संस्कारों का आईना – शारदा सक्सेना

 निर्मला देवी और सुमित, शालिनी का यह रूप देखकर सन्न रह गए। निर्मला देवी ने चिल्लाते हुए कहा, “जुबान लड़ा रही है तू मुझसे? ये हैं तेरे संस्कार?” “संस्कार!” शालिनी की आँखों से आंसू छलक पड़े, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। “संस्कारों की बात आप मत ही कीजिए माँ जी। जब मैं … Read more

पिंजरे की खुली उड़ान – मोहिनी मिश्रा

देविका, जो अब तक चुपचाप यह सब तमाशा देख रही थी, उसके भीतर का सोया हुआ ज्वालामुखी अचानक फट पड़ा। उसे उस बंद दरवाज़े के पीछे रोती हुई काव्या में अपनी ही परछाई नज़र आने लगी। बाइस साल पहले जब देविका ने अपने मायके में कॉलेज ट्रिप पर जाने की ज़िद की थी, तो उसके … Read more

मुखौटे के पीछे का सच – हर्षिता सिंह

 अंजलि रुकी नहीं, उसने आगे कहा, “समीर, दोस्ती निभाना बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या तुम्हें याद है जब दो साल पहले तुम्हारे पिताजी का एक्सीडेंट हुआ था? तब हमें अस्पताल में तुरंत एक लाख रुपये की ज़रूरत थी। तुमने वैभव को फोन किया था। उसने क्या कहा था? यही ना कि उसके व्यापार में … Read more

मौन की गवाही – रीमा साहू

सुमित्रा देवी हमेशा से एक अनुशासनप्रिय और सख्त मिजाज महिला रही थीं। उनका मानना था कि घर की बहू को घर के हर काम में निपुण होना चाहिए और उसे अपनी सास की हर छोटी-बड़ी बात को पत्थर की लकीर मानना चाहिए। उनकी बहू, काव्या, एक बहुत ही शांत, समझदार और संस्कारी लड़की थी। काव्या … Read more

 बंद दरवाज़े का रहस्य – महक दुआ

दोपहर का समय था। घर के आंगन में सन्नाटा पसरा हुआ था। विमला जी अपने कमरे में दोपहर की नींद लेने जा रही थीं, तभी उन्हें अपनी बहू काव्या के कमरे से बात करने की धीमी-धीमी आवाज़ सुनाई दी। काव्या फोन पर अपने पति अमित से बात कर रही थी। विमला जी के कदम अचानक … Read more

आँगन की धड़कन – सावित्री मल्होत्रा

देवेन्द्र बाबू के घर में उस दिन दीवाली जैसा माहौल था, हालांकि त्योहारों का मौसम अभी मीलों दूर था। उनके दो बेटों, समर और संकल्प के जन्म के पूरे पांच साल बाद घर में एक नन्ही किलकारी गूंजी थी। अस्पताल के उस छोटे से कमरे में जब नर्स ने गुलाबी तौलिये में लिपटी एक नन्ही … Read more

पिता का आँगन – गरिमा चौधरी

“हैलो…. पापा! मैं मेघा… प्रणाम। आप …..माँ…..रोहन….और काव्या.. सब कैसे हैं ?” फोन के रिसीवर को थामे हुए मेघा के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। उसकी आवाज़ में एक ऐसी घुटन थी, जैसे वह अपने आँसुओं के समंदर को होठों के पीछे रोकने की नाकाम कोशिश कर रही हो। दूसरी तरफ, शहर से सैकड़ों … Read more

एक नई सुबह – रमा शुक्ला

“हाँ बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं कल सुबह ही आ रही हूँ, और अब हमेशा के लिए आपके पास ही रहूँगी।” इतना कहकर नंदिनी ने फ़ोन रख दिया और वह फ़फक-फफककर रोने लगी। उसके आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कमरे के ठंडे फर्श पर घुटनों में सिर दिए … Read more

सिंदूर का शौर्य – निधि गुप्ता

नंदिनी की आँखों में खुशी के आंसू थे जब उसने पहली बार मेजर सिद्धार्थ को अपने जीवनसाथी के रूप में देखा था। सेना की जैतून के रंग वाली (ऑलिव ग्रीन) वर्दी में सजे सिद्धार्थ किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहे थे। नंदिनी हमेशा से एक फौजी की पत्नी बनने का सपना देखती थी। उसे … Read more

वात्सल्य के रेशमी धागे

विवाह की तैयारियों के बीच घर में चारों ओर रिश्तेदारों की चहल-पहल थी। फूलों की महक और शहनाई की धीमी धुनों के बीच एक कमरे में कुछ अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। रिया अपने सूटकेस में कपड़े रखते हुए बार-बार रुक जाती थी। उसके चेहरे पर शादी की खुशी से ज्यादा एक अनजानी सी … Read more

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