खनकते सिक्के

रवि एक मेधावी छात्र था। उसके पिता, सोहनलाल, एक पुरानी कपड़ा मिल में दिहाड़ी मज़दूर थे, जहाँ काम मिलने का कोई पक्का भरोसा नहीं होता था। माँ, कौशल्या, घर पर ही बीड़ी बनाने का काम करती थीं, जिससे घर में नमक-तेल का खर्च निकल आता था। रवि ने बारहवीं की परीक्षा ज़िले में टॉप की … Read more

 ब्याज़ में मिली इज़्ज़त – लतिका श्रीवास्तव 

“अंजलि ने जैसे ही उस पुराने, काई लगे लोहे के गेट का ताला खोला, उसकी माँ, सावित्री का हाथ कांप गया। वह चाबी, जो अंजलि ने अभी-अभी उनकी हथेली पर रखी थी, उसका वज़न सावित्री को पहाड़ जैसा लग रहा था। यह सिर्फ़ एक मकान की चाबी नहीं थी, यह उस खोए हुए सम्मान की … Read more

ममता की चौखट – हेमलता गुप्ता 

 गरिमा उस रात बहुत रोई। सुमित ने उसे समझाया, “गरिमा, माँ का स्वभाव ऐसा ही है। तुम दिल पर मत लो। मेरे लिए तुम ही इस घर की लक्ष्मी हो।” पर गरिमा के मन में एक सवाल घर कर गया था—क्या प्यार और सेवा का कोई मोल नहीं होता? क्या रिश्तों की बोली सिर्फ पैसों … Read more

फर्ज़ – रश्मि झा

“मैंने जो कहा, वो तूने सुना नहीं आरुषि? कल से तेरी जेठानी, वंदना, अस्पताल से घर आ रही है। डॉक्टर ने उसे पूरे दो महीने के ‘बेड-रेस्ट’ (बिस्तर पर आराम) के लिए कहा है। मैंने फैसला किया है कि तू अपनी यह ऑनलाइन नौकरी-वौकरी कुछ दिन के लिए बंद कर दे। घर की इज़्ज़त और … Read more

 माँ का अदृश्य दर्द – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

“चुप रहिये माँ जी!” काव्या पहली बार सास पर चिल्लाई, लेकिन इस चिल्लाने में डांट नहीं, बल्कि एक बेटी का अधिकार और डर था। “आप हमें अनाथ करके जाना चाहती हैं? इतना दर्द छिपाकर आप… आप हमारे लिए…” काव्या का गला रुंध गया। रसोई में कुकर की सीटी की आवाज़ ने सुमित्रा जी की तंद्रा … Read more

पुरानी नींव, नई दीवारें – लतिका श्रीवास्तव

“मुझे अपनी लाचारी पर गुस्सा आता है, सुमन। मुझे गुस्सा आता है कि मैं अब ‘जरूरत’ नहीं रही, बस एक ‘बोझ’ बन गई हूँ। जब मैं तुझे घर के काम करते देखती हूँ, तो मुझे अपनी जवानी याद आती है। और जब तू कोई काम छोड़ देती है या गलती करती है, तो मुझे लगता … Read more

बूढ़े हाथों की नई परिभाषा – रीमा ठाकुर

 “मुझे पता है, यदि एक बार कामवाली लगा ली या तुम पर छोड़ दिया, तो इन बर्तनों की चमक चली जाएगी। कामवाली तो बस ऊपर-ऊपर से कपड़ा मारती है। ये पूजा के बर्तन हैं, इनमें मेरी आत्मा बसती है। और रही बात मेरे दर्द की, तो शरीर चलता रहे तभी तक ठीक है। किसी पर … Read more

संस्कारों की असली परीक्षा – आरती झा 

“सुमित्रा, आज मेरे सामने से हट जाओ। आज या तो इस घर में मेरे उसूल रहेंगे या फिर यह कल का छोकरा, जिसे मैंने अपनी उंगली पकड़कर दुनिया दिखाई है।” दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक के बीच हरीशंकर जी की गरजती हुई आवाज़ ने घर के सन्नाटे को चीर दिया। उनका चेहरा गुस्से से … Read more

बेटे की गद्दारी? – डॉ पारुल अग्रवाल 

“वाह!” कावेरी देवी ने ताली बजाई। “अब बहू मुझे बताएगी कि मुझे कहाँ रहना है? यह मेरा घर है, तेरे ससुर की निशानी। मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी। और तुम दोनों का असल मकसद तो ‘अलग’ होना है। यह लिफ्ट और ऑफिस की दूरी तो बस बहाने हैं। साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते कि अब … Read more

विदाई के बाद का हक़ – संगीता श्रीवास्तव

कल्याणी देवी ने निवाला तोड़ते हुए बेटे की आँखों में देखा। “मोहित, जब तू दसवीं में फेल हुआ था और पड़ोसियों ने कहा था कि ‘शर्मा जी का लड़का तो आवारा हो गया’, तब मैंने तुझे घर से निकाला था क्या? नहीं न? तो आज जब तेरी बहन की ज़िंदगी में तूफ़ान आया है, तो … Read more

error: Content is protected !!