जज़्बातों का डाकिया  – रोनिता कुंडु 

*इस डिजिटल युग में जब उंगलियों के एक टच से संदेश पहुँच जाते हैं, तब एक बूढ़ा जोड़ा पुराने संदूक से स्याही और कलम निकालकर टूटे हुए दिलों को जोड़ने का काम कर रहा था। क्या उनकी यह ‘पुरानी आदत’ आज के ‘नए दौर’ के रिश्तों को बचा पाएगी?* “सुधा… ओ सुधा! अरे, वो नीला … Read more

सिंदूर का कर्ज  – लतिका श्रीवास्तव

*जब एक औरत पर लगा अपने ही जीजा के साथ अवैध संबंध का घिनौना आरोप, तो उसने अपनी पवित्रता की कसम खाने के बजाय स्वीकार कर लिया वो गुनाह जो उसने किया ही नहीं था। आखिर किस सच को छिपाने के लिए एक भाभी अपनी ही ननद की सुहाग की सेज उजाड़ने को तैयार हो … Read more

आंगन की तुलसी – संगीता अग्रवाल

“सुधा! अरे ओ सुधा! तू अभी तक रसोई में ही है? देख तो ड्राइंग रूम के पर्दों पर धूल जमी है या नहीं? मेरी ‘मल्लिका’ आ रही है। उसे धूल से एलर्जी है। अमेरिका में रहती है वो, वहां जैसा साफ़-सुथरा माहौल यहाँ भी मिलना चाहिए उसे।” सावित्री देवी की आवाज़ पूरे घर में गूंज … Read more

माँ का आईना – रश्मि प्रकाश 

सुशीला देवी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारा हो। उनका अपना ही तर्क, उनके अपने ही शब्द, अब उन्हें चुभ रहे थे। जो ममता अपनी बेटी के लिए उमड़ रही थी, वही ममता बहू के लिए क्यों सूख गई थी? उनके हाथ से फोन का रिसीवर लगभग छूट ही गया। … Read more

पहला प्यार – नीलम शर्मा

सागर और संध्या समुद्र किनारे बैठे अपने भविष्य के सपने सजाने में डूबे थे ।लहरों की आवाज और ठंडी -ठंडी हवा बड़ी रोमांटिक और सुहानी लग रही थी। संध्या ने सागर के हाथों को अपने हाथों में लिया और आंखें बंद करके सागर के कंधे पर सिर टिका दिया। सागर ने संध्या के गालों को … Read more

झूठी शान के परिंदे – मुकेश पटेल 

 “माँ-बाप अक्सर अपने बच्चों की ‘चमक’ देखकर इतना खुश हो जाते हैं कि यह देखना भूल जाते हैं कि वो चमक सोने की है या पीतल की; और जब तक सच सामने आता है, तब तक घर की नींव बिक चुकी होती है।” “अरे भाई साहब, आप तो किस्मत वाले हैं। बड़ा बेटा बंगलौर में … Read more

वो बंद कमरा – संगीता अग्रवाल

“जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को विदेश भेजा, ताकि वो ‘बड़ा आदमी’ बन सके, आज उसी बेटे के आलीशान बंगले में उस मां के लिए दो वक्त की रोटी और एक खुली खिड़की भी मयस्सर नहीं थी… आखिर क्यों रिश्तों की कीमत ईंट-पत्थरों से कम हो गई?” — शेखर का खून जम गया। … Read more

चांदी के बर्तन – राधिका गोखले

*हम अक्सर अपनों को खुश करने के लिए दौलत की चमक का सहारा लेते हैं, पर भूल जाते हैं कि बुजुर्गों की झुर्रियों में छिपी मुस्कान मखमली सोफों से नहीं, बल्कि अपनेपन के दो मीठे बोलों से खिलती है।* “मयंक,” हरिनाथ जी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा, “तुमने सोचा कि पैसा फेंककर तुम … Read more

**कर्मों की वसीयत: एक अबला का श्राप** – सुमन सक्सेना 

*”वक्त गूंगा नहीं होता, बस मौन रहता है। जब वह अपना फैसला सुनाता है, तो गवाहों की ज़रूरत नहीं पड़ती; इंसान की अपनी ही चीखें उसकी गवाही देती हैं।”* “मास्टर दीनानाथ जी, आप तो नाहक ही परेशान हो रहे हैं। अरे, लड़के वाले खुद चल कर आए हैं। वे कहते हैं उन्हें दहेज-वहेज कुछ नहीं … Read more

मौन घुंघरू – डॉ उर्मिला सिन्हा

*”पच्चीस साल तक उसने अपनी कला को रसोई के डिब्बों के पीछे छिपाए रखा, इस डर से कि दुनिया क्या कहेगी। लेकिन जब एक दिन उसके कदम थिरके, तो उसी दुनिया को अपनी हथेलियां लाल करनी पड़ीं। पढ़िए एक ऐसी मां की कहानी जिसने साबित किया कि सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।”* रमेश … Read more

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