दीपावली के पावन पर्व पर, श्वेता अपनी एक साल की बेटी और निशांत के साथ ग्वालियर हवेली पहुँची। जानकी देवी अब काफी हद तक स्वस्थ थीं और अपने पैरों पर चलकर दरवाज़े तक आईं। श्वेता ने जब माँ के चरण छुए, तो जानकी देवी ने उसे सीने से लगा लिया। पर अगले ही पल श्वेता मुड़ी और अपनी भाभी अनुराधा के गले लगकर फफक पड़ी। निशांत ने हरिप्रसाद जी और अनुराधा के सामने हाथ जोड़कर कहा, “भाभी, अगर उस दिन आपने हमारा हाथ न थामा होता, तो आज हम यहाँ इस तरह सिर उठाकर खड़े न होते।”
जब चार साल पहले अनुराधा इस घर में ब्याह कर आई थी, तो उसने कभी नहीं सोचा था कि ससुराल में उसे पराएपन का एक पल भी महसूस होगा। ससुर हरिप्रसाद जी सिद्धांतवादी मगर बेहद स्नेहिल थे, सास जानकी देवी पूरे घर को ममता की डोर से बाँधकर रखती थीं, छोटा देवर कुणाल कॉलेज में पढ़ता था और सबसे छोटी थी ननद श्वेता। श्वेता और अनुराधा की उम्र में मुश्किल से दो-तीन साल का ही अंतर था। घर में आने के कुछ ही हफ्तों के भीतर दोनों के बीच ननद-भाभी का औपचारिक पर्दा हट गया और वे दो सहेलियों जैसी हो गईं। रसोई में मसाले पीसने से लेकर शाम को छत पर टहलने तक, दोनों की हँसी पूरे घर में गूँजती रहती।
शादी के दो बरस बाद जब अनुराधा की गोद में नन्हा प्रियांशु आया, तो हवेली में खुशियों की बरसात हो गई। बच्चे के नन्हे कदमों ने घर की रफ़्तार ही बदल दी। अनुराधा से भी ज्यादा वह बच्चा अपनी बुआ श्वेता और दादी जानकी देवी की उंगलियाँ पकड़कर बड़ा होने लगा। प्रियांशु की हर छोटी-बड़ी ज़िद श्वेता के पास पूरी होती। कभी-कभी अनुराधा हँसते हुए कहती कि बेटा उसका है या श्वेता का, यह पहचानना मुश्किल हो जाता है। सब कुछ एक शांत, सुरीले गीत की तरह बह रहा था।
इसी बीच श्वेता के लिए जबलपुर के एक बड़े और प्रतिष्ठित परिवार से रिश्ते की बात चली। लड़का निशांत अपने पिता के साथ मिलकर सूती वस्त्रों और कताई मिलों का बहुत बड़ा कारोबार संभालता था। परिवार संपन्न था, संस्कार अच्छे थे और निशांत श्वेता के हर सपने पर खरा उतरता था। हरिप्रसाद जी और जानकी देवी ने अपनी इकलौती लाडली के ब्याह में कोई कसर नहीं छोड़ी। धूमधाम से ब्याह रचाया गया। विदाई के समय पूरा घर रोया, पर सबसे ज्यादा आँसू अनुराधा की आँखों से गिरे। जिसके साथ उसने अपने जीवन के सबसे प्यारे लम्हे बाँटे थे, वह घर से विदा होकर जा रही थी। श्वेता के जाने के बाद हवेली का बड़ा सा आँगन अनुराधा को कुछ दिनों तक बहुत सूना और उदास लगा।
शुरुआती महीनों में सब कुछ सपनों जैसा ही चला। श्वेता जब भी फोन करती, ससुराल में मिलने वाले मान-सम्मान और निशांत के प्यार के किस्से सुनाते नहीं थकती। बेटी के चेहरे की यह चमक देखकर जानकी देवी की आँखों में संतोष के दीप जलते रहते। हरिप्रसाद जी भी निश्चिंत थे कि उन्होंने अपनी लाडली को फूलों की सेज पर बिठाया है। हर महीने श्वेता से बात होती, त्योहारों पर उपहारों का लेन-देन होता और रिश्ते की मिठास बनी रहती।
लेकिन ज़िंदगी की राहें हमेशा सीधी नहीं होतीं। लगभग डेढ़ साल बाद निशांत की कताई मिलों में अचानक भयंकर आग लग गई। लाखों का कच्चा माल, तैयार धागे और कीमती मशीनें कुछ ही घंटों में राख के ढेर में बदल गईं। घाटा इतना बड़ा था कि बैंक का भारी कर्ज चुकाने के लिए उनके पुश्तैनी गोदाम और रिहायशी संपत्तियाँ तक नीलाम होने की कगार पर आ गईं। एक झटके में वह रईस खानदान आर्थिक तंगहाली के उस मुहाने पर पहुँच गया जहाँ रोज़मर्रा के खर्च जुटाना भी पहाड़ जैसा लगने लगा। निशांत और उसके पिता पूरी तरह टूट चुके थे।
दुर्भाग्य कभी अकेला नहीं आता। जब यह संकट गहराया, उसी समय अनुराधा और श्वेता दोनों ही गर्भवती थीं। अनुराधा दूसरी बार माँ बनने जा रही थी और श्वेता पहली बार मातृत्व की दहलीज़ पर खड़ी थी। मायके में जब श्वेता के ससुराल की इस भयानक बर्बादी की खबर पहुँची, तो जानकी देवी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। जिस फूल जैसी बच्ची को उन्होंने कभी काँटा तक नहीं चुभने दिया था, वह आज इतने बड़े आर्थिक और मानसिक तूफ़ान के बीच खड़ी थी।
हरिप्रसाद जी और अनुराधा के पति राजेश ने तुरंत मदद का हाथ बढ़ाया। उन्होंने जबलपुर जाकर लाखों रुपये की नकद सहायता दी, ताकि तात्कालिक संकट टल सके। पर व्यापार का जो नुकसान हुआ था, उसकी भरपाई केवल मायके से भेजे गए पैसों से संभव नहीं थी। इसके अलावा, एक स्वाभिमानी दामाद और उसका परिवार कब तक मायके के टुकड़ों पर निर्भर रह सकता था? जानकी देवी दिन-रात इसी चिंता में घुलने लगीं। वे रातों को उठ-उठकर रोतीं। उनका खाना-पीना छूट गया। बेटी के दुख ने उन्हें अंदर ही अंदर खोखला कर दिया।
कुछ ही महीनों में जानकी देवी का शरीर पीला पड़ने लगा और उनका वज़न तेज़ी से गिरा। जब हरिप्रसाद जी ने शहर के बड़े अस्पताल में उनकी पूरी जाँच करवाई, तो रिपोर्ट देखकर पूरे परिवार पर वज्रपात हो गया। डॉक्टरों ने बताया कि अत्यधिक मानसिक तनाव और अवसाद के चलते उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो चुकी थी और उन्हें लीवर कैंसर ने घेर लिया था, जो दूसरी अवस्था में पहुँच चुका था। घर में चारों तरफ मातम सा छा गया। एक तरफ श्वेता की दुर्दशा, दूसरी तरफ जानकी देवी की यह जानलेवा बीमारी, और ऊपर से दोनों बहुओं के प्रसव का नज़दीक आता समय।
जानकी देवी ने अपनी बीमारी को किनारे रखकर हाथ जोड़कर श्वेता को फोन किया, “बेटी, तू सब छोड़-छाड़कर यहाँ ग्वालियर आ जा। तेरा पहला प्रसव है। वहाँ इतनी परेशानी में तू कैसे संभालेगी? यहाँ तेरी भाभी है, मैं हूँ, हम सब मिलकर सब संभाल लेंगे।”
लेकिन श्वेता ने नम आँखों मगर दृढ़ स्वर में इनकार कर दिया। उसने कहा, “माँ, अच्छे दिनों में तो मैंने उस घर का सारा सुख भोगा, आज जब मेरे पति और सास-ससुर पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा है, तो मैं अपनी जिम्मेदारी छोड़कर मायके कैसे आ जाऊँ? निशांत को इस वक्त मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। मैं अपने ससुराल में ही रहूँगी, चाहे जैसी भी परिस्थिति हो।” श्वेता का यह त्याग जानकी देवी के दिल को और चीर गया। वे मन ही मन सोचतीं कि माता-पिता का घर बेटी को चाहे कितनी भी दौलत और सहारा दे दे, पर एक स्त्री का असली गौरव और सुख उसके अपने पति के घर की स्थिरता और आत्मसम्मान में ही बसता है।
इसी भारी तनाव और कशमकश के बीच वह दिन भी आ गया जब अनुराधा और श्वेता दोनों ने एक ही हफ्ते के अंतराल में दो नन्हीं, प्यारी बेटियों को जन्म दिया। अनुराधा ने ग्वालियर में बेटी को जन्म दिया और श्वेता ने जबलपुर के एक सामान्य से नर्सिंग होम में। जानकी देवी ने अपनी बीमारी के दर्द को सहते हुए श्वेता और उसकी बच्ची के लिए हर जरूरी सामान, कपड़े, दवाइयों का इंतज़ाम करवाया। पर उनके चेहरे की उदासी मिटी नहीं। वे बिस्तर पर पड़ी-पड़ी कहतीं, “मेरी फूल सी बच्ची का नसीब देखो, जिस दिन उसके घर लक्ष्मी आई, उस दिन घर में घी का दीया जलाने तक की तंगी है।”
पूरा घर लाचारी के भंवर में फँसा था। तब अनुराधा ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने देखा कि केवल सहानुभूति जताने या मायके से पैसे भेजते रहने से श्वेता का जीवन पटरी पर नहीं आएगा, और न ही माँ जी की बीमारी का इलाज सिर्फ दवाओं से हो पाएगा। जानकी देवी की बीमारी का सबसे बड़ा कारण वह मानसिक बोझ था जो श्वेता के भविष्य को लेकर उनके सीने पर पत्थर की तरह रखा था।
अनुराधा ने अपने पति राजेश, ससुर हरिप्रसाद जी और देवर कुणाल को एक साथ बैठाया। उसने अपनी सारी संकोच की दीवारें तोड़कर कहा, “पिताजी, हम हर महीने ननद के घर पैसे भेजते हैं, पर यह किसी स्वाभिमानी परिवार के घावों पर सिर्फ मरहम लगाने जैसा है, इलाज नहीं। श्वेता हमारी बेटी है और निशांत जी हमारे दामाद। उन्हें दान नहीं, एक नए सहारे की जरूरत है। हमारे पास जो कृषि भूमि और मुरैना वाली खाली ज़मीन पड़ी है, क्यों न हम उसका एक हिस्सा बेचकर निशांत जी के साथ मिलकर एक नया आधुनिक गारमेंट स्टार्टअप शुरू करें? राजेश जी यहाँ का काम देखेंगे, निशांत जी जबलपुर में उसका प्रोडक्शन संभालेंगे। दोनों की साझेदारी होगी। निशांत जी का हुनर और अनुभव बेकार नहीं जाएगा और उनका खोया हुआ सम्मान भी लौट आएगा।”
राजेश और हरिप्रसाद जी दंग रह गए। आमतौर पर बहुएँ ससुराल की जायदाद में ननद के ससुराल वालों की हिस्सेदारी को लेकर असहज हो जाती हैं, लेकिन यहाँ अनुराधा खुद आगे बढ़कर अपने अधिकारों का त्याग कर रही थी। हरिप्रसाद जी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने अनुराधा के सिर पर हाथ रखकर कहा, “बहू, तू सिर्फ इस घर की बहू नहीं, साक्षात अन्नपूर्णा और इस परिवार की ढाल है।”
योजना पर तुरंत काम शुरू हुआ। ज़मीन का एक हिस्सा बेचकर पूँजी जुटाई गई। राजेश खुद जबलपुर गए और निशांत के सामने यह प्रस्ताव साझेदारी के रूप में रखा, किसी एहसान के रूप में नहीं। निशांत, जो निराशा के गहरे गर्त में डूब चुका था, इस नए रास्ते को देखकर रो पड़ा। उसने अपनी पूरी ताकत उस नए काम में झोंक दी।
इधर ग्वालियर में, अनुराधा ने अपनी नन्हीं बेटी और प्रियांशु को संभालते हुए अपनी सास जानकी देवी की सेवा में दिन-रात एक कर दिया। वह उन्हें समय पर दवा देती, कीमोथेरेपी के लिए अस्पताल ले जाती, और सबसे बढ़कर, उनके कानों में हर रोज़ श्वेता के नए काम की प्रगति की सकारात्मक बातें डालती। धीरे-धीरे सकारात्मक माहौल और आधुनिक चिकित्सा ने असर दिखाना शुरू किया। डॉक्टरों ने भी माना कि जानकी देवी के भीतर जीने की जो नई उम्मीद जगी है, उसने कैंसर की गाँठों को सिकोड़ना शुरू कर दिया है।
एक साल के भीतर निशांत और राजेश की मेहनत रंग लाई। नया गारमेंट ब्रांड बाज़ार में चल निकला और घाटे के बादल छँटने लगे। निशांत ने अपने पुराने कर्ज चुका दिए और उनका परिवार एक बार फिर अपनी प्रतिष्ठा के साथ अपने पैरों पर खड़ा हो गया।
दीपावली के पावन पर्व पर, श्वेता अपनी एक साल की बेटी और निशांत के साथ ग्वालियर हवेली पहुँची। जानकी देवी अब काफी हद तक स्वस्थ थीं और अपने पैरों पर चलकर दरवाज़े तक आईं। श्वेता ने जब माँ के चरण छुए, तो जानकी देवी ने उसे सीने से लगा लिया। पर अगले ही पल श्वेता मुड़ी और अपनी भाभी अनुराधा के गले लगकर फफक पड़ी। निशांत ने हरिप्रसाद जी और अनुराधा के सामने हाथ जोड़कर कहा, “भाभी, अगर उस दिन आपने हमारा हाथ न थामा होता, तो आज हम यहाँ इस तरह सिर उठाकर खड़े न होते।”
अनुराधा ने मुस्कुराते हुए अपनी ननद की बेटी को गोद में उठाया और कहा, “श्वेता, परिवार वही होता है जो मुश्किल वक्त में एक-दूसरे की ढाल बन जाए। तुमने अपने ससुराल का साथ नहीं छोड़ा और हमने तुम्हारा। जब नीयत साफ हो और दिलों में अपनापन, तो हर टूटा हुआ आशियाना फिर से संवर जाता है।”
पूरा आँगन दीयों की रोशनी से जगमगा रहा था। जानकी देवी की आँखों में अब चिंता के आँसू नहीं, बल्कि एक ऐसा सुकून था जो किसी भी बीमारी को हराने की ताकत रखता था। हवेली का आँगन एक बार फिर हँसी, प्यार और अटूट विश्वास की सुगंध से महक उठा था।
अगर इस कहानी में अनुराधा का अपनी ननद और ससुराल के प्रति यह त्याग और समझदारी आपको सही लगी, तो आपके हिसाब से एक परिवार को मुश्किल समय में बिखरने से बचाने के लिए सबसे बड़ी भूमिका किसकी होती है—मायके की समझदारी की या बेटी के अपने धैर्य की? अपनी राय नीचे ज़रूर बताएं।
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लेखिका : आरती देवी