झूठी शान के खंडर – संगीता अग्रवाल

“अक्सर हम जिसे अपना खून कहते हैं, वही हमारी रूह को छलनी कर देता है, और जिसे पराया समझते हैं, वो हमारे स्वाभिमान की ढाल बन जाता है। क्या एक बेटे के लिए ‘सच’ बड़ा है या ‘परिवार की झूठी इज़्ज़त’?” — “तमीज़ तो मैं तब भूल गया था भैया, जब मैंने अपनी आँखों से … Read more

पिंजरे की मैना – माधुरी शर्मा 

“क्या एक बेटी की डोली उठने के बाद, उसके घर लौटने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाता है? या फिर स्वाभिमान की लड़ाई में मायके की दहलीज़ लांघना कोई गुनाह नहीं?” “माँ-पापा, मुझे माफ़ कर दीजियेगा। मैं आपकी ‘अच्छी बेटी’ नहीं बन पाई जो चुपचाप जुल्म सह ले। लेकिन मैं एक ‘आत्मनिर्भर औरत’ … Read more

माटी की गुड़िया – अनिता गुप्ता

माँ ने अपने हाथों की लकीरें मिटाकर बेटे की तकदीर लिखी थी, लेकिन बेटे के ‘आधुनिक’ घर में उस माँ के लिए कोई कोना नहीं बचा। क्या एक बेटे की तरक्की उसकी माँ के आत्मसम्मान से बड़ी हो सकती है? सावित्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले। मूर्ति टूटने का दुख नहीं था, बेटे … Read more

गुणों का रंग – गरिमा चौधरी

** “क्या एक सांवली लड़की की डिग्रियां उसके रंग के आगे फीकी पड़ जाती हैं? और क्या लाखों का पैकेज लेने वाला प्राइवेट नौकरी का बेटा सरकारी चपरासी से भी कमतर है? पढ़िए समाज के उस दोहरे मापदंड की कहानी जिसने दो होनहार दिलों को एक ऐसे कटघरे में खड़ा कर दिया जहाँ फैसला गुणों … Read more

विश्वास की डोर – रमा शुक्ला

** “सुहागरात की वो सेज, जो फूलों से सजी थी, उस पर बैठी दुल्हन कांप रही थी—शर्म से नहीं, बल्कि एक डर से। एक ऐसा डर जो उसके अतीत के साये से जुड़ा था। क्या उसका पति उसका हाथ थामेगा या फिर समाज के तानों से डरकर उसे बीच मझधार में छोड़ देगा? जानिये राघव … Read more

“त्याग की आड़ में” – निधि गुप्ता

** क्या एक माँ का संघर्ष उसके बेटे की खुशियों का ‘आजीवन कारावास’ बन सकता है? क्या अतीत के दुखों की दुहाई देकर वर्तमान की खुशियों का गला घोंटना जायज़ है? जानिये सुमन की कहानी, जिसने ‘फर्ज’ और ‘गुलामी’ के बीच की लकीर खींच दी। — “बेटा! तुम मेरी बहू की उम्र की हो, इसलिए … Read more

नीम की कड़वाहट – नेहा पटेल

** एक बेटे को अपनी पत्नी “राक्षस” लगती थी जो उसकी बूढ़ी माँ को घुटनों के दर्द में भी पैदल चलाती थी। लेकिन जब डॉक्टर ने उस पत्नी के ‘जुल्म’ की असली वजह बताई, तो बेटे के पैरों तले से ज़मीन क्यों खिसक गई? विहान की आँखों में खून उतर आया। उसने अपनी माँ को … Read more

“तमाशा और मरहम” – सीमा श्रीवास्तव

:** जिस मोहल्ले की वाह-वाही लूटने के लिए आप अपने घर की इज्जत नीलाम कर रहे हैं, याद रखियेगा, बुढ़ापे में प्यास लगने पर पानी का गिलास वो मोहल्ला नहीं, वही ‘बुरी’ बहू लेकर आएगी। क्या दूसरों की सहानुभूति पाने की लत एक सास को इतना अंधा कर सकती है कि उसे अपनी बहू का … Read more

“बंद मुट्ठी की लाज” – आरती देवी

** क्या अपनी बहू की बुराई करके एक सास अपना मन हल्का करती है, या अपने ही घर की नींव में बारूद भर रही होती है? पढ़िए, कैसे एक सास की जुबान ने उसकी अपनी ही बेटी की खुशियों में आग लगा दी। समीर गुस्से में चिल्लाया, “माँ! मैंने अनिका को हजार बार कहा था … Read more

“वो खामोश मालकिन” – वर्षा मंडल

“सूट-बूट पहनकर बोर्ड मीटिंग में फैसले लेना ही सिर्फ़ आज़ादी नहीं होती, कभी-कभी घर की चारदीवारी में रहकर अपनी शर्तों पर दुनिया चलाना उससे भी बड़ी ताक़त होती है। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो नारीवाद (Feminism) की आपकी परिभाषा बदल देगी।” “तुम लोग समझती हो कि साड़ी पहनने वाली, धीमी आवाज़ में बात करने वाली … Read more

error: Content is protected !!