ससुराल का आंगन बहुओं के दम से ही महकता है

रश्मि ने उठकर अल्पना को गले लगा लिया और बोली, “दीदी, आज से यह घर सिर्फ मेरा नहीं, आपका भी उतना ही है। और मां की जिम्मेदारी अब किसी पर अहसान नहीं, मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य होगी। अब से मां को साल भर का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, उनकी आंखों की चमक रोज ऐसे ही खिली रहेगी।”

विकास ने आगे बढ़कर अपनी मां और पत्नी दोनों को एक साथ देखा, तो उसकी आंखें भर आईं। जिस घर में कल तक एक अनकही घुटन और दूरियां थीं, आज वहां रिश्तों की नई धूप खिल उठी थी।

 जानकी देवी अपने हाथ में पकड़ा फोन कान से सटाए मुस्कुरा रही थीं। दूसरी तरफ उनकी बेटी अल्पना की चहकती आवाज गूंज रही थी।

“मां, सुनो तो सही! तुम बस यह बताओ कि तुम्हारे घुटनों का दर्द अब कैसा है? मैंने तुम्हारे लिए खास तिल और गोंद के लड्डू खुद अपने हाथों से बांधकर रखे हैं। और हां, वो तुम्हारी पुरानी लाल किनारी वाली संबलपुरी साड़ी याद है? बिल्कुल वैसी ही एक सूती साड़ी मुझे यहां भुवनेश्वर के बाज़ार में दिखी, तो मैंने फौरन ले ली। ठंड बढ़ रही है, इसलिए मैंने काजू, पिस्ता और अखरोट के दो-दो डिब्बे भी पैक कर लिए हैं। तुम्हारी पसंद की वो सौंफ वाली मीठी गोलियां भी ले आई हूं।”

जानकी देवी ने एक गहरी सांस ली। चेहरे की झुर्रियों में एक उदास सी चमक उभरी और वे धीमी आवाज में बोलीं, “अरे मेरी लाडो, तू भी ना पागल है एकदम! अब इस ढलती उम्र में काजू-अखरोट खाकर मैं कौन सा अखाड़े में उतरने वाली हूं? अलमारी में पहले की ही इतनी साड़ियां बिना पहनी रखी हैं, तू हर साल क्यों इतने पैसे खर्च करती है? इतना सब लाने की जगह अपनी भाभी रश्मि और नन्हें आरव के लिए कुछ ले आती। अब तो उनके सजने-संवरने और खुश होने के दिन हैं। हमारी उम्र तो बस कट रही है।”

अल्पना ने फोन पर ही थोड़ा डांटते हुए कहा, “मां, तुम हमेशा अपनी बातें ऐसे क्यों समेट लेती हो? खुशियां क्या राशन कार्ड देखकर बंटती हैं कि तुम्हारी उम्र निकल गई? किसने कह दिया कि मेवे और अच्छी चीजें सिर्फ नौजवानों के लिए होती हैं? सच तो यह है कि बुढ़ापे में शरीर को सबसे ज्यादा पोषण और प्यार की दरकार होती है। भाभी और आरव के लिए मुझे क्या लाना है, वो मुझे अच्छी तरह पता है, तुम उसकी फिक्र छोड़ो। तुम बस मेरा इंतजार करो, परसों सुबह की ट्रेन से मैं घर पहुंच रही हूं।”

अल्पना साल में सिर्फ एक बार ही मायके आ पाती थी। ससुराल की जिम्मेदारियां, बच्चों की पढ़ाई और घर-गृहस्थी के बंधनों के बीच वह जैसे ही वक्त निकालती, सब कुछ छोड़कर सीधे मां की छांव में चली आती। वह मां से कुछ लेने नहीं, बल्कि संसार की सारी खुशियां अपनी आंचल में समेटकर मां की सूनी झोली में डाल देने के इरादे से आती थी। बदले में उसे मां की वह भीगी आंखें, सिर पर फेरा हुआ कांपता हाथ और दुआओं का एक समंदर मिल जाता था, जो उसे पूरे साल हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देता था।

शाम के करीब पांच बजे थे। दालान में हल्की ठंडक घुल चुकी थी। तभी बहू रश्मि खनखनाते पैरों से आई और एक छोटी सी स्टील की कटोरी जानकी देवी के सामने टेबल पर पटकते हुए बोली, “लीजिए मां जी, ये भुने हुए चने और दो बिस्कुट चबा लीजिए। अभी चाय बनने में देर है और रात का खाना तो आठ बजे से पहले बनने से रहा।”

जानकी देवी ने उस कटोरी में रखे मुट्ठी भर चने को देखा और फिर अपनी बहू के तने हुए चेहरे को। उनके कमजोर दांतों के लिए वो सख्त चने चबाना नामुमकिन जैसा था, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस नजरें नीची कर लीं।

थोड़ी हिम्मत जुटाकर जानकी देवी ने कहा, “बहू, सुनती हो… वो ऊपर वाला छोटा कमरा ज़रा झाड़-पोंछ करवा देती। परसों अल्पना आ रही है। अगर हो सके तो उसके बिस्तर पर वो नीले फूलों वाली चादर बिछा देना, अल्पना को हल्के रंगों की सूती चादरें बहुत सुहाती हैं।”

रश्मि की भवें तन गईं। उसने कमर पर हाथ रखते हुए कहा, “मम्मी जी, जितनी चिंता और खातिरदारी आपको अपनी बेटी की सूझती है, कभी घर में रहने वालों की भी इतनी कद्र कर लिया कीजिए। साल भर तो हम ही आपके आगे-पीछे दौड़ते हैं, तब तो कभी आपने नहीं पूछा कि बहू थकी है या भूखी।”

जानकी देवी ने सहमते हुए कहा, “अरे बहू, मैंने ऐसा कब कहा? यह घर, यह संसार सब तुम्हारा ही तो है। वह तो बेचारी पराई होकर दूसरे शहर चली गई है, साल में चार दिन के लिए आती है, इसलिए कह रही थी कि उसे थोड़ा आराम मिल जाए।”

रश्मि तुनककर बोली, “तो क्या वह आपके कमरे में फर्श पर गद्दा डालकर नहीं सो सकती? उस ऊपर वाले कमरे में पुराना कबाड़ और गेहूं की बोरियां रखी हैं। अब मैं इतनी ठंड में कमरा खाली करने बैठूं? और वो नीली चादर… अगर बच्चों ने उस पर चाय या हल्दी गिरा दी, तो धोने में मेरे हाथ घिस जाएंगे। आपके लिए तो कहना आसान है।”

जानकी देवी ने धीरे से कहा, “बहू, मेरे इस छोटे से कमरे में एक ही तख्त है, उस पर दो लोग कैसे करवट बदलेंगे? अल्पना का सफर लंबा होता है, थक जाएगी बेचारी।”

“ठीक है, ठीक है! अब बात का बतंगड़ मत बनाइए। करवा दूंगी कमरा साफ। वैसे भी मुझे दिन भर आराम फरमाने की आदत नहीं है, घर में सौ काम पड़े रहते हैं, आपकी तरह माला जपने का वक्त नहीं मिलता मुझे।” इतना कहकर रश्मि पैर पटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई।

जानकी देवी ने कटोरी से एक बिस्कुट उठाया, चाय की प्याली के इंतजार में उसे हाथ में लिए खिड़की से ढलती शाम को देखने लगीं। उनकी आंखों के कोरों से एक खामोश आंसू लुढ़क कर गाल की झुर्रियों में समा गया।

दो दिन पलक झपकते बीत गए। सुबह से ही जानकी देवी बार-बार उठकर मुख्य दरवाजे की तरफ देख रही थीं। उनके चेहरे पर आज एक अलग ही नूर था, जैसे बरसों से मुरझाए पौधे को अचानक बारिश की पहली बूंद मिल गई हो।

उनका बेटा विकास दफ्तर जाने के लिए तैयार होकर ड्राइंग रूम में आया। उसने अपनी मां को दरवाजे के पास खड़ा देखा, तो मुस्कुराते हुए रश्मि से बोला, “रश्मि, देख रहे हो मां के चेहरे की रौनक? ऐसा लगता है जैसे आज घर में कोई त्योहार हो। सच है, बच्चे चाहे जितने बड़े हो जाएं, मां का दिल उनके लिए हमेशा धड़कता रहता है। अल्पना साल में बस एक बार आती है, और ऐसा लगता है जैसे मां के भीतर दस साल की नई उम्र भर जाती है। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हम दोनों दिन-रात मां के साथ रहते हैं, दवा से लेकर फल तक सब लाकर देते हैं, फिर भी जो जादू अल्पना करती है, वो मैं क्यों नहीं कर पाता?”

रश्मि ने नाश्ते की प्लेट जोर से मेज पर रखते हुए ताना मारा, “अरे रहने दीजिए अपनी बहन की तारीफों के पुल बांधना! वो आती है, मां जी के कान भरती है, मेरी बुराइयां करती है, और मां जी को अपनी बेटी का लाड़ अच्छा लगता है। दूर के ढोल हमेशा सुहावने ही लगते हैं। जो रोज खटता है, उसकी कोई कीमत नहीं होती।”

विकास ने गहरी सांस ली और रश्मि के कंधे पर हाथ रखते हुए नरमी से समझाया, “रश्मि, तुम्हारा सोचना गलत है। तुम हमेशा एक बहू बनकर हिसाब-किताब लगाने लगती हो। मां की जरूरतें सिर्फ रोटी और दवा तक सीमित नहीं हैं। उन्हें कोई ऐसा चाहिए जो उनसे बैठकर उनके मन की बात सुने, उनके साथ हंसे, उनके पुराने किस्सों को तवज्जो दे। तुम उनके साथ रहती जरूर हो, पर कभी दिल से नहीं जुड़ पाईं। तुम्हारी नजरों में मां एक जिम्मेदारी हैं, जबकि अल्पना के लिए मां उसका बचपन हैं। यही फर्क मां को बेटी की ओर खींचता है।”

रश्मि कुछ कहने ही वाली थी कि बाहर एक ऑटो आकर रुका।

दरवाजे की घंटी बजी और विकास ने लपककर दरवाजा खोला। सामने अल्पना खड़ी थी—हाथों में बैग, चेहरे पर थकावट की जगह मायके पहुंचने की असीम चमक।

“मां!” अल्पना की आवाज गूंज उठी।

जानकी देवी लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ीं। अल्पना ने अपना बैग जमीन पर पटका और सीधे मां के सीने से लिपट गई। दोनों की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। अल्पना ने मां का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामा, उनके माथे को चूमा और प्यार भरी डांट के साथ बोली, “मां, ये क्या हाल बना रखा है? कितनी दुबली हो गई हो! क्या खाना-पीना छोड़ दिया है? गाल पिचक गए हैं तुम्हारे, लगता है मेरे बिना कोई तुम्हारी देखभाल ठीक से नहीं करता!”

जानकी देवी बेटी की बात सुनकर खिलखिलाकर हंस पड़ीं। उस हंसी में बरसों का अकेलापन पल भर में धुल गया।

“अरे नहीं री पगली, मैं तो बिल्कुल ठीक हूं। तू आ गई, अब सब ठीक हो जाएगा,” जानकी देवी ने अल्पना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

अल्पना ने झुककर भाभी रश्मि के पैर छुए और बोली, “भाभी, नमस्ते! कैसी हैं आप? देखिए, मैं आपके लिए संबलपुरी की वही सिल्क साड़ी लाई हूं जो आपने पिछले साल तस्वीर में देखकर पसंद की थी। और आरव कहां है? उसके लिए रिमोट वाली गाड़ी लाई हूं।”

रश्मि ने साड़ी देखी तो उसका दिल भीतर ही भीतर पिघलने लगा। वह इतनी महंगी और खूबसूरत साड़ी की उम्मीद नहीं कर रही थी। फिर भी उसने चेहरे पर बनावटी गंभीरता बनाए रखी और कहा, “अरे, इसकी क्या जरूरत थी दीदी, आप तो बस पैसे बर्बाद करती हैं।”

दोपहर के खाने के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में थे, अल्पना अपनी मां के पास उसी छोटे कमरे में आ बैठी। उसने देखा कि मां के पैर सूजे हुए थे और तकिया बेहद सख्त था। अल्पना ने फौरन तेल निकाला और मां के पैरों की मालिश करने लगी।

“मां, सच-सच बताओ, तुम खुश तो हो ना? भैया-भाभी तुम्हारा ख्याल तो रखते हैं ना?” अल्पना ने आहिस्ता से पूछा।

जानकी देवी ने बेटी का हाथ पकड़ लिया और बोलीं, “बेटा, विकास बहुत सीधा है। दिन-रात मेहनत करता है। और रश्मि भी बुरी नहीं है, बस थोड़ा गुस्से की तेज है। घर की सारी गृहस्थी संभालती है तो थक जाती होगी। कई बार चिढ़ जाती है, पर मैं सह लेती हूं। तू इन बातों की चिंता मत कर। जब तक तू मिलने आती रहती है, मुझे कोई दुख नहीं सताता।”

अल्पना की आंखें नम हो गईं। उसने बाहर दालान में देखा, जहां रश्मि पानी लेने आई थी और दरवाजे के पीछे खड़ी उनकी बातें सुन रही थी। रश्मि को लगा था कि अल्पना अब मां से उसके तानों और रूखे व्यवहार की शिकायत करेगी और मां आग में घी डालेंगी।

पर जानकी देवी ने आगे जो कहा, उसने रश्मि के पैरों तले जमीन खिसका दी।

जानकी देवी कह रही थीं, “अल्पना, तू रश्मि से कभी मनमुटाव मत रखना। उसने अपने मां-बाप का घर छोड़ा है हमारे लिए। अगर कभी वह मुझे रूखी रोटी भी दे दे, तो भी मैं उसे अपनी बेटी ही समझती हूं। जब मेरी अपनी बेटी पराए घर में जाकर ससुराल को अपना बना सकती है, तो रश्मि भी तो किसी की लाडली है। उसे थोड़ा वक्त लगेगा, पर वह समझ जाएगी। तू बस उससे प्यार से बात किया कर।”

दरवाजे के पीछे खड़ी रश्मि का दिल कांप गया। उसने पिछले दो सालों में अपनी सास को सिर्फ एक बोझ समझा था, हर छोटी बात पर ताने कसे थे, उनकी जरूरतों को नजरअंदाज किया था। पर वही सास आज अपनी बेटी के सामने उसकी ढाल बनकर खड़ी थीं। एक शब्द भी उसके खिलाफ नहीं कहा, बल्कि उसकी थकान और उसके त्याग की दुहाई देकर बेटी को समझा रही थीं।

रश्मि के अंदर एक गहरा पश्चाताप जागा। उसे अपनी मां की याद आ गई, जो अक्सर फोन पर रोती थीं कि उनकी बहू उनका ख्याल नहीं रखती। रश्मि ने सोचा, “मैं भी तो वही कर रही हूं जो मेरी भाभी मेरी मां के साथ कर रही हैं। अगर कल को मेरा बेटा आरव बड़ा होकर किसी और को ले आएगा और मेरे साथ ऐसा ही बर्ताव होगा, तब मैं क्या करूंगी?”

शाम को जब चाय का वक्त हुआ, तो रश्मि ने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।

वह एक बड़ी सी थाली सजाकर लाई। उसमें गर्म-गर्म अदरक वाली चाय थी, नरम बेसन के ढोकले थे जो जानकी देवी आसानी से खा सकती थीं, और साथ में एक कटोरी में भीगे हुए बादाम छीलकर रखे थे।

रश्मि ने थाली मेज पर रखी और चुपचाप जाकर जानकी देवी के पैरों के पास बैठ गई। उसने जानकी देवी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। रश्मि की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

“बहू! क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है ना तेरी? तू रो क्यों रही है?” जानकी देवी घबराकर बोलीं।

रश्मि ने अपना सिर जानकी देवी की गोद में रख दिया और सिसकते हुए बोली, “मां जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत अंधी हो गई थी। मैंने कभी आपकी ममता को समझा ही नहीं। आपने मुझे हमेशा अपनी बेटी माना और मैं हमेशा खुद को सिर्फ एक बहू और आपको एक जिम्मेदारी समझती रही। आज मैंने आपकी बातें सुन लीं। इतनी कड़वाहट के बाद भी आपने अल्पना दीदी के सामने मेरी इज्जत बचाई। मैं कितनी खुदगर्ज थी मां जी!”

कमरे में एक गहरा सन्नाटा छा गया। विकास और अल्पना दोनों हैरान होकर दरवाजे पर खड़े यह सब देख रहे थे।

जानकी देवी की आंखों से भी आंसू छलक पड़े। उन्होंने झुककर रश्मि का सिर अपनी छाती से लगा लिया। उनके हाथ रश्मि की पीठ पर उसी तरह फिरने लगे जैसे अल्पना के सिर पर फिरते थे।

“अरे पगली, तू रो मत। बहू कभी पराई नहीं होती। अगर तू मेरी गलतियों पर मुझे मां समझकर टोक देती, तो मुझे कभी बुरा नहीं लगता। तूने आज मुझे ‘मां जी’ से ‘मां’ बना दिया, मेरे लिए इससे बड़ा सुख और क्या होगा?” जानकी देवी का स्वर रुंध गया।

अल्पना आगे बढ़ी और उसने रश्मि के कंधे पर हाथ रखा, “भाभी, मायके की डोर तो बेटियों से बंधी होती है, पर ससुराल का आंगन बहुओं के दम से ही महकता है। जब आप मां को खुश रखेंगी, तो मुझे परदेस में भी चैन की नींद आएगी।”

रश्मि ने उठकर अल्पना को गले लगा लिया और बोली, “दीदी, आज से यह घर सिर्फ मेरा नहीं, आपका भी उतना ही है। और मां की जिम्मेदारी अब किसी पर अहसान नहीं, मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य होगी। अब से मां को साल भर का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, उनकी आंखों की चमक रोज ऐसे ही खिली रहेगी।”

विकास ने आगे बढ़कर अपनी मां और पत्नी दोनों को एक साथ देखा, तो उसकी आंखें भर आईं। जिस घर में कल तक एक अनकही घुटन और दूरियां थीं, आज वहां रिश्तों की नई धूप खिल उठी थी। वह शाम जमशेदपुर के उस पुराने मकान के लिए एक नई शुरुआत लेकर आई थी—जहां न कोई सास थी, न कोई बहू, बस ममता, सम्मान और अपनेपन का एक अटूट संगम था।

क्या परिवार में सास और बहू का रिश्ता सिर्फ जिम्मेदारियों का लेन-देन है, या फिर दोनों तरफ से थोड़े से मान और समझदारी से इसे मां-बेटी जैसा पावन बनाया जा सकता है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं।

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