वजूद की तलाश

“कहते हैं बुढ़ापे में इंसान को सिर्फ आराम चाहिए होता है, लेकिन जब आराम की कीमत आपका आत्मसम्मान हो, तो मखमल का बिस्तर भी कांटों जैसा चुभने लगता है। क्या एक माँ अपने ही बनाए घोंसले में सिर्फ एक ‘फालतू सामान’ बनकर रह सकती है, जिसे हर कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से इस्तेमाल करे?” … Read more

दौलत की चाबी

“जिस इंसान ने अपनी पूरी ज़िंदगी एक-एक पैसा जोड़ने में लगा दी, उसने अपने बुढ़ापे का इकलौता सहारा अपनी बहू के नाम क्यों कर दिया? यह कहानी उस ‘खाली हाथ’ की है, जिसने पूरी दुनिया की खुशियां समेट लीं।” लेकिन जब वकील ने कागज़ात पढ़े, तो पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। कैलाशनाथ जी ने … Read more

शक का कोहरा

 “एक छोटी सी गलतफहमी और पल भर का क्रोध कैसे सालों के विश्वास को राख कर देता है, और जब सच सामने आता है, तो इंसान अपनी ही नज़रों में कैसे गिर जाता है… यह कहानी उसी खौफनाक सच का आईना है।” “तुम मुझसे अब और झूठ मत बोलो समीर! मेरे पास सारे सबूत हैं। … Read more

**मायके की वो “बेगानी” अलमारी और भाभी का प्रेम** – हर्षिता सिंह

*शादी के पांच साल बाद जब वह टूटे हुए स्वाभिमान के साथ भाई के चौखट पर लौटी, तो उसे लगा कि वह अब इस घर में सिर्फ एक ‘बोझ’ है। लेकिन एक दिन भाभी ने उसे घर की तिजोरी की चाबी थमाकर कुछ ऐसा कहा कि उसकी रूह तक कांप गई और आँखों से वर्षों … Read more

**वो दाग नहीं, ममता के हस्ताक्षर हैं** – मोहिनी मिश्रा

*किटी पार्टी की चकाचौंध में जब एक बुजुर्ग माँ से गलती हुई, तो मेहमानों ने नाक-भौं सिकोड़ ली। लेकिन 15 साल के पोते ने उस ‘गंदगी’ को जिस तरह अपनाया, उसने वहाँ मौजूद हर औरत के मेकअप के पीछे छिपे असली चेहरे को बेनकाब कर दिया।* आरव रुका नहीं। उसने अपनी दादी का गीला हाथ … Read more

कमरा नंबर 3 और पिता की वसीयत – शारदा सक्सेना

*बेटे ने “गाँव की धूल” कहकर पिता के बुलावे को ठुकरा दिया, लेकिन पिता की मौत के बाद जब उसने उस घर के बंद कमरे का दरवाज़ा खोला, तो वहां मिली एक ऐसी चीज़ जिसने उसके शहर के अहंकार को चकनाचूर कर दिया।* हरिशंकर जी का गला रुंध गया था। “बेटा, यह घर मैंने अपने … Read more

स्वाभिमान का मोल और खाकी की चमक – प्रियंका नाथ

*जिसने कभी दौलत के नशे में चूर होकर एक पिता की गरीबी का मजाक उड़ाया था, आज उसी पिता की बेटी ने अपनी कलम की ताकत से उस दौलत के साम्राज्य को हिला कर रख दिया। पढ़िए एक ऐसी बेटी की कहानी जिसने सोने के पिंजरे को ठुकरा कर आसमान चुना।* विक्रांत हंसा। “अरे, बुरा … Read more

**घरेलू औरत की अदृश्य कमाई** – विनीता सिंह

*”जिस पत्नी को वो ‘अनपढ़’ और ‘बोझ’ समझकर घर से निकालना चाहता था, जब माँ ने उसके त्याग और समर्पण का ‘हिसाब’ डायरी खोलकर दिखाया, तो लाखों कमाने वाले बेटे को अपनी ही दौलत कौड़ियों के भाव लगने लगी।”* “बस बहुत हो गया मां! मैं अब इस अनपढ़ औरत के साथ एक छत के नीचे … Read more

**पाप की नींव पर खड़ा पुण्य का महल** – कविया गोयल

*क्या एक औरत का हत्यारा होना जायज़ है अगर वो गुनाह उसने अपनी बेटी की आबरू और भविष्य को बचाने के लिए किया हो? पढ़िए एक ऐसी माँ की दास्तां जिसने अपनी बेटी के सपनों में रंग भरने के लिए अपनी आत्मा को हमेशा के लिए काला कर लिया। फैसला आपको करना है—वो माँ थी … Read more

**कर्मों की गूंज और बुढ़ापे की ‘एडवांस बुकिंग’** – मीना सहाय

*पत्नी ने सास को घर से निकालकर सोचा कि अब सुकून की जिंदगी शुरू होगी, लेकिन पति ने सालगिरह पर उसे एक ऐसा ‘तोहफा’ दिया कि उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। क्या हम अपने ही बुढ़ापे के लिए आज गड्ढा खोद रहे हैं?* — शाम के सात बज रहे थे। समीर ने जैसे … Read more

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