खतरा टल गया – गीता वाधवानी

 शांतनु अपनी माताजी का अस्थि विसर्जन करने हरिद्वार गए थे। जैसे ही वह कार्य पूरा करके वापस मुड़े सीढियों पर किसी ने उनकी टांगों से लिपट कर कहा -” पापा पापा, आप मुझे छोड़कर कहां चले गए थे, सुबह से आपको ढूंढ रही हूं, अब तो मुझे डर लग रहा है। देखो ना कितनी देर … Read more

प्रशंसा –  संध्या त्रिपाठी

” प्रशंसा एक ऐसी औषधि है जो मृतप्राय हौसलों में एक नई जान फूंक देती है ” … ।   बच्चों के व्हाट्सएप स्टेटस में पुरस्कार प्राप्त करते हुए अपना फोटो और नीचे कैप्शन में लिखा …” प्राउड ऑफ यू मम्मी ” देख कर सच में बहुत खुशी हुई…..! मैंने भी तपाक से जवाब में लिख … Read more

अधूरी रह गई हसरत सोनेके कंगन पहनने की – मंजू ओमर

ये लो बहू ये सोने के कंगन अब तुम रखो,अब ये मेरे किस काम का है‌।बहू रिया ने खुशी खुशी हाथ फैलाए कंगन लेने को लेकिन कंगन पुष्पा जी हाथ में कंगन लिए हुए ही कहीं खो गई। मां मां कहां खो गई आप ये कंगन तो मुझे दे रही थी न , लेकिन ये … Read more

आप बड़ी हैं

    अपने हाथ में ‘वरिष्ठ नागरिक ‘का प्रमाण-पत्र देखकर कामिनी खुशी-से झूमने लगी।आज वो सचमुच की बड़ी हो गई थी।अब वो भी बड़ी कहलाएगी..उसे भी सम्मान मिलेगा जिसके लिये वो बरसों से…हाँ,बरसों से ही तो तरस रही थी…।          तीन भाई-बहनों में वो सबसे छोटी थी।उससे बड़े राजेश भईया थे और सबसे बड़ी थीं रागिनी दी।घर में … Read more

अधूरी रह गई हसरत सोने के कंगन पहनने की

ये लो बहू ये सोने के कंगन अब तुम रखो,अब ये मेरे किस काम का है‌।बहू रिया ने खुशी खुशी हाथ फैलाए कंगन लेने को लेकिन कंगन पुष्पा जी हाथ में कंगन लिए हुए ही कहीं खो गई। मां मां कहां खो गई आप ये कंगन तो मुझे दे रही थी न , लेकिन ये … Read more

शर्म नहीं, गर्व हूं, मैं!-लक्ष्मी त्यागी

दामिनी दर्द से कराह  रही थी ,उसकी ससुरालवालों ने, उसे शीघ्र ही अस्पताल पहुँचाया। दामिनी की हालत देखकर उसे तुरंत ही भर्ती कर लिया गया।  उसके पति योगेश परेशान से उस अस्पताल में चक्कर लगा रहे  थे। उसकी सास अस्पताल के मंदिर में हाथ जोड़कर बैठ गयी और भगवान जी से प्रार्थना करने लगी -हे … Read more

जिम्मेदारी की दीवारें –  प्रतिमा पाठक

सुबह की पहली किरण जैसे ही आँगन में पड़ी, रसोई से बर्तनों की खनखनाहट की आवाज़ आने लगी। घर की बहू संध्या अपने तीन बच्चों के टिफ़िन तैयार कर रही थी। सासू माँ पूजा कर रही थीं, ससुर जी अख़बार पढ़ रहे थे, और पति राजीव मोबाइल पर दफ़्तर की मेल देख रहे थे। संध्या … Read more

अपनत्व की छांव – प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

“अरे सीमा तू….तू तो पहचान में भी नहीं आ रही….तेरे तो चाल–ढाल, रंग– रूप सब बदल गया….” निम्मी (नमिता) ने जब सीमा से कहा तो सीमा प्रत्युत्तर में सिर्फ मुस्कुरा कर रह गई। सीमा और नमिता (निम्मी) सौतेली बहनें थीं जो आज बहुत वर्षों बाद बुआ के बेटे की शादी में मिली थी। सीमा की … Read more

अपनत्व की छांँव – निभा राजीव”निर्वी”

सत्रह वर्षीया किशोरी राशि के केश तेज हवा के झोंकों से उड़ रहे थे। वह होठों को भींचे हुए रेलवे प्लेटफार्म पर खड़ी थी। उसकी डबडबाई हुई दृष्टि पटरियों की ओर जमी हुई थी। तभी दूर से रेल की सीटी सुनाई थी और रोशनी चमक उठी। राशि दो कदम और पटरियों की ओर बढ़ गई। … Read more

अपनत्व की छांव

बरसात के छोटी-छोटी फुहार सूरज की किरणों के साथ मिलकर आँगन में रेशमी धागों जैसे चमक रही थी। गाँव  हरिपुर के लगभग हर घर में आज भी वही पुराने मिट्टी के आँगन नीम के पेड़ और कच्ची दीवारों पर गोबर की लिपाई में मौसम की महक दिखाई देती थी। उसी गाँव के एक किनारे पर … Read more

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