महंगाई – एम. पी. सिंह  

आज बजट पेश करते ही गलिओं मैं महंगाई की फुस फुसाहट शुरू हो गई. सब्जियाँ बहुत महँगी हो गई, रसोई का बजट बिगड गया है,वगैरह वगैरह.  क्या किसी ने कभी चर्चा की कि हमारा रहन सहन, खान पान, दिन चर्या और न जाने क्या क्या बदल गया. सच बात तो ये है कि हमारा अपने … Read more

एक पति का अपराध बोध – गीतू महाजन

पूरे 15 दिन हो गए थे उसे गए हुए..वो सब कुछ छोड़कर जा चुकी थी हमेशा के लिए।एक ऐसी जगह जहां से कोई भी लौटकर नहीं आता और पीछे छोड़ गई थी अपना भरा पूरा घर परिवार।कितना ही सहेज कर रखती थी वह अपने घर को।कितनी तन्मयता से सब कुछ संभालती।बाहर की फुलवारी से लेकर … Read more

उम्मीदों का दिया  – रश्मि प्रकाश 

**”दीदी!! ये घर हम दोनों बहुओं का है, तो इस घर की जिम्मेदारी भी हम दोनों की ही होनी चाहिए।** सिर्फ़ सुख में हिस्सा बंटाना ही बहू का धर्म नहीं होता, दुख में कंधा देना भी उसी का धर्म है। आप जेठानी हैं तो क्या हुआ? क्या मैं इस घर की बेटी नहीं?” बनारस के … Read more

वो कंगन का सच: एक खामोश कुर्बानी – विभा गुप्ता

“बात क्या है, मैं सब समझती हूँ!” कमला देवी ने बीच में ही बात काट दी। “जब से इस घर की चाबियाँ तेरे हाथ में दी हैं, तुझे लगने लगा है कि तू ही मालकिन है। अरे, वो कंगन मैंने तुझे अपनी पुश्तैनी कमाई से बनवाकर दिए थे। आज मेरी ही बेटी को पहनने के … Read more

 अनकही चिट्ठियाँ  – निभा राजीव 

सुमेधा का सब्र का बांध टूट गया। वह चिल्लाई, “रोज़! रोज़ यही सुनती हूँ मैं रवि। माँ की हालत खराब है, माँ को दवाई देनी है, माँ को नेबुलाइज़र लगाना है। **24 घंटे जब अपनी माँ की ही सेवा करनी थी, तो तुमने मुझसे शादी ही क्यों की?**  कमरे में सूटकेस बंद करने की तेज़ … Read more

पुरानी जड़ों की नई कोंपलें – आरती झा

“नहीं बहू, आज बात बढ़नी चाहिए,” सुमित्रा जी खड़ी हो गईं। उनका स्वर आज याचना का नहीं, अधिकार का था। “मैं जानती हूँ तुम पढ़ी-लिखी हो, इंटरनेट से बच्चे पालना सीखती हो। पर मैंने भी एक बच्चे को पाला है—तुम्हारे पति को। शहर के पॉश अपार्टमेंट ‘ग्रीन वुड्स’ की सातवीं मंजिल पर बने फ्लैट नंबर … Read more

बटवारे की दीवार – हेमलता गुप्ता 

मेघना ने आग में घी डालने का काम किया, “रवि भैया, बुरा मत मानिएगा, लेकिन विकास अकेले कितना करेंगे? अभी हमने नई कार बुक की है, घर की ईएमआई है, हमारे बंटी की कोचिंग फीस है। आप तो जानते हैं महंगाई कितनी है। आप थोड़ा हाथ-पैर मारिये, छोटी-मोटी कोई भी नौकरी कर लीजिये। अब हर … Read more

 कागज़ के फूल – करुणा मलिक

“रिया बेटा, तूने लाखों खर्च किए, तेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद। पर तू शायद भूल गई कि इस ‘पुराने तंग घर’ की हर ईंट में मेरी और तेरी माँ की जवानी, तुम्हारा बचपन और हमारे सुख-दुःख की गूंज बसी है। पेंटहाउस में एसी की ठंडक तो होगी, पर इन दीवारों जैसी गर्माहट नहीं होगी। तूने वो दिया … Read more

 माँ का ‘किरायेनामा – सीमा गुप्ता 

” सुमित्रा जी ने वकील साहब की तरफ देखा। वकील साहब ने गला साफ किया और बोले, “मिस्टर विकास, यह एग्रीमेंट आपके और आपकी पत्नी के नाम पर है। सुमित्रा देवी जी, जो इस मकान की मालकिन हैं, उन्होंने फैसला किया है कि अब से आप दोनों को इस घर में रहने के लिए किराया … Read more

 बंटवारा या बचाव – अर्चना झा

“आजकल की बहुएं तो ब्याहकर आते ही… अलग रहने की फरमाइशें शुरू कर देती हैं। न बड़ों का लिहाज, न घर की परंपरा की चिंता। बस अपनी आज़ादी चाहिए इन्हें।” कमला बुआ ने पान चबाते हुए पीकदान की तरफ मुँह किया और फिर बड़े ही व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा। आंगन में बैठी सावित्री देवी का … Read more

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