कलह – के आर अमित
घर में हँसी नहीं थी बस चिंता चिल्लाहट और अशांति थी।और चिंता चिता समान होती है। धीरे-धीरे जीविन को जला डालती है एक सुबह भोर का उजाला मुर्गे की बाँग सब सामान्य भोलू खेत जाने को उठा पर उसने अपने सीने पर हाथ रख लिया साँस तेज़ होने लगी कपकपी कदम डगमगाए और हाय हाय … Read more