“अबे ओए किताबी कीड़े! तुझे क्या लगा, तू आवाज़ बदलेगा और मूंछें बढ़ा लेगा तो हम तुझे पहचान नहीं पाएंगे? साले, पच्चीस साल तो क्या, अगर पच्चीस जनम भी बीत जाते, तो भी तेरी ये झुकी हुई शक्ल और सहमी हुई आँखें हम दूर से पहचान लेते।
तू हमें खाना परोस रहा था, ये देखकर हमें बहुत अजीब लगा। हम तुझे वहीं गले लगा लेते, लेकिन हम जानते हैं कि तेरा स्वाभिमान कितना बड़ा है। अगर हम तेरे मैनेजर और बाकी स्टाफ के सामने तुझे अपना दोस्त बताते, तो शायद तुझे अपनी उस नौकरी और उस जगह पर शर्मिंदगी महसूस होती। इसलिए हमने अनजान बनने का नाटक किया।
और हाँ, तुझे टिप देने की हमारी कोई औकात नहीं है। जिस दोस्त ने कॉलेज के दिनों में हमें भूखा नहीं सोने दिया, उसे हम चंद रुपयों की टिप देकर उसकी बेइज़्ज़ती कैसे कर सकते थे?
शहर के सबसे आलीशान ‘रॉयल पैलेस’ रिसॉर्ट की जगमगाती रोशनियों के बीच, राघव अपनी साधारण सी यूनिफॉर्म में एक कोने में खड़ा था। इस फाइव-स्टार होटल के रेस्तरां में वीआईपी मेहमानों की खातिरदारी करना उसका रोज़ का काम था। बड़े-बड़े झूमर, मेज़ों पर बिछी सफेद मखमली चादरें, और चांदी के बर्तनों की खनक—यह दुनिया राघव की उस असल ज़िंदगी से कोसों दूर थी जहाँ वह अपनी बीमार पत्नी और दो बच्चों के साथ एक तंग गली के छोटे से मकान में रहता था। एक वक्त था जब राघव की आँखों में भी बड़े सपने हुआ करते थे। वह अपने कॉलेज का सबसे होनहार छात्र था, लेकिन पिता के अचानक निधन और परिवार की ज़िम्मेदारियों ने उसे पढ़ाई बीच में ही छोड़ने पर मजबूर कर दिया। हालात ऐसे बने कि उसे वक़्त के थपेड़ों ने एक वेटर की ट्रे थमा दी।
आज शनिवार की शाम थी और रेस्तरां खचाखच भरा हुआ था। तभी मैनेजर ने उसे आवाज़ दी, “राघव! टेबल नंबर सात पर वीआईपी गेस्ट आए हैं। सर्विस में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।” राघव ने अपनी ट्रे संभाली और तेज़ी से उस कॉर्नर टेबल की तरफ बढ़ गया।
जैसे ही वह पानी के गिलास परोसने के लिए उस टेबल के पास पहुँचा, उसके कदम अचानक वहीं ठिठक गए। उसकी साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। सामने जो तीन लोग बैठे थे, वे कोई अजनबी नहीं थे। सूट-बूट में सजे, हाथों में महंगी घड़ियाँ और सामने रखे लेटेस्ट एप्पल लैपटॉप—ये शहर के जाने-माने बिज़नेसमैन लग रहे थे। लेकिन राघव के लिए वे सिर्फ बिज़नेसमैन नहीं थे। वे समीर, कबीर और निशांत थे। उसके बचपन के, स्कूल और कॉलेज के सबसे जिगरी यार।
पच्चीस साल! पूरे पच्चीस साल बाद वह उन्हें देख रहा था। राघव का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसका मन किया कि वह ट्रे वहीं फेंक दे और दौड़कर उन तीनों को गले लगा ले। वह चीख-चीख कर कहे, “अरे कबीर, तू तो मैथ्स में हमेशा फेल होता था, आज इतना बड़ा आदमी बन गया! समीर, तुझे याद है हम एक ही साइकिल पर बैठकर मीलों दूर घूमने जाते थे?” लेकिन उसके पैर ज़मीन से चिपके रहे। उसके गले से एक आवाज़ भी नहीं निकली।
राघव ने अपनी नज़रों को झुका लिया। उसे अपनी मामूली सी वेटर की वर्दी और घिसे हुए जूतों पर शर्म आने लगी। उसे लगा कि अगर उसने खुद को ज़ाहिर किया, तो शायद वे उसे पहचानेंगे ही नहीं, या फिर पहचान कर भी नज़रअंदाज़ कर देंगे। इतने बड़े लोग, इस आलीशान होटल में, एक वेटर को अपना दोस्त कैसे मान सकते हैं?
उसने कांपते हाथों से मेन्यू कार्ड उनके सामने रखा।
“एक्सक्यूज़ मी, क्या आप हमें आज का स्पेशल बता सकते हैं?” समीर ने बिना राघव की तरफ देखे, अपने फोन में कुछ टाइप करते हुए कहा।
राघव ने अपनी आवाज़ बदलकर, बहुत ही धीमी और पेशेवर आवाज़ में उन्हें डिशेज़ के नाम बताए। कबीर और निशांत आपस में किसी मल्टी-करोड़ प्रोजेक्ट की बातें कर रहे थे। उनकी बातें करोड़ों के टर्नओवर, शेयर मार्केट और नई फैक्ट्रियों के इर्द-गिर्द घूम रही थीं।
राघव चुपचाप उनका ऑर्डर लेकर वापस किचन की तरफ चला गया। जब वह खाना लेकर लौटा, तो उसने देखा कि तीनों बहुत ही शिद्दत से अपने लैपटॉप पर किसी नक्शे को देख रहे थे। राघव ने बहुत ही करीने से खाना परोसा। एक पल के लिए निशांत की नज़र राघव पर पड़ी। राघव का दिल धक से रह गया। उसने सोचा कि शायद अब निशांत उसे पहचान लेगा। लेकिन निशांत ने बस एक हल्की सी औपचारिकता वाली मुस्कान दी और वापस अपने काम में लग गया।
खाना खाने के दौरान भी राघव उनके आस-पास ही मंडराता रहा। उसे उम्मीद थी कि शायद कोई एक इशारा, कोई एक पुरानी बात, या उसकी कोई हरकत उन्हें पुराने दिनों की याद दिला दे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वे तीनों अपनी ही दुनिया में मग्न थे।
राघव का दिल भारी होने लगा। उसे अपनी उस बदकिस्मती पर रोना आ रहा था जिसने उसे इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया था। उसे याद आने लगे वो दिन जब कॉलेज की कैंटीन में एक ही समोसे के चार टुकड़े हुआ करते थे। जब निशांत के पास फीस भरने के पैसे नहीं थे, तो राघव ने अपनी गुल्लक तोड़कर उसकी मदद की थी। आज वही निशांत उसे देखकर भी नहीं पहचान पा रहा था। क्या सच में पैसा इंसान को इतना अंधा कर देता है? क्या कामयाबी की ऊंचाइयों पर पहुँचने के बाद पुरानी यादें और रिश्ते सिर्फ एक बोझ बन जाते हैं?
खाना खत्म हुआ। समीर ने अपना प्लेटिनम क्रेडिट कार्ड निकाला और बिल चुकाया। जाते-जाते कबीर ने वेटर (राघव) को एक अच्छी-खासी टिप देनी चाही, लेकिन समीर ने उसे रोक दिया और कुछ फुसफुसाया। कबीर ने पैसे वापस रख लिए।
यह देखकर राघव को और भी गहरी चोट लगी। “इतने बड़े आदमी बन गए हैं, लेकिन एक वेटर को टिप देने में भी इनकी जान निकलती है,” राघव ने मन ही मन कड़वाहट से सोचा।
तीनों दोस्त अपनी-अपनी लग्ज़री कारों में बैठकर वहाँ से चले गए। राघव थके हुए कदमों से उनकी टेबल साफ करने पहुँचा। उसकी आँखों में आंसू तैर रहे थे। आज उसे अपनी गरीबी का जितना एहसास हो रहा था, उतना ज़िंदगी में पहले कभी नहीं हुआ था। उसने गहरी साँस ली, खुद को संभाला और झूठी प्लेटें उठाने लगा।
तभी उसकी नज़र टेबल पर रखे एक खूबसूरत, सुनहरे किनारे वाले नैपकिन पर पड़ी, जिसे एक पानी के गिलास के नीचे दबाकर रखा गया था। राघव ने सोचा कि शायद किसी ने कुछ हिसाब-किताब लिखकर छोड़ दिया होगा। वह उसे उठाकर डस्टबिन में डालने ही वाला था कि तभी उसे उस पर नीले पेन से कुछ लिखा हुआ दिखाई दिया। लिखाई देखते ही राघव के हाथ ठिठक गए। यह लिखाई वह हज़ारों की भीड़ में भी पहचान सकता था। यह कबीर की लिखाई थी।
राघव ने धड़कते दिल से उस नैपकिन को खोला। उस पर लिखा था:
“अबे ओए किताबी कीड़े! तुझे क्या लगा, तू आवाज़ बदलेगा और मूंछें बढ़ा लेगा तो हम तुझे पहचान नहीं पाएंगे? साले, पच्चीस साल तो क्या, अगर पच्चीस जनम भी बीत जाते, तो भी तेरी ये झुकी हुई शक्ल और सहमी हुई आँखें हम दूर से पहचान लेते।
तू हमें खाना परोस रहा था, ये देखकर हमें बहुत अजीब लगा। हम तुझे वहीं गले लगा लेते, लेकिन हम जानते हैं कि तेरा स्वाभिमान कितना बड़ा है। अगर हम तेरे मैनेजर और बाकी स्टाफ के सामने तुझे अपना दोस्त बताते, तो शायद तुझे अपनी उस नौकरी और उस जगह पर शर्मिंदगी महसूस होती। इसलिए हमने अनजान बनने का नाटक किया।
और हाँ, तुझे टिप देने की हमारी कोई औकात नहीं है। जिस दोस्त ने कॉलेज के दिनों में हमें भूखा नहीं सोने दिया, उसे हम चंद रुपयों की टिप देकर उसकी बेइज़्ज़ती कैसे कर सकते थे?
सुन मेरे भाई, हम शहर के इस बाहरी इलाके में एक बहुत बड़ा हेरिटेज रिज़ॉर्ट और ऑर्गेनिक फार्मिंग का प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं। ज़मीन खरीद ली है। लेकिन इस पूरे प्रोजेक्ट को संभालने के लिए हमें एक ऐसे इंसान की ज़रूरत है जिस पर हम खुद से ज़्यादा भरोसा कर सकें। एक ऐसा पार्टनर जो हमारे इस प्रोजेक्ट की नींव बन सके।
तेरी ये वेटर वाली नौकरी आज से खत्म। कल सुबह ठीक 10 बजे, शहर के उस पुराने पीपल के पेड़ के पास मिलना, जहाँ हम चाय पिया करते थे। अब से सारा काम तू ही संभालेगा और इस कंपनी में हमारी तरह तेरा भी बराबर का हिस्सा होगा। याद है ना, हम चारों ने कहा था कि एक दिन हम सब मिलकर कुछ बड़ा करेंगे? वो वक्त आ गया है। कल मिलते हैं, और हाँ, कल का समोसा तेरी तरफ से होगा!”
नीचे तीनों के हस्ताक्षर थे—समीर, कबीर और निशांत।
राघव की आँखें पूरी तरह से छलक पड़ीं। वह नैपकिन पकड़कर वहीं ज़मीन पर बैठ गया। उसके आँसुओं ने नैपकिन पर लिखी स्याही को थोड़ा धुंधला कर दिया था, लेकिन उसके मन पर छाई गरीबी और हीन भावना की धुंध पूरी तरह से साफ हो चुकी थी।
उसने डबडबाई आँखों से छत की ओर देखा, जैसे ईश्वर का धन्यवाद कर रहा हो। फिर उसने उस नैपकिन को बहुत ही प्यार से चूमा और अपनी शर्ट की बाईं जेब में, ठीक अपने दिल के पास रख लिया।
राघव को आज एहसास हुआ कि सच्चे दोस्त वो नहीं होते जो आपकी गरीबी या मजबूरी का मज़ाक उड़ाएं, या उस पर तरस खाएं। सच्चे दोस्त तो वो होते हैं जो आपकी कमज़ोरी को नज़रअंदाज़ करके, आपके आत्मसम्मान की रक्षा करते हैं। जो आपके बिना कहे आपके दिल का दर्द समझ लेते हैं और आपको वापस उस मुकाम पर खींच लाते हैं, जिसके आप असल में हक़दार होते हैं।
आज राघव खाली हाथ नहीं था। उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत थी—उसके सच्चे दोस्त। उसने अपनी वर्दी उतारी, मैनेजर को अपना इस्तीफा सौंपा और एक हल्की, सुकून भरी मुस्कान के साथ होटल के दरवाज़े से बाहर निकल गया, एक नई सुबह और एक नई ज़िंदगी का स्वागत करने के लिए।
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लेखिका : अंजना कपूर