सरोज के घर में सुनीता कई वर्षों से काम करती थी।वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन मेहनती और ईमानदार थी।अपनी छोटी-सी दुनिया में वह परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करती थी।
उसकी बेटी पूजा ने भी अब एक पैकेजिंग कंपनी में काम करना शुरू कर दिया था।पढ़ाई अधिक नहीं कर पाई थी,लेकिन नौकरी मिलने के बाद उसके भीतर जैसे एक नया आत्मविश्वास जन्म लेने लगा था।महीने के अंत में जब उसकी मेहनत की कमाई उसके हाथ में आती,तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती।
“माँ,अब मैं भी घर के खर्च में हाथ बँटा सकती हूँ।” वो अक्सर खुशी से कहती।
कुछ महीनों बाद पूजा की कंपनी ने कर्मचारियों का वेतन नकद देने के बजाय उनके बैंक खातों में जमा करना शुरू कर दिया।पूजा के लिए यह सब नया था। बैंक खाता, एटीएम कार्ड,पिन नंबर..इन सबकी उसे ज्यादा जानकारी नहीं थी।
परिवार के ही एक रिश्तेदार ने उसकी मदद की।उसने बैंक से संबंधित काम करवाने में पूजा की सहायता की और उसे एटीएम से पैसे निकालना भी सिखाया।सुनीता और पूजा उसके बहुत आभारी थे।
सरोज भी उस रिश्तेदार को जानती थी।वह अक्सर सुनीता के घर आता-जाता था और परिवार का विश्वासपात्र माना जाता था।
एक दिन सुनीता परेशान होकर सरोज के पास आई और बोली-“भाभी,इस महीने कंपनी ने पूजा को पगार नहीं दी।”
सरोज ने आश्चर्य से पूछा-“कंपनी ने नहीं दी या खाते में नहीं आई?”
“पूजा ने कंपनी में पूछा था। उन्होंने कहा है कि पैसे तो उसके बैंक खाते में जमा कर दिए गए हैं।”
“तो फिर बैंक जाकर पता करो।”
अगले दिन सुनीता के कहने पर पूजा बैंक गई।खाते का स्टेटमेंट निकलवाया तो पता चला,कि कंपनी ने सचमुच उसकी तनख्वाह जमा की थी,लेकिन उसके कुछ ही समय बाद खाते से पैसे निकाल लिए गए थे।
पूजा के पैरों तले जमीन खिसक गई।वो सोचने लगी..
“पैसे किसने निकाले ?” किसी के पास इसका उत्तर नहीं था।वो सरोज के पास आई और सारी बात बताई।
सरोज ने उसे समझाया-“सबसे पहले अपना एटीएम कार्ड संभालकर रखो और पिन नंबर बदल दो।और हाँ,अपना पिन किसी को मत बताना।”
पूजा ने वैसा ही किया।
कुछ दिन बीते।सबको लगा कि अब समस्या खत्म हो गई होगी।लेकिन अगले महीने फिर वही हुआ।
कंपनी ने पूजा की तनख्वाह उसके खाते में जमा की और कुछ समय बाद पैसे फिर गायब हो गए।पूजा ने फिर सरोज के सब बताया।
इस बार सरोज गंभीर हो गई।
“ऐसा बार-बार नहीं हो सकता। जरूर किसी को तुम्हारे एटीएम की जानकारी है।”
पूजा ने सिर झुका लिया।
सरोज की सोच कई दिशाओं में दौड़ने लगी।उसने एक-एक संभावना पर विचार किया।कौन उसके खाते के बारे में जानता है? किसे उसका पिन पता हो सकता है? उसके एटीएम कार्ड तक किसकी पहुँच रही होगी?
अचानक उसके मन में एक चेहरा उभरा।
वही रिश्तेदार।
वही,जिसने पूजा को एटीएम चलाना सिखाया था।
सरोज को शक तो पहले से था,लेकिन वह सीधे सुनीता से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।आखिर वह उसका अपना रिश्तेदार था।जिस पर सुनीता आँख मूँदकर भरोसा करती थी।
एक दिन सरोज ने बातों-बातों में सुनीता से कहा-“सुनीता,बैंक और एटीएम से जुड़ी कोई भी जानकारी किसी को मत देना।अपने बहुत करीबी लोगों को भी नहीं।”
सुनीता हँसकर बोली-“भाभी,अपने लोगों से भी क्या छिपाना?वह तो हमारा अपना है।उसी ने तो पूजा की मदद की थी।”
सरोज चुप हो गई।उसे लगा,कभी-कभी किसी को सच्चाई समझाना आसान होता है,लेकिन उसके विश्वास को तोड़ना बहुत कठिन।उसने ज्यादा जोर नहीं दिया।
कुछ दिनों बाद सरोज खुद पूजा को लेकर एटीएम गई। उसने उसका पिन दोबारा बदलवाया और इस बार उसे बहुत गंभीरता से समझाया-
“देखो पूजा, तुम्हें अपनी मेहनत की कमाई बचानी है तो अपना पिन किसी को भी मत बताना।न दोस्त को,न रिश्तेदार को…किसी को भी नहीं।और एटीएम कार्ड भी किसी को मत देना।”
पूजा इस बार बात को पूरी तरह समझ गई।
“आंटी,अब मैं किसी को नहीं बताऊँगी।” उस दिन उसने पहली बार अपने पैसे की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझा।
अगले महीने कंपनी की तनख्वाह फिर उसके खाते में आई।
एक दिन बीता।
फिर दूसरा।
पैसे खाते में सुरक्षित थे।
पूजा ने मोबाइल पर बैंक बैलेंस देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“माँ…इस बार पैसे नहीं निकले!”
सुनीता ने राहत की साँस ली।उसने सरोज को ये बात बताई तो वो कुछ नहीं बोली।उसके मन में जो संदेह था,अब वह लगभग यकीन में बदल चुका था।
पूजा की मेहनत की कमाई तभी सुरक्षित हुई थी,जब उसके बैंक की जानकारी और पिन किसी दूसरे के पास नहीं रहे।धीरे-धीरे सुनीता को भी सब समझ में आने लगा।उस रिश्तेदार से उसने कोई झगड़ा नहीं किया।कोई आरोप नहीं लगाया। बस उसके घर आने पर पहले जैसा अपनापन नहीं रहा।पूजा भी अब उसके सामने बैंक,नौकरी या अपनी तनख्वाह से जुड़ी कोई बात नहीं करती थी।
जिस घर के दरवाजे उसके लिए हमेशा खुले रहते थे,वहाँ अब एक अनकही दूरी खड़ी हो गई थी।शुरुआत में वह इस बदलाव को समझ नहीं पाया।
फिर एक दिन उसने सुनीता से पूछा-“क्या बात है? आजकल तुम लोग मुझसे दूर-दूर क्यों रहते हो?”
सुनीता कुछ पल चुप रही।फिर बोली-
“कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं…बस उन पर से विश्वास उठ जाता है।”
वह रिश्तेदार कुछ बोला नहीं चुप रहा,शायद उसे अपने किए का उत्तर मिल चुका था।उसने कुछ रुपये तो निकाल लिए थे,लेकिन उन रुपयों के साथ उसने उस घर का विश्वास खो दिया था,जहाँ कभी उसे अपनेपन का अधिकार मिला था।अब उसे महसूस होने लगा था कि पैसे तो कब के खर्च हो गए,लेकिन उनके बदले जो खोया था,वह वापस नहीं आएगा।कभी जिस घर में वह बेझिझक आता-जाता था,अब वहाँ आने से पहले उसे सोचना पड़ता था।उसे पहली बार समझ आया,कि विश्वासघात की कीमत पैसे से नहीं चुकानी पड़ती…रिश्तों से चुकानी पड़ती है।
उधर सुनीता ने भी इस घटना से एक गहरी सीख ली।उसने तय किया कि अब वह किसी पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करेगी।अपने हों या पराए, पैसों और जरूरी जानकारी के मामले में वह हमेशा सावधान रहेगी।
सरोज ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा-
“सुनीता, विश्वास करना गलत नहीं है। लेकिन विश्वास के साथ विवेक भी जरूरी है।क्योंकि सच्चे रिश्ते हमारी सरलता का फायदा नहीं उठाते, उसकी रक्षा करते हैं।”
सुनीता की आँखें भर आईं।
दोस्तों धन खो जाए तो मेहनत से वापस पाया जा सकता है,
मगर विश्वास खो जाए तो वर्षों की निकटता भी उसे वापस नहीं ला पाती।विश्वास किसी रिश्ते की सबसे बड़ी पूँजी है।इसलिए किसी के विश्वास का गलत फायदा मत उठाइए।क्योंकि विश्वासघात से आप सामने वाले को जितना दुख देते हैं,उससे कहीं अधिक अपने ही रिश्तों को खो देते हैं।
कमलेश आहूजा
#विश्वासघात