मैं आदर्श बहू नहीं बनना चाहती – शिल्पा अग्रवाल

कमरे में एसी की धीमी घड़घड़ाहट और बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था। रात के ग्यारह बज रहे थे। बेडसाइड लैंप की मद्धम रोशनी में अनन्या अपनी फाइल बंद कर रही थी जब उसके पति, रोहन ने करवट बदली और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ वह बात कही जो शायद वह पिछले दो घंटों से कहने की … Read more

ये कैसे संस्कार दिए हैं बेटी को? – रमा शुक्ला

रविवार की दोपहर थी, लेकिन मिसेज कुसुम के घर का तापमान किसी ज्वालामुखी की तरह उबल रहा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, जो खिड़कियों के कांच पर एक सुकून भरी थपकी दे रही थी, मगर घर के अंदर का माहौल इसके ठीक विपरीत था। ड्राइंग रूम में टीवी बंद पड़ा था, लेकिन कुसुम … Read more

भरोसा… अब नहीं – अंशुमान सक्सेना 

अमावस की काली रात थी और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन दिवाकर के मन में जो तूफ़ान चल रहा था, वह बाहर के मौसम से कहीं ज़्यादा भयानक था। वह अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ा था, उसके हाथ में एक नीला लिफाफा था जिसे उसने इतनी ज़ोर से भींच रखा था … Read more

ये औरतें भी न, छोटी-छोटी बातों को दिल पर लगा लेती हैं। – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

रात के ग्यारह बज चुके थे। मुंबई की उस गगनचुंबी इमारत के चौदहवें फ्लोर पर बने फ्लैट की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, सिवाय ड्राइंग रूम के एक कोने में जलते लैम्प के। सोफे पर पसरकर ३२ वर्षीय विहान अपने लैपटॉप में सिर गड़ाए हुए था। किचन से बर्तनों के खटकने की हल्की आवाज़ें आ रही … Read more

असली जेवर तो इंसान के संस्कार होते हैं। – रश्मि प्रकाश 

उदयपुर के भव्य ‘द लीला पैलेस’ होटल को दुल्हन की तरह सजाया गया था। यह सिर्फ एक शादी नहीं थी, बल्कि शहर के दो सबसे प्रतिष्ठित व्यापारिक घरानों—सिंघानिया और खन्ना परिवार—का मिलन था। हर तरफ विदेशी फूलों की सजावट, झूमते हुए क्रिस्टल शैंडलियर और शहनाई की गूंज थी। मेहमानों की लिस्ट में शहर के मेयर … Read more

ससुराल में भी कोई अपना होता है – संगीता अग्रवाल 

शाम के सात बज रहे थे, और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। बारिश की बूंदें खिड़की के कांच पर ठीक वैसे ही टकरा रही थीं जैसे नैना के दिल पर डर की दस्तक हो रही थी। वह अपने बेडरूम के कोने में, अलमारी के पास ज़मीन पर बैठी थी। उसके हाथ में एक मखमली … Read more

आप मेरी माँ जैसी हैं – कविया गोयल

बेंत की आराम कुर्सी पर बैठी 65 वर्षीय सुलोचना देवी की नजरें सामने दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर पर जमी थीं। तस्वीर धुंधली पड़ चुकी थी, ठीक वैसे ही जैसे उनकी यादों में अब वो पुराना, भरा-पूरा घर धुंधला हो गया था। बाहर तेज बारिश हो रही थी। खिड़की के कांच से टकराती बूंदें … Read more

सिर्फ़ रिटायर हुईं हूँ फ्री नहीं हुईं हूँ – स्वाति जैन

सावित्री देवी ने अपने सूटकेस की आखिरी चेन बंद की और कमरे के चारों ओर एक संतोषजनक नज़र डाली। आज पैंतीस साल की लंबी और बेदाग़ नौकरी के बाद, वे ‘प्रिंसिपल सावित्री देवी’ के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। मेज पर रखे गुलदस्ते और विदाई समारोह में मिली शॉल उन्हें बार-बार यह अहसास दिला रहे … Read more

यह लड़की मेरे बुढ़ापे का सहारा नहीं, जंजाल बन गई है – आरती झा

शाम के साढ़े सात बज रहे थे। अपार्टमेंट की लिफ्ट से बाहर निकलते ही आर्यन को अपने फ्लैट के दरवाजे से आती हुई ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं। उसके कदमों की रफ्तार, जो दिन भर की थकान के कारण धीमी थी, अचानक तेज हो गई। यह कोई नई बात नहीं थी, लेकिन आज आवाज़ में … Read more

पाप और पुण्य – गरिमा चौधरी

बनारस के घाटों से थोड़ी दूर, एक पुरानी लेकिन बेहद भव्य हवेली ‘संस्कार भवन’ में आज सुबह से ही गहमागहमी थी। हवेली के मुखिया, पंडित दीनानाथ शास्त्री, शहर के माने हुए विद्वान और धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। आज का दिन उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। उनके दिवंगत पिता की 50वीं पुण्यतिथि थी … Read more

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