गायत्री जी एक सुलझी महिला थी।उनके पति किशन जी की दुकान थी बड़े बाजार में किराने की दुकान थी जो बहुत बढ़िया चलती थी।उनके दो बेटे थे रितेश और राहुल दोनों भाइयों की एक दूसरे में जान बसती थी।पूरा परिवार एक दूसरे को समर्पित था।बच्चों ने भी अपनी शिक्षा पूरी कर कर पिता के कारोबार में हाथ बताया और दुकान को एक डिपार्टमेंटल स्टोर में बदल दिया।तीन फ्लोर की दुकान थी तीनों मिल कर उसे चलlते दोनो बेटों ने m. Com किया था।
अब गायत्री जी उनके विवाह का विचार कर रही थी वो चाहती थी कि लड़की ऐसी हो जो परिवार को एक डोर में पिरो कर रखे। इसीलिए गायत्री जी की तलाश जा रही थी और वह खत्म हुई उनके ममेरे बड़े भाई राजन जी के यहां राजन जीके बेटे की शादी थी जिसमें आरती आई हुई थी।आरती गायत्री जी की भाभी कृष्णा जी की इकलौती बहन मधु की बेटी थी जिसके पिता का साया बचपन में ही उठ गया था और मधु जी ने अपने पति के स्थान पर नौकरी ग्रहण कर ली
और आरती को पढ़ा लिखा कर एक CA बना दिया अब वो एक अच्छी फर्म में नौकरी करती थी।गायत्री जी ने कहा मुझे बहु बस घर जोड़ने वाली चाहिए मै चाहती हूं वो मेरे परिवार को अपनाये और उसे जोड़े उसकी मां का ध्यान भी हम रखेंगे।एक शुभ मुहूर्त पर बड़ी ही सादगी से बिना किसी दिखावे के विवाह संपन्न हुआ दोनों परिवारों ने मिल कर एक अच्छा रिसेप्शन दिया जिसने दोनों तरफ के मिलने वाले थे ।
इस तरह किसीं पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा।यह फैसला आरती और रितेश का था।आरती सुबह जल्दी उठ कर घर के काम निपटाया करती और गायत्री उसका पूरा साथ देती थी।नाश्ता और दिन की दाल सब्जी आरती बनाती दिन में फुल्के और चावल बना कर गायत्री दुकान पर खाना भेजती।उधर आरती शाम को आती तो फल सब्ज़ियां ले कर आती।तब तक गायत्री जी खाने की तैयारी कर लेती और चाय बना कर रखती।
दोनो चाय पीती थोड़ा आरती फ्रेश होती तब तक सब्जी बन चुकी होती और आटा मंड कर गायत्री जी रख देती।8:30 बजे सब दुकान से आते और 9:00 बजे खाना खा लेते। शनिवार या इतवार को कई बार किशन जी रितेश को छुट्टी दे देते ताकि वो और आरती एक दूसरे को समय दे पाए।
रितेश की शादी को साल हो गया घर में सुख शांति थी गायत्री जी अपनी पसंद पर खुश थी अब बारी थी इसलिए राहुल के लिए भी उन्होंने तलाश शुरू कर दी उन्हें राहुल के लिए महक पसंद आई।महक स्कूल में अध्यापिका थी जो फिजिक्स पढlती थी उसी से राहुल की शादी हुई दोनो बहुएं घर में ताल मेल बिठा रही थी।
आरती तो घर में रम चुकी थी और अब महक भी कोशिश कर रही थी। सुबह का काम आरती पहले जैसे करती और शाम का महक ।शनिवार आरती और रितेश घूमते फिरते और इतवार को राहुल और महक और महीने में एक मंगलवार सब सपरिवार बाहर जाते क्योंकि उस दिन दुकान की छुट्टी होती।अचानक एक दिन सुबह चार बजे फोन आया कि दुकान में आग लग गई सब भागे पूरी दुकान खाक हो गई थी।
किशन जी सिर पकड़ कर बैठ गए अब क्या होगा? रितेश और राहुल बोले पापा देखते है इंश्योरेंस है कितना पैसा मिलेगा फिर सोचेंगे क्या करना है? दुकान बंद होने से घर में भी असर पड़ रहा था महक को इस बात से गुस्सा आ गया वो अपने पिता के घर चली गई।बेटी को घर आया देख मां बाप खुश हुए।
भाई भाभी भी आफिस से आए और सबने मिलकर खाना खाया। रात को मां ने पूछा बेटा ससुराल में सब कैसा है? सब ठीक है इंश्योरेंस का पैसा मिला। बिजनेस का क्या बना बहुत मुश्किल वक़्त है।हा मां इसलिए तो मै यहां आ गई सब कुछ बंद है।घूमना फिरना अच्छा खाना सब बंद है।
राहुल को मेरे लिए टाइम ही नहीं है? इसलिए मैं उससे झगड़ कर यहां आ गई।गलत बात बेटा महक के पापा बोले बेटा 6 महीने हो गए तुम्हारी शादी को क्या कभी कोई कमी हुई तुम्हे ? नहीं पापा आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं? फिर बेटा जरा सा पतझड़ आया तो तुम उस परिवार का साथ छोड़ यहां आ गई।
बेटा मुश्किल वक़्त में अपनो का साथ हो तो हर परेशानी हल हो जाती है।ये वक्त गुजर जाएगा जाओ अपने परिवार के पास।अगले दिन सुबह रमेश जी महक को छोड़ गए। महक ने राहुल से माफी मांगी।गायत्री जी खुश थी कि सारा परिवार एक दूसरे का साथ दे रहा है दोनो बहुओं ने इस कठिन समय में घर की जिम्मेदारी अच्छे से निभाई।कुछ समय बाद इंश्योरेंस का पैसा भी मिल गया जिससे दुकान दोबारा बनवाई गई।
अपनी सेविंग से भी पैसा मिला दुकान बनवाई गई सामान डलवाया गया। आरती ने भी बहुत सारा पैसा दिया अपनी सेविंग में से।महक देख रही थी और सीख रही थी एकता में कितनी ताकत होती हैं। दुकान का मुहूर्त हुआ सब रिश्तेदार और बहुओं के मायके वाले भी आए।
गायत्री जी दिल खोल कर अपनी बहुओं की समझदारी और कठिन समय में साथ देने की तारीफ की ।सबके जाने के बाद महक आरती के पास आई बोली दीदी मुझे भी अपने जैसा बना दो।क्या कह रही हो दीदी आपको पता है मै मुसीबत से घबरा कर अपने मायके चली गई थी पर पापा ने समझा वापस भेजा।दीदी मुझे माफ कर दो।
अरे पगली अभी छोटी हो इसलिए सब सीख जाओगी देखो वहां से वापस आ कर ही तुम बदल गई थी सबका ध्यान रखती हो हम एक है ये परिवार हमारा धरोहर है।हम सब एक साथ रहेंगे तो हर जंग जीत सकते है समझी।सब लोग बाहर आ कर आंगन में बैठ गए और गायत्री जी सबके लिए काफी बना लाई और बच्चों से बोली कि बेटा अब सब ठीक हो गया है
तो क्यों ना हम दो दिन के लिए देवी के दर्शन को चले।ठीक है मां आप बता देना कब जाना है ।बेटा तुम दोनों छुट्टी का देख लेना फिर चलेंगे।ठीक है मां और सभी एक दूसरे से बाते करके प्लानिंग करने लगे घूमने जाने की।गायत्री जी आखो में खुशी के आंसू थे वो ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी मेरे परिवार को किसी की नजर ना लगे।
स्वरचित कहानी
आपकी सखी
खुशी