अंधेरा छंटने के बाद

 आलोक के हाथों में जमीन की रजिस्ट्री के कागजात थे, और सामने खड़ी उनकी पत्नी नंदिनी की आंखों में आंसू और गुस्से का सैलाब उमड़ रहा था।

“आप एक बार फिर सोच लीजिए आलोक। यह सिविल लाइंस वाला प्लॉट हमने अपने पेट काटकर, एक-एक पाई जोड़कर सिर्फ इसलिए खरीदा था ताकि जब हमारे ईशान के मेडिकल कॉलेज में जाने का वक्त आए, तो हमें किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। आज आप इसे बेचकर सारा पैसा तरुण को दे रहे हैं?” नंदिनी की आवाज में एक मां की गहरी चिंता साफ झलक रही थी।

आलोक ने एक गहरी सांस ली और उठकर नंदिनी के कंधों पर हाथ रखते हुए बड़ी नरमी से कहा, “नंदिनी, मैं तुम्हारी चिंता समझता हूं। लेकिन जरा सोचो, ईशान को बारहवीं पास करने में अभी पूरे तीन साल बाकी हैं। उधर मेरे छोटे भाई तरुण का कपड़ों का शोरूम कर्ज में डूब रहा है। बैंक वाले कुर्की का नोटिस भेज चुके हैं। अगर आज मैंने बड़े भाई होने का फर्ज नहीं निभाया और उसकी मदद नहीं की, तो वो सड़क पर आ जाएगा। माता-पिता के जाने के बाद मैंने ही तो उसे पाला है। और फिर, तरुण कौन सा पराया है? ईशान उसका भी तो इकलौता भतीजा है। उसने मुझसे वादा किया है कि जैसे ही उसका व्यापार संभलेगा, वो ब्याज समेत तो क्या, ईशान की पूरी पढ़ाई का जिम्मा खुद उठा लेगा। अपने खून पर इतना भरोसा तो करना ही पड़ता है नंदिनी।”

नंदिनी अपने पति के भोलेपन और भ्रातृ-प्रेम के आगे बेबस हो गई। उसे तरुण की पत्नी शिखा के तीखे स्वभाव और तरुण के बदलते रंग-ढंग पर थोड़ा संदेह तो था, लेकिन आलोक के अटूट विश्वास के आगे वह चुप रह गई। अगले ही हफ्ते आलोक ने अपना वह बेशकीमती प्लॉट पैंतीस लाख रुपये में बेच दिया और पूरी रकम तरुण के हाथों में रख दी।

पैसे लेते वक्त तरुण की आंखों में आंसू थे। उसने आलोक के पैर छूकर कहा था, “भैया, आपने आज मुझे डूबने से बचा लिया। आप देखना, ईशान जब डॉक्टर बनने चलेगा, तो सबसे पहले उसके दाखिले का चेक मैं अपने हाथों से भरूंगा।” आलोक का सीना गर्व और संतोष से चौड़ा हो गया। उन्हें लगा कि उन्होंने अपने परिवार की नींव को और मजबूत कर दिया है।

वक्त अपनी रफ्तार से बीतता गया। पैंतीस लाख की उस संजीवनी से तरुण का डूबता हुआ व्यापार न सिर्फ संभला, बल्कि देखते ही देखते प्रयागराज के सबसे बड़े कपड़ा शोरूम में तब्दील हो गया। शहर के बड़े-बड़े लोग उसकी दुकान के ग्राहक बन गए। तरुण ने नई गाड़ी खरीद ली, उसके पहनने-ओढ़ने का ढंग बदल गया, और साथ ही बदल गया आलोक के घर आने-जाने का सिलसिला। पहले जो तरुण हर रविवार भैया-भाभी के पास बैठकर चाय पीता था, अब महीनों तक काम का बहाना बनाकर गायब रहने लगा।

आलोक फिर भी खुश थे। वे नंदिनी से कहते, “अरे, काम बढ़ गया है तो व्यस्तता तो बढ़ेगी ही। तरुण जितनी तरक्की करेगा, हमारे ही परिवार का नाम रोशन होगा।”

देखते ही देखते तीन साल बीत गए। आलोक और नंदिनी की तपस्या रंग लाई। ईशान ने न सिर्फ बारहवीं की परीक्षा शानदार अंकों से पास की, बल्कि मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में भी बहुत अच्छी रैंक हासिल की। उसे देश के एक प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान में दाखिले का बुलावा आ गया, लेकिन वहां की शुरुआती फीस और हॉस्टल का खर्च मिलाकर तुरंत पंद्रह लाख रुपये जमा करने थे, और पूरे कोर्स के लिए करीब चालीस लाख की जरूरत थी।

आलोक के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्हें भरोसा था कि उनका छोटा भाई अब करोड़पति बन चुका है और उनके पैंतीस लाख रुपये तरुण के पास सुरक्षित हैं। रविवार की सुबह आलोक मिठाई का डिब्बा लेकर तरुण के शोरूम पहुंचे। वातानुकूलित केबिन में बैठे तरुण ने आलोक को देखा तो चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान ओढ़ ली।

“अरे भैया, आप यहां? फोन कर देते, मैं घर आ जाता,” तरुण ने अपनी महंगी घड़ी पर नजर डालते हुए कहा।

आलोक ने खुशी से मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ाते हुए कहा, “तेरा भतीजा डॉक्टर बनने जा रहा है तरुण! ईशान का सलेक्शन हो गया है। बस अगले महीने की दस तारीख तक फीस जमा करनी है। मुझे पूरे पैसे अभी नहीं चाहिए, बस अभी पंद्रह लाख का इंतजाम कर दे, बाकी जैसे-जैसे जरूरत होगी, लेता रहूंगा।”

तरुण ने मिठाई का एक छोटा सा टुकड़ा मुंह में रखा और अचानक अपने चेहरे पर गंभीरता लाते हुए बोला, “बधाई हो भैया। लेकिन… आपने बहुत गलत समय पर पैसे मांगे हैं। बाहर से शोरूम जितना चमक रहा है, अंदर से उतनी ही मंदी चल रही है। सारा पैसा बाजार में माल के रूप में फंसा हुआ है। ऊपर से टैक्स विभाग का भी एक पेंच फंस गया है। अभी तो मेरे पास पांच लाख रुपये भी नकद नहीं हैं।”

आलोक को थोड़ी हैरानी हुई, फिर भी उन्होंने भाई की बात का यकीन कर लिया। “कोई बात नहीं छोटे, अभी दाखिले में बीस दिन का वक्त है। तू बाजार से तकादा करके दस तारीख से पहले इंतजाम कर दे, सवाल तेरे भतीजे के भविष्य का है।”

तरुण ने अनमने ढंग से सिर हिला दिया। दिन बीतने लगे। दस तारीख नजदीक आ रही थी। आलोक ने पांच बार तरुण को फोन किया, लेकिन हर बार या तो फोन शिखा उठाती या तरुण का मैनेजर, और एक ही जवाब मिलता कि सेठ जी अभी मीटिंग में हैं। जब दाखिले में सिर्फ चार दिन बचे, तो आलोक का धैर्य जवाब दे गया। नंदिनी की रातों की नींद उड़ चुकी थी और ईशान अपने माता-पिता के मुरझाए चेहरे देखकर अंदर ही अंदर घुट रहा था।

आलोक ने तय किया कि वह आज रात तरुण के घर जाकर ही बात करेंगे। जब वे तरुण के पुराने घर पहुंचे, तो वहां ताला लगा था। पड़ोसियों से पूछने पर जो सच सामने आया, उसने आलोक के पैरों तले से जमीन खिसका दी। पड़ोसी ने बताया कि तरुण ने शहर के सबसे महंगे और पॉश इलाके ‘सूर्य विहार’ में तीन करोड़ की एक आलीशान कोठी खरीदी है और आज ही वहां गृह-प्रवेश की भव्य पार्टी चल रही है।

आलोक को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। एक तरफ उनका भाई व्यापार में घाटे का रोना रोकर भतीजे की फीस के पैसे नहीं दे रहा था, और दूसरी तरफ तीन करोड़ की कोठी खरीदकर जश्न मना रहा था! आलोक के कदम खुद-ब-खुद सूर्य विहार की तरफ बढ़ चले।

वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि एक भव्य कोठी रंग-बिरंगी रोशनियों से नहाई हुई थी। बाहर दर्जनों महंगी गाड़ियां खड़ी थीं। आलोक भारी कदमों से अंदर गए। वहां शहर के तमाम रईस लोग जाम छलका रहे थे। तरुण एक महंगे सूट में मेहमानों का स्वागत कर रहा था और शिखा हीरों के हार से लदी इतरा रही थी। अपने सगे बड़े भाई को इस भव्य पार्टी में बुलाना तो दूर, तरुण ने उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगने दी थी।

आलोक को अचानक सामने देखकर तरुण के चेहरे का रंग उड़ गया। वह तुरंत आलोक को भीड़ से अलग एक कोने में ले गया और दबी आवाज में झल्लाते हुए बोला, “भैया, आप यहां इस हालत में क्यों चले आए? यहां शहर के बड़े-बड़े कारोबारी आए हैं, कम से कम आज के दिन तो तकादा करने मत आते!”

आलोक की आंखों से अश्रुधारा बह निकली, लेकिन वह आंसू दुख के नहीं, अपने टूटे हुए विश्वास के थे। उन्होंने कांपती आवाज में कहा, “तेरे पास तीन करोड़ की कोठी खरीदने के पैसे हैं तरुण, लेकिन जिस भाई ने अपनी जमीन बेचकर तुझे सड़क पर आने से बचाया, उसके बेटे की पढ़ाई के लिए तेरे पास खुद उसके ही पैसे लौटाने की नियत नहीं है?”

तभी शिखा भी वहां आ गई और तल्ख आवाज में बोली, “देखिए भाई साहब, बार-बार उस पैंतीस लाख का एहसान मत जताइए। व्यापार में पैसा लगाया था, कोई तिजोरी में नहीं रखा था। और वैसे भी, तब आपने अपनी मर्जी से पैसे दिए थे, कोई लिखा-पढ़ी या एग्रीमेंट तो हुआ नहीं था। जब हमारे पास फालतू पैसा होगा, तब थोड़ा-थोड़ा करके लौटा देंगे। अभी हमारे अपने खर्चे बहुत हैं।”

आलोक ने तरुण की तरफ देखा, शायद वह अपनी पत्नी को रोकेगा। लेकिन तरुण ने नजरें चुरा लीं और बोला, “शिखा ठीक कह रही है भैया। अभी मैं कुछ नहीं दे सकता। आप अपने हिसाब से देख लीजिए।”

उस पल आलोक को एहसास हुआ कि उन्होंने भाई नहीं, आस्तीन का एक ऐसा सांप पाला था जिसने उनके निस्वार्थ प्रेम और उनके बेटे के सुनहरे भविष्य को एक साथ डस लिया था। आलोक ने बिना एक शब्द कहे अपने हाथ जोड़ लिए। “भगवान तुझे और तरक्की दे छोटे, पर याद रखना, किसी की बद्दुआ और हक के पैसे से खरीदी गई कोठियों में घर नहीं बसते, सिर्फ घमंड बसता है।”

यह कहकर आलोक वहां से निकल आए। घर आकर जब उन्होंने नंदिनी को सारी बात बताई, तो नंदिनी फूट-फूटकर रोने लगी। ईशान ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “पापा, मुझे डॉक्टर नहीं बनना। मैं किसी साधारण कॉलेज से बीएससी कर लूंगा। मैं आपको और मां को इस तरह टूटते हुए नहीं देख सकता।”

बेटे के इस त्याग ने आलोक के भीतर सोए हुए स्वाभिमान को झकझोर कर जगा दिया। उन्होंने अपने आंसू पोंछे और मजबूत आवाज में कहा, “नहीं ईशान! किसी एक धोखेबाज इंसान की वजह से मेरी परवरिश और तेरी मेहनत हार नहीं सकती। तू डॉक्टर बनेगा, और इसी साल बनेगा। जब मेरे पास अपना भाई समझकर लुटाने का जिगरा था, तो अपने बेटे के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की ताकत भी है।”

अगले ही दिन आलोक ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपना पुश्तैनी मकान, जिसमें वे रह रहे थे, अपने एक परिचित को बाजार भाव से थोड़े कम दाम में तुरंत बेच दिया। तीन दिन के भीतर उनके हाथ में पैसे आ गए। उन्होंने बिना किसी देरी के ईशान की फीस जमा की और पास की ही एक साधारण सी कॉलोनी में दो कमरों का एक छोटा सा किराए का मकान ले लिया।

जब आलोक और नंदिनी अपना सामान समेटकर किराए के उस छोटे से घर में शिफ्ट हो रहे थे, तब मोहल्ले के लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। किसी ने उन्हें बेवकूफ कहा, तो किसी ने तरुण को कोसा। लेकिन नंदिनी ने उस दिन आलोक का हाथ थामकर कहा, “आज मुझे आप पर पहले से कहीं ज्यादा गर्व है आलोक। हमने छत खोई है, अपना जमीर नहीं। हमारा असली मकान तो हमारा बेटा है, और आपने उसकी नींव बचा ली।”

किराए के उस छोटे से घर से आलोक के परिवार का एक नया अध्याय शुरू हुआ। आलोक एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंटेंट थे। उन्होंने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए शाम के वक्त छोटे व्यापारियों का हिसाब-किताब और टैक्स का काम घर से ही करना शुरू कर दिया। नंदिनी, जो बेहतरीन सिलाई-कढ़ाई जानती थीं, उन्होंने मोहल्ले की महिलाओं को सिखाना और बुटीक के ऑर्डर लेना शुरू कर दिया। दोनों पति-पत्नी दिन-रात मेहनत करते, लेकिन उनके घर में गजब की शांति और खुशहाली थी।

उधर मेडिकल कॉलेज में ईशान के दिमाग में सिर्फ एक ही लक्ष्य था—अपने माता-पिता के त्याग को सार्थक करना। उसने अपनी किताबों को ही अपनी दुनिया बना लिया। वह कॉलेज का सबसे होनहार छात्र बन गया। उसे अपनी मेहनत के दम पर दूसरे साल से ही छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) मिलने लगी, जिससे आलोक के कंधों का बोझ काफी कम हो गया।

दूसरी तरफ, सूर्य विहार की उस आलीशान कोठी में तरुण और शिखा की जिंदगी में एक अलग ही कहानी लिखी जा रही थी। कहते हैं न, जब इंसान अपनी जड़ें काट देता है, तो पेड़ ज्यादा दिन हरा नहीं रह सकता। तरुण के सिर पर अमीरी का ऐसा नशा चढ़ा कि उसने गलत संगत पकड़ ली। जल्द ही पैसे दोगुने करने के लालच में उसने बिना सोचे-समझे सट्टेबाजी और संदिग्ध प्रॉपर्टी के धंधों में करोड़ों रुपये लगा दिए।

आलोक जब तरुण के साथ थे, तो वे उसके व्यापार के हर कानूनी और आर्थिक पहलू पर नजर रखते थे। लेकिन अब तरुण को सही सलाह देने वाला कोई नहीं था। उसके नए रईस दोस्तों ने उसे ऐसा चूना लगाया कि चार साल के भीतर ही उसका शोरूम कर्ज के भारी बोझ तले दब गया। टैक्स की चोरी पकड़े जाने पर उसकी दुकान सील हो गई।

वक्त का पहिया पूरी तरह घूम चुका था। आठ साल का लंबा वक्त कब बीत गया, पता ही नहीं चला। ईशान अब केवल एमबीबीएस ही नहीं, बल्कि अपनी एमडी (MD) की पढ़ाई पूरी करके शहर के सबसे बड़े अस्पताल में एक काबिल और नामी हृदय रोग विशेषज्ञ (Cardiologist) बन चुका था। उसकी ईमानदारी और काबिलियत की चर्चा पूरे प्रयागराज में थी।

एक शुभ दिन, ईशान ने अपनी पहली कमाई और बैंक लोन की मदद से सिविल लाइंस के उसी इलाके में एक बेहद खूबसूरत और हवादार बंगला खरीदा, जहां कभी आलोक का प्लॉट हुआ करता था। गृह-प्रवेश के दिन जब ईशान ने घर की नेमप्लेट से कपड़ा हटाया, तो नंदिनी और आलोक की आंखें भर आईं। नेमप्लेट पर ईशान का नाम नहीं, बल्कि बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— ‘आलोक-नंदिनी सदन’।

“पापा, मां… उस दिन आपने मेरे सपनों के लिए अपनी छत दे दी थी, आज यह छत आपके स्वाभिमान के नाम है,” ईशान ने माता-पिता के चरण स्पर्श करते हुए कहा।

ठीक उसी शाम, अस्पताल से ईशान के पास एक इमरजेंसी कॉल आया। बताया गया कि एक मरीज को बहुत गंभीर हार्ट अटैक आया है और तुरंत ऑपरेशन करना होगा। ईशान तुरंत अस्पताल भागा। आलोक और नंदिनी भी किसी काम से अस्पताल की तरफ ही गए थे।

जब ईशान ऑपरेशन थिएटर के बाहर पहुंचा, तो वहां फर्श पर बैठी एक महिला को फूट-फूटकर रोते देख वह ठिठक गया। वह महिला कोई और नहीं, उसकी चाची शिखा थी। उसके महंगे गहने और घमंड सब गायब हो चुके थे, वह एक साधारण सी सूती साड़ी में बेहद लाचार लग रही थी। स्ट्रेचर पर अंदर जो मरीज जिंदगी और मौत से जूझ रहा था, वह तरुण था।

शिखा ने जब ईशान को डॉक्टर के सफेद कोट में देखा, तो वह दौड़कर उसके पैरों में गिर पड़ी। “ईशान बेटा… अपने चाचा को बचा लो! कर्जदारों ने हमारी कोठी नीलाम कर दी, आज जब बैंक वाले घर खाली कराने आए तो ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए। हमारे पास अब इलाज के लिए भी पूरे पैसे नहीं हैं… हमें माफ कर दो बेटा!”

तभी आलोक और नंदिनी भी वहां पहुंच गए। अपने छोटे भाई की यह हालत देखकर आलोक का दिल पसीज गया, लेकिन इस बार भावनाओं में अंधापन नहीं था। आलोक ने आगे बढ़कर शिखा को उठाया और ईशान की तरफ देखा।

ईशान ने गंभीर स्वर में कहा, “चाची, एक डॉक्टर होने के नाते किसी की जान बचाना मेरा धर्म है, और अपने पिता के संस्कारों के नाते मैं अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटूंगा। आप पैसे की चिंता मत कीजिए।”

ईशान ने चार घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद तरुण की सफल सर्जरी की और उसकी जान बचा ली। तीन दिन बाद जब तरुण को होश आया और उसे जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया, तो उसने देखा कि उसके बिस्तर के पास आलोक खड़े हैं। अस्पताल का सारा बिल ईशान ने अपने पास से जमा कर दिया था।

तरुण की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उसने कांपते हाथों से आलोक के हाथ पकड़ लिए और हिचकियां लेते हुए बोला, “भैया… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपके विश्वास का गला घोंटा, आपके हक के पैसे खाकर कोठी बनाई, लेकिन भगवान ने मुझे दिखा दिया कि अपनों को रुलाकर कोई सुखी नहीं रह सकता। मेरी कोठी बिक गई, व्यापार डूब गया, और आज जिस भतीजे की पढ़ाई का पैसा मैंने हड़प लिया था, उसी ने मुझे नई जिंदगी दी है। मैं आपकी नजरों में क्या, खुद अपनी नजरों में गिर चुका हूं भैया!”

आलोक ने शांत भाव से तरुण के सिर पर हाथ फेरा और बोले, “तरुण, उस दिन जब तुमने मुझे अपनी पार्टी से खाली हाथ लौटाया था, तो मुझे लगा था कि मेरा सब कुछ लुट गया। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि तुम्हारे उस धोखे ने ही मेरे परिवार को अपनी असली ताकत पहचानी सिखाई। अगर तुम उस दिन पैसे दे देते, तो शायद ईशान में वह आग पैदा न होती जिसने आज उसे इतना बड़ा डॉक्टर बनाया, और न ही मुझे और नंदिनी को अपनी मेहनत पर इतना गर्व होता। मैंने तुम्हें बहुत पहले ही माफ कर दिया है छोटे, क्योंकि नफरत का बोझ ढोकर इंसान आगे नहीं बढ़ सकता।”

आलोक ने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और शिखा के हाथ में रखते हुए कहा, “जिस किराए के मकान में हमने पिछले आठ साल बिताए हैं, उसका किराया मैंने अगले छह महीने तक का दे दिया है। जब तक तरुण स्वस्थ नहीं हो जाता और कोई छोटा-मोटा काम शुरू नहीं कर लेता, तुम लोग वहां रह सकते हो। लेकिन इसके आगे का रास्ता तुम्हें अपनी ईमानदारी और मेहनत से खुद ही तय करना होगा।”

तरुण और शिखा की आंखें शर्म और कृतज्ञता से झुक गईं। आलोक ने नंदिनी और ईशान का हाथ थामा और अस्पताल के गलियारे से बाहर निकल आए। बाहर सूरज की सुनहरी किरणें चमक रही थीं। आलोक ने भले ही अतीत में अपनों से धोखा खाया था, लेकिन उनकी नेकनीयत, नंदिनी के धैर्य और ईशान की मेहनत ने यह साबित कर दिया था कि किसी के छलावे से कुछ वक्त के लिए अंधेरा तो हो सकता है, लेकिन सच्चाई और स्वाभिमान का सूरज जब उगता है, तो उसकी रोशनी के आगे हर अंधेरा हार जाता है।

दोस्तों, आलोक ने तरुण के साथ जो किया, क्या आप उसकी जगह होते तो ऐसे धोखेबाज भाई को माफ कर पाते? और क्या रिश्तों में मदद करते वक्त भी अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें!

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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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