ये गवार औरत मेरी मां है। – दीपा माथुर
शाम का वक्त था। बड़े-बड़े झूमर जल उठे थे और घर में हर ओर हलचल थी। कीर्ति इधर-उधर दौड़ रही थी, कभी किचन में जाती, कभी हॉल में सजावट देखती। गुब्बारे, रंग-बिरंगे पर्दे, फूलों की खुशबू और तरह-तरह के पकवान—सबकुछ मिलकर घर को एक महफ़िल बना रहे थे। आज विभु का जन्मदिन था। उसकी कामयाबी … Read more