“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने…”

“आज तक कौन सा सुख पाया मेरी बेटी ने… अपने बाबुल के घर में… जो उसे यहां की याद आएगी… क्यों आएगी…!” यह कहते हुए रविंद्र जी ने एक लंबी, ठंडी आह भरी और धीरे-धीरे बिस्तर पर लेट गए। उनकी आंखें छत पर टिकी थीं, लेकिन मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। मन … Read more

वो देहरी… – कविता झा ‘अविका’

मांँ के पास आए हुए रिती को एक महीना पूरा होने को था और उसकी वापसी का समय भी नजदीक था। अगले ही दिन की ट्रेन थी। स्कूल की छुट्टियांँ खत्म हो गई थी तो अब वापस जाना जरूरी था वरना प्राइवेट स्कूल वाले टीचर को छुट्टी कहांँ देते हैं। रिती अपने पिता के समझाने … Read more

बड़े को सदा बड़प्पन ही दिखाना चाहिए – भगवती सक्सेना गौड़

आज हरिद्वार से घूमकर एक माह बाद सिद्धेश्वर जी अपनी पत्नी के साथ घर आये। ट्रेन/बस की लंबी यात्रा के बाद भी उनके चेहरे पर एक अजीब-सी ताजगी थी—हरिद्वार की हवा, गंगा के किनारे की शांति, मंदिरों की घंटियों की आवाज़ और आरती की लौ… मानो मन के किसी कोने में वर्षों से जमी थकान … Read more

माँ से जुड़ाव – अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’

विनय और तनवी एक दूसरे के पूरक थे। घर में अगर किसी बात पर अंतिम मुहर लगती तो वह विनय की होती—और तनवी वह मुहर बिना शिकायत, बिना बहस, बिना “क्यों” पूछे स्वीकार कर लेती। क्या मजाल कि बिन अपने पापा की मर्जी के खिलाफ तनवी कोई तिनका भी उठा ले। वह कभी अपनी पसंद … Read more

छन्नाक – उषा

और अचानक सुलभा ने डर कर आंखें बंद कर ली, कान में सुनाई दिया करम जली बर्बाद करने पर तुली हे। और चटाक मगर यह क्या कंधे पर एक सुखद स्पर्श  क्या हुआ बेटा रो क्यों रही है, एक कांच का गिलास हीं तो टूटा है और सुलभा जैसे सपनों से जागी, यह स्पर्श और … Read more

बहती गंगा में हाथ धोना – शनाया अहम 

बात उन दिनों की है जब राधिका कॉलेज में पढ़ रही थी, ये उसका कॉलेज का पहला ही साल था। राधिका पढ़ाई में तो होशियार थी ही, वो पाक कला में भी निपुण थी। उसके हाथ में जादू था और हर तरह का खाना वो मिनटों–सेकेंडों में बना देती थी। जो भी उसका बनाया खाना … Read more

बाबुल की यादें ” – कमलेश आहूजा

रमा बड़े दिनों बाद बहू-बेटे के साथ अपने पुराने घर आई थी। शहर में बेटे की नौकरी लग जाने के बाद वह वहीं रहने लगी थी, इसलिए यह घर कई महीनों से बंद पड़ा था। बाहर से देखने पर भी घर की खामोशी और भीतर की उदासी साफ झलकती थी—दरवाज़े की कुंडी पर जमी धूल, … Read more

प्यार की अनकही वसीयत

 क्या बुढ़ापे में एक-एक पैसे के लिए मोहताज की तरह जीना सच में लालच की निशानी होती है, या उस फटे हुए स्वेटर और घिसी हुई चप्पलों के पीछे कोई ऐसा मौन और गहरा बलिदान छिपा होता है, जिसे दुनिया की सतही नज़रें कभी नहीं देख पातीं? रोहन पैर पटकता हुआ पंडित जी के घर … Read more

“अहंकार की सिलवटें”

 क्या एक सास का खोखला अभिमान उसकी अपनी ही बेटी की इज्जत को दांव पर लगा सकता है? और क्या एक बहू, जिसे हमेशा ताने मिले हों, उसी घर की लाज बचाने के लिए अपनी ढाल आगे कर सकती है? नेहा अपनी सास, सुभद्रा देवी की बातें सुनकर चुप रही। वह जानती थी कि कुछ … Read more

रेशमी रिश्ते

क्या दौलत की चमक अपनों के उस निस्वार्थ प्यार को फीका कर सकती है, जो किसी शोरूम के टैग में नहीं, बल्कि रातों की नींद और भावनाओं में बुना होता है? पढ़िए कैसे एक महंगी जीवनशैली के नशे में चूर ननद ने अपनी ही भाभी के प्यार को ठुकराया, और कैसे एक समझदार सास ने … Read more

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