माता-पिता को सिर्फ रोटी और छत नहीं, प्यार और सम्मान चाहिए… – अर्चना खंडेलवाल

रमा और गोविंद जी भीतर ही भीतर घुट रहे थे, लेकिन उनकी घुटन से नेहा बिल्कुल बेखबर थी। उसे बस यही भरोसा था कि अब सास-ससुर उसके खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकते, क्योंकि बैंक खाते और प्रॉपर्टी के कागज़ उसी की पकड़ में थे। उसके लिए पैसा ताकत था—और ताकत के आगे रिश्ते अक्सर … Read more

रिश्ते अधिकार से नहीं, करुणा से चलते – सिम्मी मल्होत्रा

सविता की तबीयत दिन-ब-दिन अधिक बिगड़ने लगी थी। वह कई दिनों से बस एक ही बात दोहराती रहती—“मेरी बिटिया को देखना है… एक बार उसे देख लूं… बस एक बार।” उस दिन दोपहर के वक्त फोन बजा। नंबर मायके का था। दिल धक से रह गया, लेकिन जैसे ही मैंने रिसीवर उठाया, उधर से भाई … Read more

अहमियत – गरिमा चौधरी 

“तुम दोनों की शक्ल देखकर लग रहा है, बात कुछ बिगड़ी है,” आंगन में तुलसी को पानी देते-देते शारदा देवी की आवाज़ आई। उनकी उम्र अस्सी के आसपास थी, पर आँखों में वही चमक और शब्दों में वही वजन। पास ही बैठी बहू कृति रोटी सेंक रही थी और दामाद-पोती की जोड़ी—नव्या और आर्यन—चुपचाप एक-दूसरे … Read more

वसीयत – शिप्पी नारंग 

“वो भी बिना हमारी मर्जी जाने…!”ड्रॉइंग रूम में खड़े हर व्यक्ति के चेहरे पर अलग रंग था—कहीं झुंझलाहट, कहीं घबराहट, कहीं बनावटी मासूमियत। लेकिन सबसे स्थिर चेहरा था माधवी का, जो चुपचाप अपने ससुर विनोद के पास खड़ी थी। उसकी हथेलियाँ पसीने से भीग रही थीं, फिर भी उसने आंखें नीचे नहीं कीं। आज पहली … Read more

औलाद बेटा-बेटी नहीं होती… औलाद बस औलाद होती है – विधि जैन

घर के आँगन में तुलसी के पास खड़ी इंदु की उंगलियाँ काँप रही थीं। सामने बरामदे में बैठी उसकी जेठानी नीलम चाय की चुस्की लेते हुए फिर वही बात दोहरा रही थी—वो बात जो सालों से इंदु के कानों में काँटे की तरह चुभती आई थी। “अरे इंदु, बेटियाँ हैं तुम्हारी… ज्यादा पढ़ा-लिखाकर क्या करेगी? … Read more

शादी या समझौता – अर्चना खंडेलवाल

“तू पढ़-लिख गई, नौकरी कर रही है, अपने पैरों पर खड़ी है—बहुत अच्छा,” माँ ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए कहा, “पर जीवन सिर्फ अपने दम पर चल लेने का नाम नहीं है। हर स्त्री को कभी न कभी किसी का साथ चाहिए होता है। और तुझे शादी करनी होगी।” अदिति ने लैपटॉप … Read more

बदलाव – रोनिता कुंडु

“बस बहुत हो गया!”दहलीज़ पर खड़ी इशिता की आवाज़ में आज पहली बार काँप नहीं, आग थी। हाथ में उसके पुराने सर्टिफिकेट्स की फाइल थी और आँखों में वह चमक, जो वर्षों से भीतर दबाई गई थी। ड्रॉइंग रूम में सब बैठे थे—सास पद्मा देवी, पति नील, ननद सृष्टि, नील के मामा-मामी और दो-तीन रिश्तेदार, … Read more

तलाक़शुदा – अर्चना खंडेलवाल

“दीदी, मैं तुम्हें रोक नहीं रहा… बस सच बता रहा हूँ,” राघव ने शांत आवाज़ में कहा, “तुम नौकरी करती हो, अपने पैरों पर खड़ी हो—ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन जीवन सिर्फ अपने पैरों पर खड़े होने से नहीं चलता। जीवनसाथी और परिवार भी चाहिए। कल को मेरी शादी हो जाएगी, मैं अपने घर … Read more

**प्रीत की रीत** – अंजली शर्मा

    “सुरभि वैसे भी अपनी सास शारदा के आये दिन अनाथालय जाने, अनाथालय में जाकर दान करने वहाँ के बच्चों में सामान बाँटने से तंग आ गयी थी कितनी बार मना कर चुकी थी लेकिन शारदा है कि मानती ही नहीं थी। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था लेकिन, आज तो हद हो गयी जब … Read more

एक रिश्ता ऐसा भी ! – स्वाती जैंन !

निकल जाओ अभी की अभी मेरे घर से , मुझे लगा था शादी के बाद तुम हमारे घर को बच्चों की किलकारियों से भर दोगी मगर नहीं मेरा सपना तो कभी साकार ही नहीं होगा , मुझे और मेरे घर को तुम जैसी बांझ औरत की कोई जरूरत नहीं, मेरी मां को भी तुम जैसी … Read more

error: Content is protected !!