“बस बहुत हो गया” – कमलेश आहूजा

दीवाली का दूसरा दिन था।सरोज ने पति रमेश से कहा-“चलो जी इस बार हम लोग ही सबके घर जाते हैं दीवाली की राम राम कहने।”

“फिर समय से निकलना क्योंकि सबके लिए गिफ्ट्स व मिठाई के डिब्बे भी लेने हैं।” रमेश बोला।

“बस मिठाई ही लेनी है गिफ्ट तो बहुत सारे पड़े हैं पिछले साल के और क्या खरीदने हैं?वही दे देंगे।पैसे भी बच जाएंगे और नाम का नाम भी हो जाएगा।” सरोज चहकते हुए बोली।

“देखो ये सब अच्छा नहीं लगता अगर गलती से किसी का गिफ्ट उसी के पास पहुँच गया तो वो क्या सोचेगा?हमारा गिफ्ट हमें ही वापिस दे दिया।”

“अरे एक साल हो गया किसी को कहाँ याद रहता है?”कहकर सरोज ने  गिफ्ट्स छांटे और उन्हें बैग में डाला फिर तैयार होकर पति के साथ सबके घर जाने के लिए निकल पड़ी।

“सब गिफ्ट अच्छे से देख लिए थे ना किसको कौनसा देना है?” रमेश ने अपनी चिंता जाहिर की।

“अरे आप चिंता ना करो बच्ची थोड़ी ना हूँ।सब गिफ्ट देखकर ही रखें हैं।” सरोज अति विश्वास के साथ बोली।

सबके घर होते हुए अंत में सरोज और रमेश शर्मा जी के घर पहुँचे।शर्मा जी रमेश के बॉस थे।पिछली दीवाली पर वह सपरिवार सरोज और रमेश के घर आए थे।ऑफिस के और भी लोग शर्मा जी के घर आए हुए थे। शर्मा दम्पती ने सरोज और रमेश का मुस्कुराकर स्वागत किया और बैठने को कहा।सरोज ने भी शर्मा दम्पति को दीवाली की बधाई दी और फिर बड़ा सा गिफ्ट व मिठाई का डिब्बा दिया।”अरे इसकी क्या जरूरत थी?”मिसेज शर्मा औपचारिकता निभाते हुए बोलीं।

इसके पश्चात सब बातों में व्यस्त हो गए।मिसेज शर्मा चाय नाश्ता ले आईं। नाश्ते के बाद जैसे ही सरोज और रमेश घर जाने के लिए उठे तभी शर्मा जी का सात वर्षीय बेटा उनका ही दिया हुआ गिफ्ट लेकर आया और  बोला-“मम्मी ये तो वोई वाला गिफ्ट है जो हमने पिछली दीवाली को अंकल आंटी को दिया था।”

मिसेज शर्मा को लगा सरोज और रमेश कहीं बुरा ना मान जाएं इसलिए वो बेटे से बोलीं-“लगता है तुम भूल गए हो,चलो जाओ अपने रूम में।”

पर बच्चा तो अपनी बात पर जैसे अड़ ही गया-“नहीं मम्मा मुझे याद है मैं ही तो पापा के साथ गिफ्ट लेने गया था।”

बच्चे की बात सुनकर वहाँ बैठे ऑफिस के सभी लोग हँसने लगे।एक ने तो तंज कसते हुए बोल ही दिया-“अरे यार रमेश लगता है इस दीवाली पर तेरा कुछ ज्यादा ही खर्चा हो गया है जिसकी कसर तू ऐसे पूरी कर रहा है। सबको उनके ही दिए हुए तोहफे दे रहा है।”

अरे यार ऐसा कुछ नहीं है हम तो मॉल से गिफ्ट लेकर सीधे यहाँ आएं हैं।”रमेश पत्नी की गलतियों पर पर्दा डालते हुए बोला।
सरोज के चेहरे का तो मानों रंग ही उड़ गया।आज उसकी समझदारी उसके पति पर भारी पड़ गई।खिसिआते हुए बोली-“चलिए जी काफी देर हो गई घर पर बच्चे इंतजार कर रहे होंगे।”सबको नमस्कार कहकर सरोज और रमेश घर को रवाना हो गए।

रास्ते भर रमेश ने सरोज से बात नहीं की पर घर पहुँचते ही उसका धैर्य टूट गया।वह गुस्से से तमतमाते हुए बोला-“बस..बहुत हो गया।थोड़े से पैसे बचाने के लिए आज तुमने मेरे आत्मसम्मान को सबके सामने दाँव पर लगा दिया।बॉस क्या सोचेंगे,कि मैं इतना गया गुजरा हूँ जो उनका ही दिया हुआ गिफ्ट उन्हीं को दे दिया।और ऑफिस वाले कितने दिन तक मेरा मज़ाक उड़ाएँगे,इसका अंदाज़ा भी है तुम्हें?”

सरोज की आँखों से आँसू बह निकले। वह बोली-“मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने कुछ रुपये बचाने के लालच में रिश्तों की गरिमा और आपके सम्मान की कीमत नहीं समझी।अब कभी ऐसी गलती नहीं होगी।”

रमेश का गुस्सा भी धीरे-धीरे शांत हो गया।उसने कहा-“याद रखना, बचत अच्छी बात है,लेकिन जब वह सम्मान और रिश्तों से बड़ी हो जाए,तो वहीं रुक जाना चाहिए।”

सरोज समझ गई,कि रुपए दोबारा कमाए जा सकते हैं लेकिन एक बार खोया हुआ सम्मान और विश्वास वापस पाना आसान नहीं होता।और अति समझदारी कई बार सबसे बड़ी नासमझी साबित हो जाती है।

उस दिन के बाद सरोज ने कभी किसी रिश्ते की गरिमा को बचत की तराज़ू में नहीं तौला।”

कमलेश आहूजा

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