की नौबत आती तो मैं खुद जहर खा लेती। मेरी वो सोने की जंजीर और पुराने कंगन पड़े थे ना… कल सुनार को घर बुलाकर बेच दिए। वैसे भी अब मुझे कौन सा श्रृंगार करना है। मेरा असली गहना तो मेरे पोते-पोतियों का भविष्य है।”
मेरे गले में जैसे कोई कांटा सा चुभ गया। मैं फूट-फूट कर रोना चाहता था, लेकिन तभी सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आहट हुई।
मैंने पलटकर देखा तो सुलोचना भाभी छत पर आ रही थीं। उनकी पैनी नज़रें हम दोनों पर ही गड़ी थीं। वो शायद यह देखने आई थीं कि माँ और मैं अकेले में क्या खिचड़ी पका रहे हैं।
“अरे अम्मा जी, आप इतनी धूप में यहाँ क्या कर रही हैं? और देवर जी, आप भी यहाँ? आपकी तो ग्यारह बजे की ट्रेन है ना?” भाभी की आँखों में शक साफ़ झलक रहा था, लेकिन उनके चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान थी।
मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले ही माँ ने बड़ी ही चतुराई से बात पलट दी।
“अरे बहू, मैं तो सुरेश को डांट रही थी। मैं कह रही थी कि जरा इन मिर्चों पर जाली ढक दे, कमबख्त कबूतर सब खराब कर देते हैं। लेकिन यह तो सुनता ही नहीं है। कह रहा है कि मुझे देर हो रही है।” माँ ने अपने आँसू ऐसे पोंछ लिए जैसे पसीना पोंछ रही हों।
मैंने मुट्ठी में भींचे हुए उस रुमाल को अपनी पैंट की जेब में खिसका लिया। मेरे हाथ कांप रहे थे।
“हाँ भाभी… अम्मा बस यही कह रही थीं। मैं तो बस अम्मा को नीचे ले जाने आया था। चलिए अम्मा, धूप बहुत तेज है।” मैंने कहा।
“हाँ हाँ चलिए, वैसे भी इन मिर्चों का रंग तो अब चढ़ ही गया है,” भाभी ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा और सीढ़ियों से नीचे उतर गईं।
माँ ने मेरी तरफ देखा और उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। “जा बेटा… अब जा। और रोहन से कहना कि उसकी दादी उसके इंजीनियर बनने का इंतजार कर रही है।”
मैंने जेब में रखे उन पैसों को छुआ। वो महज़ नोट नहीं थे, वो मेरी माँ के जीवन भर की तपस्या, उनका आशीर्वाद और उनका असीम प्यार था। उस दिन मैं उस बड़े से आलीशान घर से विदा ले रहा था, लेकिन मैं खाली हाथ नहीं था। मेरे पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत थी—मेरी माँ का आँचल, जिसकी छाँव के आगे दुनिया की हर धूप बेअसर थी।
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मूल लेखिका
रमा शुक्ला