हैसियत का तराजू

 सुनयना के दिमाग में एक पल के लिए आग लग गई। उसके भीतर का संदेह और कटुता एक झटके में जाग उठी। वह मन ही मन सोचने लगी, “ओहो! तो यह तमाशा है! इतनी बड़ी दुकान से अपनी बेटी के लिए खरीदारी हो रही है? बहुत पैसा दबा कर रखा है इस औरत ने। हमारे सामने तो हमेशा फटेहाली का रोना रोती रहती है कि राशन के पैसे नहीं हैं, दवा के पैसे नहीं हैं ताकि मुझसे और ज्यादा पैसे ऐंठ सके। यह छोटे लोग होते ही ऐसे हैं… अंदर से मक्कार और बाहर से दीन-हीन बनने का नाटक करते हैं।”

  आलीशान सफेद गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी सुनयना का चेहरा भीतर से उजड़ा हुआ था। ड्राइवर गाड़ी को सहजता से दौड़ा रहा था, पर सुनयना के भीतर विचारों का एक ऐसा बवंडर उठ रहा था जिसने उसकी पूरी आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। उसके हाथ में एक बड़े से नामी शोरूम का चमचमाता थैला रखा था, लेकिन उसकी नजरें उस थैले पर नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा के उस काले पन्ने पर टिकी थीं जो आज पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो गया था। उसे लग रहा था जैसे किसी ने भरे बाजार में उसके तन पर लदे महंगे रेशमी लिबास को उतारकर उसके भीतर छिपी ओछी, दरिद्र और संकीर्ण सोच को नंगा कर दिया हो। किसी ने उससे एक कड़ा शब्द तक नहीं कहा था, न किसी ने ताना मारा था, फिर भी सुनयना को अपने भीतर ऐसा लग रहा था मानो सिर से पैर तक घड़ों पानी गिर गया हो।

माता-पिता ने बड़े अरमानों से उसका नाम ‘सुनयना’ रखा था—यानी सुंदर और विशाल दृष्टि वाली स्त्री, जो हर किसी के भीतर अच्छाई और पवित्रता देख सके। लेकिन क्या वह अपने नाम के एक भी अक्षर को सार्थक कर पाई थी? नहीं, बिल्कुल नहीं। सुनयना ने जीवन भर केवल एक ही तराजू पर दुनिया को तौला था—पैसे और हैसियत का तराजू। उसके रिश्ते, उसकी मुस्कुराहटें, उसका उठना-बैठना और उसका अपनत्व केवल उन्हीं लोगों के लिए सुरक्षित था जिनसे उसका कोई स्वार्थ सधता हो, जो समाज में उसकी शान बढ़ा सकें या जिनके आगे वह अपने रईस होने का रौब जमा सके। जो लोग उससे नीचे थे, वे उसकी नजर में सिर्फ कीड़े-मकोड़े थे, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर किया जाता था और फिर उन्हें किनारे फेंक दिया जाता था। इसे ममता या बड़प्पन नहीं, बल्कि एक घटिया व्यापार कहा जाता है, और यह बात आज से पहले कभी सुनयना को इतनी गहराई से नहीं चुभी थी जितनी आज चुभ रही थी।

इस आत्मग्लानि की शुरुआत आज दोपहर नहीं हुई थी, बल्कि इसकी जड़ें पिछले कुछ हफ्तों के घटनाक्रम में फैली हुई थीं। सुनयना के बड़े बेटे अक्षत का विवाह आखिरकार शहर के एक बड़े उद्योगपति की सुशिक्षित कन्या के साथ तय हुआ था। अक्षत एक बहुराष्ट्रीय बैंक में वरिष्ठ पद पर कार्यरत था। घर में चारों तरफ शादी की तैयारियां, खुशियों का माहौल और चहल-पहल थी। रिश्तेदार आ-जा रहे थे, केटरर्स और डेकोरेटर्स की कतारें लगी थीं। हर कोई खुश था और सुनयना अपनी अमीर सहेलियों के बीच बैठकर शादी के भव्य आयोजनों की डींगें हांक रही थी।

उसी गहमागहमी के बीच, पिछले आठ सालों से सुनयना के घर में झाड़ू-पोछा, बर्तन और साफ-सफाई का सारा जिम्मा संभालने वाली अधेड़ उम्र की कामवाली विमला हाथ बांधे संकोच से उसके सामने आकर खड़ी हुई थी। विमला के माथे पर पसीने की बूंदें थीं और आंखों में एक अजीब सी झिझक थी।

“मालकिन…” विमला ने धीरे से, अपनी आवाज को जितना हो सके नम्र बनाकर पुकारा था।

सुनयना जो उस वक्त एक विदेशी डिजाइनर के कैटलॉग में उलझी हुई थी, उसने नजरें ऊपर उठाए बिना ही झिड़क कर कहा था, “क्या है विमला? देख नहीं रही कितनी व्यस्त हूं? जल्दी बोल, जो बोलना है, फालतू का वक्त नहीं है मेरे पास।”

विमला ने अपने पल्लू के छोर को उंगलियों में लपेटते हुए बड़ी मिन्नत भरे स्वर में कहा था, “मालकिन! अगले हफ्ते मंगल और बुध… दो दिन की छुट्टी चाहिए थी। अगर आप इजाजत दे दें तो बड़ी कृपा होगी।”

छुट्टी का शब्द सुनते ही सुनयना की त्योरियां चढ़ गई थीं। उसने कैटलॉग धड़ाम से कांच की मेज पर पटका और चिल्ला पड़ी थी, “क्या? दो दिन की छुट्टी? तेरा दिमाग तो ठिकाने है न विमला? पूरे घर में अक्षत की शादी का तमाशा फैला पड़ा है। दस कमरों की सफाई बाकी है, सोफे के कवर बदलने हैं, मेहमानों की आवभगत के लिए हाथ चाहिए, और तुझे इस वक्त छुट्टी की सूझ रही है? मैंने पहले ही साफ लफ्जों में सबको कह दिया था कि अक्षत की बारात विदा होने तक किसी को एक घंटे की भी फुर्सत नहीं मिलेगी। सीधे अगले महीने की बात करना।”

विमला की आंखों में आंसू भर आए थे। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए, “मालकिन, आपकी बात सिर माथे। भैया की शादी हमारे लिए भी त्योहार जैसी है। मैं रात-दिन एक करके सारा काम निपटा दूंगी, लेकिन इन दो दिनों के लिए मुझे जाने दीजिए। मेरी अपनी सगी बेटी, गुडिया की शादी पक्की हो गई है उसी मंगलवार की।”

सुनयना ने चौंककर अपनी आंखें फैलाई थीं, “क्या? गुडिया की शादी? कब तय हुई? किससे? और तू मुझे अब बता रही है?”

बेख्याली में और अपने अहंकार के नशे में सुनयना के मुंह से निकल गया था, “अजीब बात है… ये सड़क किनारे झुग्गियों में रहने वाले लोग भी अपनी बेटियों के ब्याह ऐसे रचाते हैं जैसे कोई खेल हो! एक हमारी छोटी बेटी श्रेया है, सत्ताईस की हो गई, अमेरिका से पढ़कर आई है, उसके लिए एक से बढ़कर एक खानदानी रिश्ते आ रहे हैं पर उसे अपने करियर से फुर्सत नहीं। और एक तुम लोग हो… न घर का ठिकाना, न बैंक में जमा-पूंजी, और बीस-बाईस की लड़की हुई नहीं कि ब्याहने चल दिए! क्या खिलाएगा वो लड़का उसे? कहां से करेगी तू दान-दहेज?”

विमला का सिर शर्म और बेबसी से झुक गया था। उसने आंचल से अपनी आंखें पोंछीं और रुंधे हुए गले से सिर्फ इतना कहा था, “भगवान की दया से एक सीधा-साधा लड़का मिल गया है मालकिन। ऑटो चलाता है, अपना गुजारा कर लेता है। बस आप आशीर्वाद दे दीजिए और दो दिन की छुट्टी…”

सुनयना ने चिढ़कर हाथ हिला दिया था, “हां-हां, ठीक है! मरता क्या न करता। जा, कर ले अपनी बेटी का ब्याह। पर बुधवार की रात तक वापस आ जाना, गुरुवार को अक्षत के संगीत की रस्म है।”

विमला ‘जी मालकिन’ कहकर चुपचाप रसोई की तरफ मुड़ गई थी, लेकिन सुनयना का मन पूरे दिन इस बात से खिन्न रहा था कि काम के इतने जरूरी दिनों में उसकी एक नौकरानी ने अपने निजी मामले को प्राथमिकता दे दी थी।

दिन बीतते गए। शादी के कार्ड बंट चुके थे और घर में रस्मों का सिलसिला शुरू होने वाला था। मंगलवार से पहले वाली शाम सुनयना अपनी बड़ी गाड़ी में बैठकर बाजार की तरफ निकली। रास्ते में अचानक उसे ध्यान आया कि विमला की बेटी की शादी है। समाज में लोग क्या कहेंगे कि नौकरानी की बेटी ब्याही गई और मालकिन ने एक तिनका तक नहीं दिया? दिखावे के लिए ही सही, कुछ तो देना पड़ेगा।

उसने ड्राइवर से कहा, “रमेश, गाड़ी को उस मुख्य बाजार की तरफ मत ले जाना जहां बड़े शोरूम हैं। पीछे वाली उस तंग गली में जो पुरानी, सस्ती कपड़ों की दुकानें हैं न, वहां रोक लेना।”

ड्राइवर ने गाड़ी एक साधारण सी, धूल-धूसरित दुकान के सामने रोक दी। सुनयना ने अपनी नाक पर रुमाल रखा और दुकान के भीतर कदम रखा। दुकानदार ने एक अमीर महिला को अपनी दुकान में देखकर फौरन हाथ जोड़े, “आइए मैडम, क्या दिखाऊं?”

सुनयना ने उपेक्षा भरे स्वर में कहा, “अरे, घर की नौकरानी की लड़की की शादी है। कोई बहुत सस्ती, पर दिखने में थोड़ी चटकीली साड़ी दिखा दो। दो सौ-तीन सौ के अंदर काम निपट जाना चाहिए। ज्यादा महंगी मत दिखाना, उन लोगों को वैसे भी अच्छे कपड़ों की कद्र कहां होती है।”

दुकानदार ने मुस्कुराकर सबसे निचले रैक से एक पतली, सिंथेटिक, भड़कीले रंग की साड़ी निकाली जिसका रंग शायद एक ही धुलाई में उड़ जाने वाला था। सुनयना ने बिना देखे कहा, “हां, यही ठीक है। इसे अखबार में लपेटने के बजाय किसी प्लास्टिक के कवर में डाल दो ताकि थोड़ी ठीक लगे।” उसने तीन सौ रुपये फेंके, साड़ी उठाई और दुकान से बाहर आ गई। उसके चेहरे पर एक अजीब सा संतोष था कि उसने विमला की ‘हैसियत’ के अनुसार उपहार खरीद लिया था और अपने पैसे भी बचा लिए थे।

वह अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ ही रही थी कि उसकी नजर सड़क के उस पार बने शहर के सबसे महंगे, प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक साड़ी एम्पोरियम ‘राजघराना वस्त्रालय’ पर पड़ी। उस शोरूम के शीशे के बड़े दरवाजों से बाहर आते हुए उसने एक जानी-पहचानी सूरत देखी।

वह विमला थी!

सुनयना ठिठक कर रुक गई। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। विमला के हाथ में ‘राजघराना वस्त्रालय’ का वह भारी, सुनहरे अक्षरों वाला थैला था, जिसमें उस दुकान की सबसे महंगी और चुनिंदा बनारसी और कांजीवरम साड़ियां पैक की जाती थीं।

सुनयना के दिमाग में एक पल के लिए आग लग गई। उसके भीतर का संदेह और कटुता एक झटके में जाग उठी। वह मन ही मन सोचने लगी, “ओहो! तो यह तमाशा है! इतनी बड़ी दुकान से अपनी बेटी के लिए खरीदारी हो रही है? बहुत पैसा दबा कर रखा है इस औरत ने। हमारे सामने तो हमेशा फटेहाली का रोना रोती रहती है कि राशन के पैसे नहीं हैं, दवा के पैसे नहीं हैं ताकि मुझसे और ज्यादा पैसे ऐंठ सके। यह छोटे लोग होते ही ऐसे हैं… अंदर से मक्कार और बाहर से दीन-हीन बनने का नाटक करते हैं।”

तभी विमला की नजर सड़क के उस पार खड़ी सुनयना पर पड़ गई। सुनयना को वहां देखकर विमला के चेहरे पर एक सच्ची, निश्चल खुशी तैर गई। वह तेज कदमों से सड़क पार करके हांफती हुई सुनयना के पास आ खड़ी हुई।

“अरे मालकिन! आप यहां? प्रणाम मालकिन!” विमला ने बड़ी श्रद्धा से सिर झुकाया।

सुनयना ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं और अपने हाथ में पकड़े उस तीन सौ रुपये के सस्ते पैकेट को पीछे छिपाते हुए बेहद तीखे और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “क्यों विमला? चोरी पकड़ी गई तो अब इतनी आवभगत दिखा रही हो? बड़ी ऊंची पहुंच हो गई तुम्हारी! राजघराना वस्त्रालय से खरीदारी चल रही है? कर ली अपनी बेटी के दान-दहेज की तैयारी? खूब तिजोरी भर रखी है तुमने, और हमारे सामने ऐसे गिड़गिड़ाती हो जैसे दो वक्त की रोटी की मोहताज हो!”

विमला के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने घबराकर अपने दोनों कान छुए और अपनी जुबान को दांतों तले दबाया। उसकी आंखें भर आईं।

“अरे नहीं-नहीं मालकिन! ऐसा घोर अनर्थ मत बोलिए। मेरी इतनी बिसात कहां, मेरी सात पुश्तों की इतनी हैसियत नहीं कि मैं राजघराना जैसी राजसी दुकान में अपनी बेटी के लिए कदम भी रख सकूं। मेरी गुडिया तो खादी भंडार की दो सौ रुपये वाली साड़ी में भी उतनी ही खुश रहेगी जितनी किसी रानी के जोड़े में।”

सुनयना ने अविश्वास से उसके हाथ के थैले की ओर इशारा किया, “तो फिर यह क्या है? यह थैला क्या वहां मुफ्त में बंट रहा था? झूठ बोलना बंद करो विमला!”

विमला ने उस थैले को दोनों हाथों से ऐसे संभाला जैसे उसमें कोई अनमोल धरोहर रखी हो। उसने बहुत ही कोमल, भरे हुए और आदरयुक्त स्वर में कहा, “मालकिन, यह मेरी बेटी के लिए नहीं है। यह तो अक्षत भैया की दुल्हन के लिए है।”

सुनयना जैसे किसी बिजली के झटके से कांप उठी, “क्या? अक्षत की दुल्हन के लिए?”

“हां मालकिन,” विमला की आवाज में एक अलौकिक संतोष था, “अक्षत भैया को मैंने तब से देखा है जब वे निकर पहनकर पूरे घर में दौड़ते थे। जब भी मुझे बुखार होता या देर हो जाती, भैया कभी मुझ पर नाराज नहीं हुए। हमेशा पूछते थे—’विमला काकी, चाय पी तुमने?’ आज जब उस बच्चे की शादी हो रही है, वह इतनी बड़ी कुलवंती बहू ब्याह कर ला रहा है, तो क्या इस काकी का कोई फर्ज नहीं बनता? जब बहू पहली बार इस दहलीज पर कदम रखेगी, तो मैं उसे मुंह दिखाई में क्या दूंगी? क्या अपनी औकात की कोई फटी-पुरानी चीज उसके हाथ पर रख दूं? नहीं मालकिन, भैया का मान मेरी जान से भी बढ़कर है।”

विमला ने आगे कहा, “मेरी कमेटी के आठ हजार रुपये छूटे थे मालकिन। बेटी की शादी के लिए कुछ बर्तन लेने थे, पर मैंने सोचा कि बर्तन तो रिश्तेदारों की मदद से भी आ जाएंगे, लेकिन भैया की दुल्हन का स्वागत दोबारा नहीं होगा। इसलिए मैं सीधे इस दुकान में गई और उनसे कहा कि मुझे अपने साहब के बेटे की बहू के लिए सबसे सुंदर और शुद्ध रेशम की साड़ी दिखाइए। पूरे सात हजार पांच सौ रुपये की यह साड़ी आई है मालकिन। बस, एक यही चीज ले पाई हूं। आप इसे देख लीजिए, अगर आपको पसंद न आए तो मैं बदलवा लाऊंगी।”

विमला ने बड़े चाव से उस थैले को थोड़ा सा खोला। भीतर गहरे लाल रंग की शुद्ध बनारसी सिल्क की साड़ी धरी थी, जिस पर सोने के तारों का बारीक काम चमक रहा था। वह साड़ी इतनी गरिमामयी थी कि किसी महारानी के तन पर भी सजती।

सुनयना की सांसें जैसे सीने में ही अटक गईं। उसकी जबान तालू से चिपक गई। उसके पैर थर-थर कांपने लगे।

सामने विमला खड़ी थी—फटी हुई चप्पलें, घिसी हुई सूती साड़ी, हाथों में प्लास्टिक की चूड़ियां और चेहरे पर धूप से झुलसी हुई त्वचा। एक ऐसी औरत जिसके घर में कल उसकी अपनी सगी बेटी का ब्याह था, जिसके पास अपनी बेटी के लिए नया जोड़ा खरीदने के पैसे नहीं थे, लेकिन उसने अपनी जिंदगी भर की संचित पूंजी सिर्फ इसलिए एक झटके में लुटा दी थी ताकि उसके मालिक के बेटे का मान ऊंचा रह सके! उसने यह नहीं सोचा कि बदले में उसे क्या मिलेगा। उसने यह नहीं सोचा कि उसकी अपनी औकात क्या है। उसने सिर्फ अपने दिल की अमीरी देखी थी।

और एक तरफ वह खुद थी—सुनयना। सोने के कंगन, हीरे की अंगूठियां, लाखों का बैंक बैलेंस और शहर की सबसे बड़ी कोठियों में से एक की मालकिन। लेकिन उसका दिल? उसका दिल इतना संकरा, इतना सड़ा हुआ और इतना दरिद्र था कि वह उस गरीब औरत की बेटी के लिए तीन सौ रुपये खर्च करते हुए भी हिसाब लगा रही थी और सबसे घटिया कपड़ा चुन रही थी!

सुनयना को लगा जैसे जमीन फट जाए और वह उसमें समा जाए। उसके हाथ में जो सस्ती साड़ी का पैकेट था, वह उसे किसी जलते हुए अंगारे की तरह महसूस होने लगा। उसे अपने आप से घिन आने लगी। आज तक वह खुद को बहुत ऊंचा, बहुत संभ्रांत और बहुत रईस समझती थी, लेकिन उस चौराहे पर, भरी दोपहरी में, एक नौकरानी ने बिना एक भी तीखा शब्द कहे, उसे उसकी असली औकात दिखा दी थी। गरीब विमला नहीं थी, गरीब वह खुद थी—सोच से गरीब, दिल से दरिद्र और इंसानियत से कंगाल!

“मालकिन… आप चुप क्यों हो गईं? साड़ी पसंद नहीं आई क्या?” विमला ने सहमते हुए पूछा।

सुनयना ने अपनी पलकें उठाईं। उसकी आंखों से अविरल आंसुओं की धार बह निकली। वह अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई।

विमला घबरा गई, “अरे मालकिन! आप रो क्यों रही हैं? मुझसे कोई गुस्ताखी हो गई क्या? अगर मैंने कुछ गलत कह दिया हो तो मेरे कान पकड़ लीजिए, मुझे माफ कर दीजिए मालकिन!”

सुनयना ने आगे बढ़कर विमला के दोनों हाथ अपने कांपते हाथों में थाम लिए। विमला सकपका कर पीछे हटने लगी, “मालकिन, यह क्या कर रही हैं? आप मुझे छू रही हैं, मैं तो कामवाली…”

“नहीं विमला, मत कह अपने आपको कामवाली!” सुनयना की आवाज रोने के कारण टूट रही थी, “आज तूने मेरी उन आंखों को खोल दिया जो बरसों से अंधेपन का शिकार थीं। तूने मुझे सिखा दिया कि हैसियत तिजोरी में रखे रुपयों से नहीं, सीने में धड़कने वाले दिल के आकार से नापी जाती है। तू अमीर है विमला… बहुत अमीर है, और मैं… मैं इस दुनिया की सबसे बड़ी भिखारन हूं।”

विमला अवाक रह गई। सुनयना ने अपने हाथ में पकड़ा वह तीन सौ रुपये का पैकेट सड़क किनारे पड़े कूड़ेदान में डाल दिया। उसने विमला का हाथ पकड़ा और दृढ़ कदमों से ‘राजघराना वस्त्रालय’ की सीढ़ियों की तरफ चल पड़ी।

“मालकिन, हम कहां जा रहे हैं?” विमला ने घबराते हुए पूछा।

सुनयना ने अपने आंसू पोंछे और चेहरे पर एक ऐसा संकल्प लेकर आई जो उसने जिंदगी में पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसने कहा, “आज गुडिया की शादी की खरीदारी होगी विमला। और वह खरीदारी किसी छोटी-मोटी दुकान से नहीं, इसी दुकान से होगी। जो मान तूने आज मेरे बेटे को दिया है, उस मान का कर्ज मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकती। लेकिन आज एक मां दूसरी मां की बेटी का कन्यादान करेगी।”

उस शाम सुनयना ने राजघराना वस्त्रालय से गुडिया के लिए सबसे बेहतरीन लहँगा, बनारसी साड़ियां और सोने की एक सुंदर चेन खरीदी। उसने विमला की एक न सुनी। जब विमला रोते हुए उसके पैरों में गिरने लगी, तो सुनयना ने उसे गले से लगा लिया—वही सुनयना जो कभी किसी गरीब के छू जाने पर नहाने चली जाती थी, आज उस फटी साड़ी वाली औरत को सीने से लगाकर अपने सारे पाप धो रही थी।

मंगलवार को जब गुडिया की डोली उठी, तो सुनयना खुद वहां मौजूद थी। उसने न सिर्फ पूरा खर्च उठाया, बल्कि अपनी गाड़ी भेजकर विमला की बेटी को विदा कराया।

जब अक्षत की शादी हुई, तो पहली रस्म के दौरान जब अक्षत की दुल्हन घर में आई, तो सुनयना ने सबसे पहले विमला को बुलाया। उसने विमला के हाथों से वह सात हजार पांच सौ वाली बनारसी साड़ी अपनी बहू को दिलवाई और भरी महफिल में सबके सामने कहा, “यह इस घर की सबसे बड़ी पूंजी है, क्योंकि यह किसी दौलतमंद के अहंकार से नहीं, बल्कि एक मां के पवित्र पसीने और असीम प्यार से खरीदी गई है।”

उस दिन के बाद सुनयना पूरी तरह बदल गई। उसके घर की चौखट पर अब किसी की हैसियत नहीं तौली जाती थी। उसने समझ लिया था कि बैंक बैलेंस, गाड़ियां और आलीशान मकान सिर्फ मिट्टी की ढेरी हैं; इंसान की असली दौलत उसका संतोष, उसका त्याग और निस्वार्थ प्रेम करने की क्षमता है। बांट कर खाने वाला इंसान कभी दरिद्र नहीं हो सकता, और सब कुछ समेट कर रखने वाला कभी अमीर नहीं बन सकता।

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