“वो खामोश मालकिन” – वर्षा मंडल

“सूट-बूट पहनकर बोर्ड मीटिंग में फैसले लेना ही सिर्फ़ आज़ादी नहीं होती, कभी-कभी घर की चारदीवारी में रहकर अपनी शर्तों पर दुनिया चलाना उससे भी बड़ी ताक़त होती है। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो नारीवाद (Feminism) की आपकी परिभाषा बदल देगी।” “तुम लोग समझती हो कि साड़ी पहनने वाली, धीमी आवाज़ में बात करने वाली … Read more

**वह परायी माँ**

**”नजर का इलाज डॉक्टर कर सकता है, लेकिन नजरिए का इलाज तो वक्त की ठोकर ही करती है। जब हम किसी को नफरत के चश्मे से देखते हैं, तो उसकी हर अच्छाई भी हमें साजिश नजर आती है।”** — आर्यन की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसका गला रुंध गया। उसे अपनी हर … Read more

फरेब – रीमा साहू

सुमित्रा देवी की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। जिस बेटे को उन्होंने ‘नकारा’ और ‘पत्थर’ समझा था, असल में वही उनकी नींव का पत्थर था। और जिस दामाद को उन्होंने ‘हीरा’ समझा था, वह केवल कांच का टुकड़ा निकला जो वक्त आने पर चुभ गया। कहानी का … Read more

एक छत के नीचे दो दुनिया

*बुढ़ापे की लाठी वो नहीं जो घर के कोने में रखी हो, बल्कि वो है जो लड़खड़ाते वक्त हाथ थाम ले, चाहे वो हाथ सात समंदर पार से ही क्यों न बढ़ा हो।* — फ़ोन रखने के बाद, रघुनाथ जी ने कड़वाहट से कहा, “विमला, तू कब तक झूठ बोलेगी? जो बेटी पांच सौ किलोमीटर … Read more

मुखौटा और आईना – विभा गुप्ता

*दुनिया के लिए जिसकी जुबान पर शहद घुला रहता है, घर की चारदीवारी में वही जुबान अपनी जन्मदात्री के लिए खंजर कैसे बन जाती है? क्या एक रिश्ता दूसरे रिश्ते की हत्या करके ही पनप सकता है?* —  “समीर, मैं एक औरत हूँ। और मैं अपना भविष्य देख रही हूँ। आज तुम्हारे पास जवानी है, … Read more

डिग्रियां तो बहुत मिलीं, मगर संस्कार सिलेबस से बाहर थे – रश्मि प्रकाश

*जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को ‘जज’ बनाया, आज वही बेटा अपनी मां को ‘कटघरे’ में खड़ा करके पूछ रहा था—”तुम मेरे स्टेटस में कहां फिट होती हो?”* — “मुझे बस एक बात बता दे बेटा,” जानकी की आवाज़ भर्रा गई, “तेरी उन मोटी-मोटी किताबों में, तेरे उस संविधान में, या तेरे उस … Read more

रद्दी में फेंका हुआ वो पुराना ‘नोट’ – मीना गुप्ता

*सरकार तो सिर्फ कागज के नोटों का रंग बदलती है, लेकिन जब अपनी ही खून-पसीने से पाली हुई औलाद का रंग बदलता है, तो इंसान जीते जी मर जाता है।* — *तुम्हारी हवेली के पैसे तुम्हें मुबारक हों। हमने उसे तुम्हें ‘दान’ कर दिया। लेकिन अपना स्वाभिमान हम तुम्हें दान नहीं कर सकते। मैं और … Read more

रिश्तों का तराजू – गरिमा चौधरी

*जब समर्पण का मूल्य केवल एक तरफ से चुकाया जाए, तो वह रिश्ता नहीं, सौदा बन जाता है। क्या एक पत्नी का धर्म सिर्फ पति के माता-पिता की सेवा करना है, जबकि पति उसके माता-पिता का हाल तक न पूछे?* — “मैं तुलना नहीं कर रही समीर, मैं समानता मांग रही हूँ,” रागिनी ने कहा। … Read more

रिमोट कंट्रोल वाली गृहस्थी – डॉ पारुल अग्रवाल

*शादी के बाद बेटी ‘परायी’ नहीं होती, लेकिन अगर वह अपने ससुराल को ‘अपना’ नहीं मानती, तो वह पूरी जिंदगी एक ऐसे सराय में गुजार देती है जहाँ उसका बिस्तर तो होता है, पर सुकून नहीं।*  “मीरा, क्या हम कभी एक बार भी बिना तुम्हारे ‘मायके’ के रेफरेंस के बात नहीं कर सकते? यह हमारा … Read more

माँ के बाद… बाबूजी का ‘मायका’ – रमा शुक्ला

 “माँ के जाने के बाद बेटी को लगा कि अब मायके के दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके हैं, वहां अब सिर्फ भाई-भाभी का राज होगा। लेकिन जब उसने ‘पराई’ होकर उस घर की देहरी लांघी, तो एक बूढ़े पिता ने अपनी कांपती हथेलियों में कुछ ऐसा थाम रखा था, जिसने ‘मायके’ की परिभाषा ही … Read more

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