कलयुग नही मतलबी युग चल रहा है – संगीता अग्रवाल

“बेटा तुम्हारी माँ की तबियत सही नहीं है वो हर पल तुम्हे याद करती हैं एक बार तुम आ जाओ गांव वैसे भी दो साल हो गए तुम्हे यहां आए हुए !” हरिहरण जी अपने बेटे सोमेश से फोन पर बोले। “ओहो बाबूजी मां की तबियत खराब है तो उन्हें डॉक्टरको दिखाओ मेरे आने से … Read more

लौटकर आऊंगा  – प्रियंका त्रिपाठी ‘पांडेय’

“छुटकी राखी की थाली सजाकर डेहरी पर बैठ भाई के आने का इंतजार कर रही थी। इंतजार करते-करते बचपन की यादों मे खो गई…” “छुटकी नीचे उतर तुझे मना किया है ना पेड़ पर मत चढ़ा कर।” “उतर रही हूं भैया।” “भैया तुम मुझे पेड़ पर चढ़ने से क्यों मना करते हो? जबकि तुम तो … Read more

 घुटन भरा रिश्ता – संगीता अग्रवाल

“रमिता ओ रमिता कहाँ मर गई ” अमित गुस्से मे ऑफिस से आते ही चिल्लाया। रसोई मे काम करती रमिता भाग कर आई… ” बोलिए” “बोलिए की बच्ची तुमने नैनी को फोन पर क्या कहा “ “मैने वही कहा जो सच था कि मैं आपकी पत्नी हूँ ” इसमे झूठ क्या बोला उसने पूछा था … Read more

मरना नहीं  – देवेन्द्र कुमार

=========== रामदयाल इस बड़ी दुनिया में अकेले रह गए थे। उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। वह दो-चार दिन ही बीमार रहीं। मोहल्ले वाले उन्हें अस्पताल ले गए। उन्होने ही भाग-दौड़ की। रामदयाल खुद बीमार थे। उनका लड़का मुंबई में रहता है। कई वर्षों से घर नहीं आया था। मां की मृत्यु का समाचार मिलने … Read more

रक्षा सूत्र ही सुरक्षा कवच हैं… –  संगीता त्रिपाठी 

 विभा निर्मला और किशोर जी की बहू थी उसने अनुज से प्रेम विवाह किया था। विवाह से पहले ही अनुज फौज में चला गया। विवाह के समय एक महीने की छुट्टी लेकर आया था। एक महीना कब बीत गया अनुज और विभा को पता नहीं चला। जब अनुज पोस्टिंग पर जाने लगा तो जाने क्यों … Read more

गुलाबी-बसंत –     मुकुन्द लाल

  उसकी आंँखों के आगे एक चमकदार गुलाबी कोहरा छा गया था, जो धीरे-धीरे संगीतमय ध्वनि के साथ छटने लगा। वृक्षों पर हरी-हरी पत्तियाँ मंद वायु के झोंकों के सहारे गले मिल रही थी, डालियों पर बैठी कोयल कूक रही थी, ‘ बसंतआ गया’, फूलों पर गुंजार करते भौरें गुन-गुना रहे थे, ‘ बसंत आ गया’, … Read more

आओ लौट चलें – सरिता गर्ग ‘सरि’

  श्वेत झीने परिधान में सरोवर से  निकली सद्य-स्नाता तुम किसी तपस्विनी का रूप धरे मेरा तप भंग कर गईं। मृणाल सी कटि तक लटके श्याम वर्णीय भुजंग का दंश पीता मैं ,नैनों के जाल में उलझा,जाने कितने शैल – शिखर पार करता अनजान घाटियों में उतर गया। तुम मेरे पास ही थीं कि माँ ने … Read more

शीतल झोंका – गीतांजलि गुप्ता।

शीना जैसे ही बैग उठा जब भी घर से निकलती  हमेशा अपनी माँ से झिडकी खाती माँ उसे हरेक बात में टोकती रहती उन्हें हमेशा बेटी से नाराज़गी ही रहती ये नहीं है कि शीना उनकी नाराजगी का कारण नहीं जानती पर क्या करे सब जैसा चल रहा है उसे बदलना इतना आसान भी तो … Read more

माँ की साड़ी – नीतिका गुप्ता

मां बेटी का रिश्ता होता ही ऐसा है दोनों आपस में अपना सुख दुख बांट सकती हैं लेकिन क्या बेटी की शादी होने के बाद बेटी का मां पर मां का बेटी पर कोई हक नहीं रह जाता।   मेरी शादी होने के बाद मेरी मम्मी  ने मुझे बिल्कुल पराया कर दिया। एक ऐसा ही … Read more

 ये कैसा रिश्ता है ? – स्मिता सिंह चौहान

हर लड़की की तरह मालिनी ने भी कितने सपने सँजोये थे अपने होने वाले राजकुमार की लेकिन उसे क्या पता था राजकुमार सिर्फ सपने मे अच्छे लगते  हैं असल ज़िंदगी की तो हक़ीक़त कुछ और होती है।  धूमधाम से शादी के बाद मालिनी अपने ससुराल पहुँच चुकी थी लेकिन जैसे ही सुबह हुई  “नहीं, मुझे … Read more

error: Content is protected !!