एनुअल फ़ंक्शन – संजय मृदुल

एक घण्टे के इंतज़ार के बाद जब खुशी बाहर आई तो निशा की आंख भर आई। ख़ुशी का उतरा हुआ चेहरा, थका हुआ शरीर बयान कर रहे थे उसकी हालत। निशा को इतना गुस्सा आया कि लगा जाकर उसकी टीचर को मन भर के सुनाए। फिर किसी तरह ज़ब्त किया उसने गुस्सा अपना और खुशी … Read more

मेरे जैसी हुई तो “शादी” करेगा ना? –  मीनू झा

चिल्ल माॅम…आप दूसरों की बातें सुनते ही क्यों हो..कौन क्या,कब कैसे इनमें दिमाग लगाने की क्या जरूरत है..आप यहां मेरे लिए आए हो तो सिर्फ मेरे बारे में सोचो ना, मुझे अच्छा लग रहा है आपको अच्छा लग रहा है और क्या चाहिए?–रेयांश अपनी मां केतकी को समझा रहा था. वही बात तो मैं भी … Read more

 ” भले घर की बहु ” – डॉ. सुनील शर्मा

जब कलम लेकर लिखने बैठता हूं तो अपने आस पास बिखरी सैंकडों कहानियां पाता हूं जिनके किरदार आगे आ आकर कहते हैं कि उन पर भी कुछ लिखूं. आज यादों में ऐसा ही एक किरदार उभर कर आया, हमारी गली के नुक्कड़ पर बैठा मोची…रामलाल जबसे होश संभाला, रामलाल को मैंने हर रोज़ बिना नागा … Read more

 ‘ ममता ‘ –  विभा गुप्ता

 ” सीमा, तुम्हारा टेस्ट पाॅज़िटीव आया है,तुम माँ बनने वाली हो।” सुनकर उसे समझ नहीं आया कि ये खुशी की बात है या दुख की।उसके अंदर एक जीव पल रहा है, इस अहसास से वह आनंदित हो रही थी तो यह सोचकर कि कोई अपनी हवस बुझाकर निशानी उसकी कोख में छोड़ गया है,उसे घृणा … Read more

“जैसे संस्कार-वैसा व्यवहार” – कुमुद मोहन

ब्याह के दस साल बाद भी राजन और  उमा संतान सुख से वंचित रहे! संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने हर मंदिर में दिये जलाऐ,हर चौखट पर माथा टेका,हर मजार ,दरगाह पर चादर चढ़ाई,हर गुरूद्वारे पर अरदास लगाई! जाने कितने व्रत अनुष्ठान कराऐ! आखिरकार भगवान ने उन की सुन ली! उनके घर विनय के रूप में … Read more

संस्कारी बहू  – डा. मधु आंधीवाल

  अभी कुछ महीने पहले ही तो सामने वाले मकान में वह दुल्हन बन कर आई थी पर उसका स्वागत बहुत ही ठंडे वातावरण में हुआ । कोमल सी लता जी त तरह स्वर्णिम आभा लिये हुये भयभीत हिरनी की तरह नाम था कनक और उसके जीवन साथी का नाम था स्वप्निल । दोनों का प्रेम … Read more

हमारा धर्म और संस्कार यही कहते है। – ऋचा उनियाल बोंठीयाल

“ये क्या है? इतना बेस्वाद खाना बनाया है। थू…. छी!!! नमक इतना भर कर डाला है सब्ज़ी में।  बुड्ढी होने को आई हो और अभी तक खाना बनाने का सलीका नहीं सीखी हो । “ गुस्से से रमेश ने खाने की थाली ज़मीन पर पटक दी, और लड़खड़ाता हुआ खटिया पर बेसुध सा लुढ़क गया। … Read more

” मर्यादा ” – सीमा वर्मा

 हिमांशी अकेली सैर कर रही हो साहिल नहीं आता है तुम्हारे साथ ? ‘ नहीं ‘ हिमांशी कुछ समझ नहीं पा रही है, उसके दिल में हजारों सवाल है। वह जितना ही इन सवालों के घेरे से निकलने की कोशिश करती है उतनी ही उलझती जाती है। साहिल और उसके बीच का रिश्ता पति-पत्नी के … Read more

बहू की रोटी ! – रमेश चंद्र शर्मा

संध्या की निमिष से  शादी हुए पांछ महीने बीत गए। घर में बुज़ुर्ग सास निशा और ससुर उमेश। खाना बनाने में संध्या की बिल्कुल रुचि नहीं । नया सीखने की कभी कोशिश नहीं की । आराम तलब। निशा (पति उमेश से) ” आजकल पेट में बहुत गड़बड़ रहने लगी है । संध्या की खाने बनाने … Read more

“चटपटी यादें बचपन की” – कविता भड़ाना

नमस्कार 🙏 आज बालदिवस पर मुझे अपने बचपन की एक मजेदार घटना याद आ गई तो सोचा क्यों ना आप सब के साथ सांझा की जाए, तो ये घटना तब की है जब में आठवीं कक्षा में थी। अपनी कक्षा के सबसे बड़े शरारती बच्चो में से एक थी, लड़ाई झगड़े और टीचरों से शिकायते … Read more

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