सौतेली मां स्वार्थी निकली – सुल्ताना खातून

पंखुड़ी आईसीयू में कितने ही सुइयों के बीच जकड़ी हुई थी, आज बारहवाँ दिन था लेकिन उसके हालत में कोई सुधार नहीं हुआ था, स्क्रीन पर चलते टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं अब सीधी होने को थी, ऐसा लग रहा था पंखुड़ी जीने की कोशिश ही नहीं कर रही थी, वह बीमारी के पहले दिन से बेसुध पड़ी … Read more

“इंतहा स्वार्थ की” – कुमुद मोहन

“देखो बेटा। मैं अब अगले महीने रिटायर होने वाला हूँ। बहुत दिनों से अम्मा के मोतियाबिंद का आपरेशन टाल रहा था कि ऑफिस से छुट्टी पाऊंगा तो आराम से करा दूंगा। हमारा खर्च तो मेरी पेंशन में जैसे तैसे हो जाएगा। मैं ये चाहता हूँ कि तुम भी अब घर के खर्चे में थोड़ा भार … Read more

“जीवन संध्या के दिये” – कुमुद मोहन 

धन तेरस का दिन !शाम का धुंधलका छाने लगा था,कार्तिक मास की कुनकुनी सी ठंड देह को सिहरा रही थी !बीना जी खिडकी के पास बैठी आसमान पर चमकते तारों को देखती अपने ही खयालों में गुम थी कि “कहां हो? की आवाज देते मुकेश जी घर में घुसे! “अरे!अंधेरे में क्यूं बैठी हो ?लाइट … Read more

हम तो उनके बच्चे ही हैं – नीरजा कृष्णा

विमल जी का मन आज ऑफिस में लग ही नही रहा था…वो बार बार घड़ी देख रहे थे…उनके घर  में दीपावली पर घर के सभी सदस्यों के नए कपड़े बनते हैं…सभी लोग नए वस्त्रों को धारण करके ही पूजा पर बैठते हैं। अम्मा कई दिनों से हल्ला कर रही हैं। आज तो उन्होने अनशन तक … Read more

मैं बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं बनूँगी – सुल्ताना खातून 

रात को एक बजे अपनी चार वर्षीय, बुखार से तपती बेटी को कंधे पर उठाए, वह तेज़ कदमों से चली जा रही थी, ऐसा लग रहा था मानो वह दौड़ रही हो, और कैसे ना दौड़ती माँ थी, उसके नाज़ुक कंधे अब मजबूत हो चुके थे…1 किलो मीटर पैदल चलना उसके लिए कुछ भी न … Read more

गोलगप्पा – संगीता अग्रवाल

“चलो भई आज तो गोलगप्पे की पार्टी हो जाए नई बहु रिया के आने की ख़ुशी में !” घर के मझले बेटे अमन की शादी के तीसरे दिन सभी मेहमानों के जाने के बाद घर की बड़ी बहु रीना ने कहा। “नेकी और बुझ बुझ भाभी मैं अभी लाया ” घर के छोटे बेटे दिव्यम् … Read more

 गाँव – विनय कुमार मिश्रा

रामेश्वर काका का लड़का जब दसवीं में पास हुआ था, तो बाउजी पूरे गाँव को उसका रिजल्ट बताते थे। मोहन और मैं जब परीक्षा देने जाते तो रामेश्वर काका हमारे साथ जाते। सुगनी अम्मा किसी और के बच्चे को निवाला खिलाती, तो सुगनी अम्मा की बिटिया हाट बाजार में चंपा बुआ के साथ जाती। किसी … Read more

जब जागो तभी सबेरा – कमलेश राणा

जब जीवन में नैराश्य का घोर अंधकार छाया हो, जीवन नैया झंझावातों के भंवर में हिचकोले खा रही हो, दूर दूर तक किनारा नज़र न आ रहा हो तब रोशनी की नन्हीं सी किरण भी उम्मीद जगा जाती है, जीने की, आगे बढ़ने की।  नवीन के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। वह … Read more

मेरा परिवार – माता प्रसाद दुबे

विकास! तुम हमेशा देर से आते हो.तुम्हें यह ख्याल ही नहीं रहता..कि कोई तुम्हारा इंतजार कर रहा है?”गीता विकास को देखकर शिकायत करते हुए बोली। गीता! तुम्हारी बात जायज है..मगर क्या करूं आफिस से लौटकर मैं जल्दी घर जाता हूं..मम्मी मेरी राह तकती रहती है..जब तक मैं घर नहीं पहुंच जाता मम्मी परेशान होती है?”विकास … Read more

” उम्र खुशियों की मोहताज़ नहीं होती ” – कुमुद मोहन 

काॅल बेल बजी, देखा एक 10-12साल का लड़का कैरी बैग लिए खड़ा था,” क्या काम है ” सीमा ने पूछा, वो कोने वाली कोठी से आंटी ने भेजा है,खोला तो देखा थोड़ा सा ताजा पालक,मेथी,टमाटर, हरी धनिया और,एक टुकड़ा कद्दू, करौंदे,नींबू ?इतनी ताज़ी सब्जियां देख कर उसे मज़ा आ गया।         सीमा और अतुल कालोनी … Read more

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