पिंजरे की वो आख़िरी रात

पारुल वकील मालती सक्सेना के दफ़्तर के सामने वाली कुर्सी पर बैठी थी। साधारण सूती साड़ी, करीने से संवारे हुए हल्के सफ़ेद बाल और चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव। न आँखों में आँसू थे, न आवाज़ में कोई थरथराहट।

मालती जी ने चश्मा ठीक करते हुए सामने रखी फ़ाइल पर नज़र डाली और फिर पारुल के चेहरे को देखा। एक मंझी हुई फेमिली कोर्ट की वकील होने के नाते उन्होंने सैकड़ों टूटे हुए रिश्ते देखे थे, पर इस पचास वर्षीय महिला का शांत अंदाज़ उन्हें चौंका रहा था।

“पारुल जी, आपने जो अर्ज़ी दी है, उसमें आपने आपसी सहमति से अलग होने की बात कही है। पच्चीस साल की शादी… रजत जी एक नामी बैंक में रीजनल डायरेक्टर हैं, शहर के सबसे पॉश इलाके में आपका तीन मंज़िला बँगला है। इस उम्र में आकर तलाक का फ़ैसला? क्या कोई ऐसी बात है जो आप सीधे-सीधे नहीं बता रहीं?” मालती जी की आवाज़ में पेशेवर जिज्ञासा थी।

पारुल ने एक गहरी साँस ली और खिड़की से बाहर देखते हुए बोली, “मालती जी, जब कोई इमारत धीरे-धीरे अंदर से खोखली होती है, तो बाहर खड़े लोगों को लगता है कि वह मज़बूती से टिकी है। पर जो उसके साए में हर रोज़ एक ईंट गिरते हुए देखता है, सिर्फ़ वही जानता है कि वह किस मलबे पर खड़ा है। मैं पिछले पच्चीस बरसों से उसी मलबे पर ज़िंदगी घसीट रही थी।”

“तो फिर इतने साल इंतज़ार क्यों किया? जब सब कुछ इतना ही असहनीय था, तो पहले कदम क्यों नहीं उठाया?”

“क्योंकि मेरी बेटी अवनी उस घर में साँस ले रही थी।” पारुल की आँखों में पहली बार एक चमक उभरी। “जब रजत का ग़ुस्सा, उनका अपमानजनक व्यवहार और मेरी पहचान को पैरों तले रौंदना हद से गुज़र जाता था, तब भी मैं रसोई में जाकर अपने आँसू पोंछ लेती थी। रजत बाहर की दुनिया में एक बेहद सुलझे, हँसमुख और प्रतिष्ठित अफ़सर थे, लेकिन घर की चौखट लांघते ही उनकी ज़बान से सिर्फ़ ज़हर टपकता था। मेरी हर छोटी बात का मज़ाक उड़ाना, मुझे अनपढ़ और गँवार महसूस कराना उनकी दिनचर्या थी। पर मैं जानती थी कि अगर मैंने उस वक़्त आवाज़ उठाई या दरवाज़ा बंद करके निकल गई, तो मेरी बेटी की परवरिश, उसकी पढ़ाई और उसके सपनों की बलि चढ़ जाएगी।”

पारुल ने आगे कहा, “रजत को भी समाज में अपनी इज़्ज़त प्यारी थी। एक कामकाजी, सफल अफ़सर की ज़िंदगी में एक सलीके वाली पत्नी का होना उनकी छवि के लिए ज़रूरी था। हम दोनों ही अपने-अपने स्वार्थ में उस छत के नीचे बँधे रहे। उनका स्वार्थ था समाज में एक आदर्श परिवार की नुमाइश करना, और मेरा स्वार्थ था मेरी बच्ची का सुरक्षित भविष्य। पिछले महीने अवनी का सेलेक्शन लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में स्कॉलरशिप के साथ हो गया। पिछले हफ़्ते जब मैंने उसे दिल्ली एयरपोर्ट पर विदा किया, तो उसने रोते हुए मुझसे कहा था—’माँ, अब तुम सिर्फ़ अपने लिए जीना।’ उस पल मुझे लगा कि मेरे पैरों में पड़ी ममता की वह सुनहरी ज़ंजीर अपने आप खुल गई है।”

मालती जी अवाक होकर सुन रही थीं। उन्होंने पूछा, “अवनी को इस फ़ैसले का पता है?”

“हाँ,” पारुल ने मुस्कुराते हुए कहा, “उसने ही तो मुझसे कहा कि माँ, तुमने पच्चीस साल मेरे लिए घुट-घुट कर काटे हैं। अब अगर तुम उस घर में एक दिन भी रुकीं, तो मुझे लगेगा कि मेरे सपनों की क़ीमत तुम्हारी आज़ादी थी। वह मेरे इस फ़ैसले में पूरी तरह मेरे साथ खड़ी है।”

औपचारिकताएँ पूरी हुईं और कोर्ट की प्रक्रिया आगे बढ़ी। पर असली इम्तिहान तब शुरू हुआ जब यह बात रिश्तेदारों और समाज के कानों तक पहुँची।

पारुल अपने मायके से मिली एक छोटी सी बचत और अपने हुनर के दम पर शहर के एक शांत कोने में एक छोटा सा दो कमरों का फ्लैट लेकर रहने लगी थी। पर समाज की तीखी नज़रों से बचना कहाँ मुमकिन था। एक दिन जब वह पास की सब्ज़ी मंडी से लौट रही थी, तो कॉलोनी की कुछ परिचित महिलाएँ मिल गईं।

श्रीमती वर्मा ने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा, “अरे पारुल, सुना तो हमें विश्वास ही नहीं हुआ। भला इस उम्र में आकर कोई ऐसा करता है? बाल सफ़ेद हो गए, बेटी परदेस चली गई, अब रजत भाई साहब की सेवा करने की उम्र थी और तुम अलग हो गईं! आजकल की औरतों में ज़रा भी सब्र नहीं रहा।”

पास खड़ी दूसरी महिला ने धीरे से फुसफुसाते हुए ताना मारा, “इतने साल तो सब ठीक चला, अब अचानक आज़ादी का भूत सवार हो गया। कहीं कोई और बात तो नहीं? इस उम्र में भी अकेले रहने का शौक चढ़ रहा है!”

पारुल ने उन औरतों की तरफ़ देखा। उसे ग़ुस्सा नहीं आया, बल्कि उन पर तरस आया। जो औरतें खुद अपने घरों में किसी न किसी समझौते की घुटन में जी रही थीं, वही आज एक आज़ाद होती स्त्री पर पत्थर फेंक रही थीं। समाज में स्त्रियों का सबसे बड़ा पहरेदार अक्सर स्त्रियाँ ही बन जाती हैं। जो दर्द उन्होंने खुद सहा होता है, वे चाहती हैं कि दूसरी स्त्री भी उसी दर्द को अपनी नियति मानकर स्वीकार कर ले।

पारुल ने बेहद शालीनता से कहा, “वर्मा जी, जब काँटा पैर में चुभता है, तो दर्द उसी को होता है जिसके तलवे से ख़ून बहता है। दूर खड़े होकर तमाशा देखने वालों को लगता है कि इंसान बेवजह लंगड़ा कर चल रहा है। पच्चीस साल मैंने उस काँटे को इसलिए नहीं निकाला क्योंकि गोद में बच्ची थी, डर था कि लड़खड़ा गई तो वह गिर जाएगी। आज वह अपने पैरों पर खड़ी है, तो मैंने वह काँटा निकाल फेंका। अब ज़ख़्म भले भरेगा धीरे-धीरे, पर कम से कम मैं सीधा सिर उठाकर चल तो सकूँगी।”

उन महिलाओं के पास कोई जवाब नहीं था। पारुल बिना पीछे मुड़े आगे बढ़ गई।

शुरुआती कुछ महीने पारुल के लिए आसान नहीं थे। सालों तक एक बड़े घर की चारदीवारी में बंद रहने के बाद दुनिया के तौर-तरीके, बिल भरना, बैंक के काम खुद संभालना सब नया था। कभी-कभी शाम के ढलते ही सन्नाटा डराने लगता था। पर उस सन्नाटे में एक ऐसा सुकून था जो उस आलीशान बँगले की रोज़-रोज़ की जिल्लत में कभी नहीं मिला।

पारुल को हमेशा से हस्तकला और पारंपरिक ब्लॉक प्रिंटिंग का गहरा शौक था, जिसे रजत ने कभी ‘समय की बर्बादी’ कहकर दबा दिया था। पारुल ने उसी शौक को अपनी पहचान बनाने की ठानी। उसने अपने फ्लैट के एक कमरे को अपनी वर्कशॉप बनाया। पड़ोस की दो ज़रूरतमंद लड़कियों को अपने साथ जोड़ा और सूती साड़ियों और दुपट्टों पर हाथ से ब्लॉक प्रिंटिंग और कढ़ाई का काम शुरू किया।

उसकी बनाई साड़ियों की सादगी और बारीकी लोगों को पसंद आने लगी। अवनी ने विदेश में बैठे-बैठे अपनी माँ के काम का एक सोशल मीडिया पेज बना दिया। धीरे-धीरे पारुल के काम की तारीफ़ शहर के कला प्रेमियों तक पहुँची। स्थानीय प्रदर्शनियों में उसके स्टॉल लगने लगे। जो महिला कल तक सिर्फ़ ‘रजत की पत्नी’ के नाम से जानी जाती थी, आज शहर के बुटीक सर्कल में ‘पारुल डिज़ाइन्स’ एक जाना-माना नाम बनने लगा था।

एक साल बीत गया। कोर्ट ने पारुल और रजत के तलाक की काग़ज़ी मुहर लगा दी। रजत ने भरण-पोषण के लिए एक बड़ी रक़म की पेशकश की थी, पर पारुल ने एक रुपया भी लेने से साफ़ इनकार कर दिया। उसने कोर्ट में सिर्फ़ इतना कहा, “मुझे अपनी गरिमा वापस चाहिए थी, उनका पैसा नहीं।”

एक शाम जब पारुल अपनी बालकोनी में बैठी चाय पी रही थी, उसका फ़ोन बजा। वीडियो कॉल पर अवनी थी। उसने स्क्रीन पर अपनी माँ को देखा—पारुल के चेहरे पर न कोई शिकन थी, न कोई उदासी। आँखों में एक अनोखा आत्मविश्वास और होठों पर सच्ची मुस्कान थी।

“माँ, आज तुम बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो,” अवनी ने नम आँखों से कहा।

पारुल ने मुस्कुराकर अपनी चाय का घूँट भरा और आसमान में उड़ते परिंदों को देखते हुए कहा, “जानती है अवनी, जब कोई पंछी बहुत साल पिंजरे में रह जाता है, तो उसे लगने लगता है कि पिंजरे की सलाख़ें ही उसकी क़िस्मत हैं। पर जिस दिन वह पहली बार पंख फैलाकर उड़ता है, उसे समझ आता है कि पूरा आसमान उसी का इंतज़ार कर रहा था। ज़िंदगी कभी भी किसी उम्र में ख़त्म नहीं होती, वह उसी दिन से शुरू होती है जिस दिन हम खुद को पहचान लेते हैं।”

पारुल अब किसी की दया की मोहताज नहीं थी। उसने यह साबित कर दिया था कि सम्मान से जीने की कोई उम्र नहीं होती, और अपने आत्मसम्मान को चुनना कोई गुनाह नहीं, बल्कि इंसान होने की पहली शर्त है।

पारुल का यह फ़ैसला कई लोगों की नज़र में शायद देर से उठाया गया कदम लगे, लेकिन क्या किसी रिश्ते में अपनी आत्मा को मारकर घुटते रहना ही भारतीय नारी का एकमात्र धर्म होना चाहिए? क्या बच्चों की ख़ातिर सालों तक ज़ुल्म सहने के बाद एक माँ को अपने आत्मसम्मान और आज़ादी को चुनने का हक़ नहीं है? आपकी इस बारे में क्या राय है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .

लेखिका : सीमा श्रीवास्तव

error: Content is protected !!