मखमल की कैद – गीता वाधवानी

यह अपमान सीधा काव्या के दिल पर लगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने देखा कि राजेश्वरी देवी भी दूर से यह दृश्य देख रही हैं और गुस्से में उनकी तरफ आ रही हैं। इससे पहले कि सास उसे डांटकर वहां से हटातीं, काव्या ने टेबल से एक पेंसिल उठाई। बाथरूम का नल पूरी तेज़ी … Read more

 चार लोगों का ‘छोटा’ सा संसार – प्रियंका पटेल 

“तो क्या हम बुढ़ापे में झाड़ू लगाएंगे?” निर्मला देवी ने बात काट दी। “अरे, हमारे ज़माने में तो दस-दस लोगों का खाना हम अकेले चूल्हे पर बनाते थे, कुएं से पानी भरते थे, हाथ से कपड़े धोते थे। और एक तुम हो कि गैस, मिक्सी, वाशिंग मशीन सब होने के बाद भी रोती रहती हो। … Read more

कागज़ के रिश्तें – निभा राजीव निर्वि 

मीरा ने कार का दरवाज़ा बंद किया और एक गहरी सांस ली। सामने फैमिली कोर्ट की वो पुरानी, मटमैली इमारत खड़ी थी, जहाँ हर रोज़ न जाने कितने रिश्ते फाइलों में दफ़न हो जाते थे। आज उसकी बारी थी। मीरा के पिता, मिस्टर शर्मा, ने उसका हाथ थाम रखा था, मानो उसे गिरने से बचा … Read more

वो खाली घर नहीं था – रश्मि झा मिश्रा

कार का हॉर्न तीन बार बजाने के बावजूद जब अंदर से गेट खोलने कोई नहीं आया, तो समीर के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसने ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे ही अपनी पत्नी, रिया की तरफ देखा। “देखा रिया? मैं तुमसे कहता था न कि माँ और बाबूजी वहां अकेले मुश्किल में हैं। अब … Read more

खामोश प्यार की गूंज – पुष्पा जोशी

दरवाजे की घंटी बजी तो सुमित्रा जी अपनी पुरानी आदत के मुताबिक थोड़ा बुदबुदाईं, “इस वक्त कौन आ गया? दोपहर की नींद का भी समय नहीं मिलता।” उन्होंने पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोला। सामने अपनी बेटी रिया को खड़ा देख उनकी आँखों में चमक आ गई। “अरे रिया! तू? और वो भी बिना बताए?” … Read more

वह मकान बिकाऊ नहीं है – के कामेश्वरी 

दीनानाथ जी ने अपने चश्मे को कुर्ते के कोने से साफ किया और फिर से नाक पर टिका लिया। सामने गेट पर पेंटर ‘शांति-कुंज’ लिख रहा था। नीले रंग के गेट पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जा रहा वह नाम दीनानाथ जी के लिए सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि चालीस साल की तपस्या का फल … Read more

पुराना कोट

 “सुधा! अभी तक बाबूजी नहीं आए?” समीर ने अपनी पत्नी से ऊँची आवाज़ में पूछा, जो रसोई में खाना गर्म कर रही थी। सुधा बाहर आई, उसके चेहरे पर भी चिंता थी। “नहीं, मैंने फोन भी किया था, पर वो उठा नहीं रहे। बारिश बहुत तेज़ है, शायद कहीं रुक गए होंगे। आप नाहक ही … Read more

अहंकार की राख

 सुमित्रा जी ने एक निवाला खाया और प्लेट सरका दी। “ये क्या बनाया है? इसमें न घी है न मेवा। हमारे यहाँ खाना शाही होता है। तुम्हें तो बस दाल-रोटी ही बनानी आती होगी। तुम्हारे बाप ने सिखाया ही क्या है?” शहर के पॉश इलाके में बने ‘विला नंबर 40’ के बाहर आज अलग ही … Read more

वक्त की बिसात

समीर रोता हुआ उठा था। उसे चोट शरीर पर नहीं, बल्कि रूह पर लगी थी। उस दिन उसके पिता रामदीन ने भी उसे डांटा था और समझाया था कि “बेटा, हम छोटे लोग हैं। हमें बड़े लोगों की बराबरी नहीं करनी चाहिए। वो सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और हम लोहे की कुदाल।” … Read more

सूटकेस में बंद खुशियां

शिखा ने आगे कहा, “पापा, हम आपको यहाँ ‘बोझ’ समझकर नहीं लाए हैं। सच तो यह है कि हमें आपकी ज़रूरत थी। उस घर की चारदीवारी में हम सिर्फ़ ‘ज़िम्मेदारियाँ’ निभा रहे थे, ‘रिश्ते’ नहीं। रवि को अपना बचपन याद आ रहा था, जब आप उसे कंधे पर बिठाकर घुमाते थे। आज वो आपको घुमाना … Read more

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