धोखा – सुनीता साहनी

नैना ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए पानी की बोतल खोली ही थी कि उसकी नज़र सामने वाली डेस्क पर टिकी सुहानी पर जा रुकी। ऑफिस की वह डेस्क, जो हमेशा हंसी-ठिठोली और चाय के कपों की खनक से गूंजती रहती थी, आज वहां एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। सुहानी, जो इस दफ्तर … Read more

किस्मत वाले – संगीता अग्रवाल

रामनाथ बाबू अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे, चश्मे के मोटे शीशों के पीछे से दीवार पर टंगी उस बड़ी सी तस्वीर को निहार रहे थे। तस्वीर में तीन जवान लड़के और एक गर्वित माता-पिता मुस्कुरा रहे थे। यह तस्वीर पंद्रह साल पुरानी थी। आज उस फ्रेम पर धूल की एक बारीक परत जम गई … Read more

बेटा क्यों हमारी नाक कटवाने पर तुला है – मुकेश पटेल

दिवाकर बाबू अपने ड्राइंग रूम में बेचैनी से टहल रहे थे। उनके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें थीं, जबकि कमरे का एसी पूरी ठंडक दे रहा था। सोफे के एक कोने में उनकी पत्नी, सुमति जी, सिर पकड़े बैठी थीं। घर में एक अजीब-सा भारीपन था, जैसा अक्सर तूफ़ान आने से पहले होता है। … Read more

अपने लिए जीना भी जरूरी है – मीता राकेश 

  रात के ग्यारह बज चुके थे। रसोई की सिंक में बर्तनों का एक पहाड़ खड़ा था और डाइनिंग टेबल पर बिखरे हुए जूठे प्लेट इस बात की गवाही दे रहे थे कि आज घर में दावत थी। वंदना ने एक गहरी सांस ली और अपनी कमर पर हाथ रखकर उसे सीधा करने की कोशिश की। … Read more

खाने का असली स्वाद तो बहू के हाथों में होता है, – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

रात के सन्नाटे में अस्पताल की मशीनों की बीप-बीप आवाज़ रोहन के कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी। आईसीयू के बाहर बेंच पर बैठा वह अपने हाथों में अपना सिर थामे हुए था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था—रसोई के फर्श पर बेसुध पड़ी सुमन और उसके चारों ओर … Read more

पछतावे की राख – डॉ पारुल अग्रवाल

पड़ोसियों और रिश्तेदारों की बातें सुनकर कावेरी देवी का गुस्सा थोड़ा शांत जरूर हुआ था, लेकिन उनके चेहरे पर अभी भी तमतमाहट साफ़ झलक रही थी। वे अपने बड़े बेटे, विक्रम, की बातों पर आँख मूंदकर विश्वास करती थीं, और आज विक्रम ने जो मंज़र पेश किया था, उसने कावेरी देवी के दिल में छोटे … Read more

यह दुनिया आपकी ‘रूल बुक’ से नहीं चलती – अर्चना खंडेलवाल 

सफेद रंग की ऑडी कार गैराज में आकर रुकी। अमित ने गाड़ी से उतरते ही जोर से दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। वह तेज कदमों से घर के अंदर दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में उसके पिता, रघुवीर जी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे एक डायरी में कुछ हिसाब … Read more

“नहीं चाहिए भीख के पैसे!” – बालेश्वर गुप्ता 

राघव एक प्रतिभाशाली मूर्तिकार था। उसकी उंगलियों में वो जादू था जो गीली मिट्टी में भी प्राण फूँक देता था। लेकिन कला की कद्र और पेट की भूख के बीच का फासला अक्सर बहुत लंबा होता है। उसके पिता, दीनानाथ जी, पुराने ज़माने के कारीगर थे जिन्होंने पूरी ज़िंदगी अभावों में गुजारी थी, लेकिन अपनी … Read more

“मेरी कोई इज्जत नहीं है क्या??” – अमिता कुचया

सफेद रंग की ऑडी कार गैराज में आकर रुकी। अमित ने गाड़ी से उतरते ही जोर से दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। वह तेज कदमों से घर के अंदर दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में उसके पिता, रघुवीर जी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे एक डायरी में कुछ हिसाब … Read more

पारस पत्थर – गरिमा चौधरी

विनय की आवाज़ में खीझ साफ़ झलक रही थी। उसने हाथ में पकड़ी हुई कलाई घड़ी को झुंझलाहट के साथ टेबल पर पटका। “सृष्टि! अब हद हो रही है। पिछले बीस मिनट से मैं मोज़े ढूंढ रहा हूँ और तुम हो कि उस ‘महारथी’ को दलिया खिलाने में व्यस्त हो। मेरी मीटिंग है आज, तुम्हें … Read more

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