“पापा, मम्मी… प्लीज मत रोइए न। मैं आपसे दूर कहाँ जा रही हूँ? मैं तो हमेशा आपके दिल की धड़कन बनकर आपके सीने में रहूँगी। आपकी ये परी जब भी आपको याद आएगी, एक वीडियो कॉल पर आपके सामने होगी। और पापा, मैंने रोहन से बात की है, हम कोशिश करेंगे कि अगले साल तक हम दोनों का ट्रांसफर यहीं देहरादून या आसपास हो जाए। फिर तो हर शनिवार-रविवार मैं आपका सिर खाने आ जाया करूँगी!” तन्वी ने रोते-रोते हँसने की कोशिश की।
एक पिता के लिए उसकी बेटी किसी परी से कम नहीं होती। अरविंद जी ने भी अपनी इकलौती बेटी तन्वी को हथेलियों पर छाले की तरह सहेज कर बड़ा किया था। उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाने से लेकर दुनिया की हर मुश्किल से लड़ने का हुनर सिखाया था। पर वक्त की रफ्तार का अंदाजा मां-बाप को कहाँ हो पाता है? उन्हें तो आज भी ऐसा लगता था जैसे कल ही की बात हो जब तन्वी अपनी दो चोटियाँ झुलाती हुई स्कूल बस में चढ़ते वक्त रोती थी, और अभी कुछ ही दिन पहले तो उसने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा पास की थी।
लेकिन दुनिया की नजरें मां-बाप की नजरों से अलग होती हैं। आज सुबह जब अरविंद जी दूध लेने गए थे, तो कॉलोनी के गुप्ता जी ने टोकते हुए कहा था, “क्यों भाई अरविंद जी, तन्वी बिटिया तो अब अच्छी-खासी सयानी हो गई है, बड़ी कंपनी में अफसर भी बन गई है। अब हाथ पीले करने का क्या विचार है? ज्यादा देर मत कीजिए, वक्त निकलते देर नहीं लगती।”
सच ही कहा गया है, बेटी कब बड़ी हो गई, यह मां-बाप से पहले मोहल्ले और पड़ोसियों को पता चल जाता है। गुप्ता जी की इसी बात ने सुबह से अरविंद जी के मन का चैन छीन लिया था।
अभी वह इन्हीं ख्यालों के भंवर में डूबे थे कि गेट खुलने की आवाज आई। तन्वी अपनी स्कूटी खड़ी करके दफ्तर से लौट आई थी। वह देहरादून की ही एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर थी। पिता को यूँ गुमसुम और उदास बैठा देख तन्वी ने अपना बैग वहीं कुर्सी पर रखा और सीधा अरविंद जी के गले में बाहें डालकर झूल गई।
“क्या बात है पापा? आज मेरे हीरो इतने उदास क्यों बैठे हैं? मम्मी ने फिर से चाय में चीनी कम कर दी क्या?” तन्वी ने चहकते हुए पूछा।
अरविंद जी ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा और एक फीकी मुस्कान के साथ बोले, “नहीं मेरी गुड़िया, बस तेरी शादी का ख्याल आ गया। सोच रहा था कि जब तू चली जाएगी तो मेरा क्या होगा।”
तन्वी खिलखिलाकर हँस पड़ी और उनके बगल में बैठते हुए बोली, “बस इतनी सी बात पापा? भला मैं अपने पापा को छोड़कर कहीं जा सकती हूँ क्या! आप एक काम करना, मेरे लिए ऐसा लड़का ढूँढना जो शादी के बाद हमारे इसी घर में रहे, घर-जमाई बनकर! फिर न आपको मुझे भेजने की टेंशन, न मुझे जाने का दुख।”
बेटी की इस बचकानी बात पर अरविंद जी हँस पड़े, पर भीतर की टीस वैसी ही रही। उन्होंने कहा, “पगली, ऐसा कहीं होता है क्या? बेटियों को तो एक दिन अपना घोंसला छोड़कर उड़ना ही पड़ता है, यही दुनिया की रीत है।”
तभी रसोई से अदरक वाली चाय की ट्रे लेकर तन्वी की माँ वंदना जी वहाँ आ गईं। अरविंद जी ने पत्नी की तरफ देखते हुए चिंता भरे स्वर में कहा, “वंदना, मैं तो ये सोचकर घबरा जाता हूँ कि हमारी तन्वी ससुराल में कैसे रह पाएगी? यहाँ तो उसने आज तक एक गिलास पानी भी खुद नहीं पिया, सुबह आठ बजे तक सोती है। दूसरे के घर में कैसे निभाएगी?”
वंदना जी ने चाय का कप पति को पकड़ाते हुए समझदारी से कहा, “आप बेवजह चिंता करते हैं जी। ये सब कहने की बातें हैं। बेटियाँ तो पानी की तरह होती हैं, जिस बर्तन में डालो उसी का आकार ले लेती हैं। जब सिर पर जिम्मेदारी आती है न, तो लड़की सब सीख जाती है। अब मुझे ही देख लीजिए, शादी से पहले अपने मायके में मैंने कभी चाय तक नहीं बनाई थी। पर इस घर में आने के बाद आपकी पसंद के खाने से लेकर घर का कोना-कोना संभालना सीख ही लिया न? हमारी तन्वी भी सब संभाल लेगी। अब हमें सच में उसके लिए कोई अच्छा सा रिश्ता देखना शुरू कर देना चाहिए।”
पत्नी की बात में सच्चाई थी। अरविंद जी ने भारी मन से हामी भर दी।
कुछ ही हफ्तों बाद तन्वी के मौसा जी ने एक रिश्ते के बारे में बताया। लड़के का नाम रोहन था और वह पुणे की एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में सीनियर इंजीनियर था। परिवार बहुत ही सभ्य और सुलझा हुआ था। दोनों परिवारों की मुलाकात हुई, रोहन और तन्वी ने एक-दूसरे से बात की और देखते ही देखते रिश्ता पक्का हो गया।
घर में शादी की तैयारियाँ जोरों पर शुरू हो गईं। जिस घर में कल तक शांति रहती थी, वहाँ अब रिश्तेदारों की चहल-पहल और ढोलक की थाप गूँजने लगी। तन्वी भी अपने नए जीवन के सपने बुनते हुए बहुत खुश थी।
शादी से दस दिन पहले अरविंद जी, वंदना जी और तन्वी बाजार के सबसे बड़े शोरूम में शादी का लहंगा खरीदने गए। दुकानदार ने एक से बढ़कर एक लहंगे दिखाए—कोई सुर्ख लाल, कोई गुलाबी, तो कोई मैरून। लेकिन तन्वी को कोई भी लहंगा पसंद ही नहीं आ रहा था। वह हर लहंगे में कोई न कोई कमी निकाल देती।
आखिरकार अरविंद जी ने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “बेटा तन्वी, तू इतना क्यों सोच रही है? तू तो मेरी परी है, मेरी राजकुमारी है। तू कोई भी लहंगा पहन ले, हर रंग तुझ पर खिलेगा। हीरे को चमकने के लिए किसी खास रंग की जरूरत थोड़ी होती है।”
पिता की बात सुनकर तन्वी मुस्कुराई और दुकानदार द्वारा दिखाए गए एक गहरे लाल रंग के जरीदार लहंगे को लेकर ट्रायल रूम में चली गई। पंद्रह मिनट बाद जब ट्रायल रूम का दरवाजा खुला और तन्वी लहंगा पहनकर बाहर निकली, तो समय जैसे वहीं थम गया।
लाल जोड़े में सजी तन्वी साक्षात कोई अप्सरा लग रही थी। उसे देखते ही वंदना जी ने अपने पल्लू से अपनी आँखें पोंछ लीं, और अरविंद जी तो बस एकटक अपनी बेटी को देखते ही रह गए। उनकी आँखों से दो मोती टपककर गालों पर बह निकले। उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे इसी पल उनकी बेटी उनके हाथों से छूटकर बहुत दूर जा रही है।
“पापा, देखो न, कैसी लग रही हूँ मैं?” तन्वी ने घूमते हुए पूछा।
अरविंद जी ने तुरंत अपने आँसू छुपाए और भर्राए गले से बोले, “बहुत… बहुत सुंदर लग रही है मेरी गुड़िया। भैया, यही लहंगा पैक कर दो।”
देखते ही देखते शादी की पूर्व संध्या आ गई। पूरा घर फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से जगमगा रहा था। नीचे रिश्तेदार नाच-गा रहे थे, लेकिन ऊपर अपने कमरे की बालकनी में अरविंद जी और वंदना जी चुपचाप खड़े थे।
अरविंद जी ने सिसकते हुए पत्नी का हाथ थामा और बोले, “वंदना, आज की रात हमारी बेटी इस घर में आखिरी बार सोएगी। कल से वह पराई हो जाएगी। पच्चीस साल तक जिस आँगन की वह रौनक रही, कल से वह इस घर की मेहमान कहलाएगी। हे भगवान, मेरी बच्ची को ससुराल में इतना प्यार मिले कि उसकी आँखों में कभी दुख की एक परछाई भी न आए।”
तभी पीछे से हाथों में मेहंदी लगाए तन्वी वहाँ आ गई। उसने माता-पिता को रोते देखा तो खुद को रोक नहीं पाई और दोनों के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।
“पापा, मम्मी… प्लीज मत रोइए न। मैं आपसे दूर कहाँ जा रही हूँ? मैं तो हमेशा आपके दिल की धड़कन बनकर आपके सीने में रहूँगी। आपकी ये परी जब भी आपको याद आएगी, एक वीडियो कॉल पर आपके सामने होगी। और पापा, मैंने रोहन से बात की है, हम कोशिश करेंगे कि अगले साल तक हम दोनों का ट्रांसफर यहीं देहरादून या आसपास हो जाए। फिर तो हर शनिवार-रविवार मैं आपका सिर खाने आ जाया करूँगी!” तन्वी ने रोते-रोते हँसने की कोशिश की।
अरविंद जी ने अपनी हथेली से बेटी के गालों के आँसू पोंछे और उसके माथे को चूमते हुए बोले, “हाँ मेरी बहादुर बेटी, हम तो बस यूँ ही भावुक हो गए थे। जा, अब सो जा, कल तुझे बहुत थकना है।”
अगले दिन बारात आई। खूब धूम-धाम से विवाह संपन्न हुआ और सुबह की पहली किरण के साथ तन्वी की विदाई हो गई। विदाई के वक्त अरविंद जी ने जिस तरह कार का दरवाजा पकड़कर रोना शुरू किया, वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें भीग गईं।
समय पंख लगाकर उड़ने लगा। शादी के करीब छह महीने बाद तन्वी पहली बार कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अकेले अपने मायके देहरादून आई। बेटी के आने की खुशी में अरविंद जी ने पूरा घर सिर पर उठा लिया था। बाजार से तन्वी की पसंद की हर सब्जी, मिठाई और आइसक्रीम लाकर फ्रिज भर दिया गया था।
लेकिन दो दिन के भीतर ही वंदना जी और अरविंद जी ने महसूस किया कि यह वो पुरानी चंचल तन्वी नहीं है। तन्वी घर में तो थी, पर कहीं खोई-खोई सी रहती थी। जिस घर के सोफे पर वह कभी पैर पसारकर लेट जाती थी और रिमोट छीनकर टीवी का चैनल बदल देती थी, आज वह उसी सोफे के एक कोने पर बड़ी शालीनता से, दुपट्टा संभालकर बैठती थी।
तीसरे दिन दोपहर को जब वंदना जी रसोई में थीं, तो तन्वी धीरे से रसोई के दरवाजे पर आई। उसने फ्रिज खोला, अंदर रखे आम और आइसक्रीम को देखा, फिर फ्रिज बंद करके बहुत ही धीमे और संकुचित स्वर में बोली, “मम्मी… क्या मैं फ्रिज से थोड़ी सी आइसक्रीम ले लूँ? और शाम को अगर आप बुरा न मानें तो मेरे लिए थोड़ी सी मैगी बन जाएगी?”
वंदना जी के हाथ से बेलन छूटते-छूटते बचा। और ठीक उसी वक्त बाहर खड़े अरविंद जी ने भी यह बात सुन ली। उन दोनों को ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके सीने में खंजर घोंप दिया हो।
वंदना जी ने तन्वी का हाथ पकड़ा और उसे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बिठाते हुए पूछा, “तन्वी! ये तू क्या कह रही है बेटा? अपने ही घर में, अपनी ही माँ से आइसक्रीम खाने की इजाजत मांग रही है? तू क्या इस घर में मेहमान है? तुझे क्या हो गया है बेटा, तू इतनी बदली-बदली क्यों है?”
माँ के इतना पूछते ही तन्वी के सब्र का बांध टूट गया। उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने सिसकते हुए कहा, “पता नहीं मम्मी… सच ही कहते हैं लोग कि शादी के बाद लड़कियाँ पराई हो जाती हैं। पुणे में अपने ससुराल की जिम्मेदारियों, वहाँ के कायदे-कानूनों और ‘हर काम पूछकर करने’ की आदत में मैं इस कदर ढल गई हूँ कि अब मुझे ये घर भी पराया सा लगने लगा है। यहाँ की किसी भी चीज को बिना पूछे छूने में एक अजीब सी झिझक और डर लगता है। ऐसा लगता है जैसे मेरा इस घर पर से हक खत्म हो गया है, अब मेरा घर वो है और यहाँ मैं सिर्फ चार दिन की मेहमान हूँ।”
तन्वी की बात सुनकर वंदना जी की आँखें भी छलक आईं। समाज का यही कड़वा सच है कि शादी के बाद लड़की ससुराल के सांचे में ढलते-ढलते अपने ही बचपन के आँगन में अजनबी बन जाती है।
तभी अरविंद जी कमरे के अंदर आए। उनके चेहरे पर एक दृढ़ संकल्प था। उन्होंने तन्वी का हाथ पकड़ा और उसे सीधा उसके पुराने कमरे में ले गए।
कमरे का दरवाजा खोलते ही तन्वी चौंक गई। उस कमरे में आज भी उसकी किताबें, उसके टेडी बियर, दीवार पर लगी उसकी बचपन की तस्वीरें और उसकी अलमारी बिल्कुल वैसी ही सजी हुई थी जैसे वह छोड़कर गई थी। यहाँ तक कि स्टडी टेबल पर उसका पुराना लैपटॉप और पेन स्टैंड भी उसी जगह रखा था।
अरविंद जी ने अपनी जेब से चाबियों का एक गुच्छा निकाला और तन्वी की हथेली पर रखते हुए बोले, “तन्वी, ध्यान से सुन मेरी बात। दुनिया और समाज ने यह बहुत गलत मुहावरा बनाया है कि ‘बेटियाँ पराई धन होती हैं’। कोई भी इंसान या रिश्ता कागज के टुकड़े या सात फेरों से पराया नहीं हो जाता। ससुराल तेरा नया परिवार है, वहाँ की जिम्मेदारियाँ तेरा फर्ज हैं, और मुझे गर्व है कि तू उन्हें बखूबी निभा रही है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि तेरी जड़ें इस घर से कट गईं!”
अरविंद जी की आवाज में पिता का असीम स्नेह और अधिकार था। उन्होंने आगे कहा, “यह चाबी इस घर के मुख्य द्वार, तेरी अलमारी और रसोई के हर डिब्बे की है। जब तक तेरे पापा और मम्मी इस दुनिया में हैं, और हमारे जाने के बाद भी, इस घर की हर ईंट पर तेरा उतना ही हक है जितना शादी से पहले था। पेड़ की डाली अगर बढ़कर पड़ोसी के आँगन में छांव देने लगे, तो वह पेड़ से अलग नहीं हो जाती मेरी बच्ची! आज के बाद अगर तूने इस घर में किसी भी चीज को छूने से पहले मुझसे या अपनी माँ से पूछा, तो मैं समझूँगा कि मेरी परवरिश में कोई कमी रह गई।”
इसके बाद अरविंद जी ने तन्वी के कमरे के दरवाजे के बाहर लगी नेमप्लेट की तरफ इशारा किया। उस पर आज भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— ‘तन्वी का कमरा (अधिकार क्षेत्र: सिर्फ तन्वी)’।
पिता के ये शब्द सुनकर तन्वी के भीतर बैठा सारा संकोच, सारा परायापन बर्फ की तरह पिघलकर बह गया। वह दौड़कर अपने पापा के सीने से लिपट गई।
“आई लव यू पापा! मैं पागल थी जो ऐसा सोच रही थी। मैं कभी पराई नहीं हो सकती, मैं तो हमेशा आपकी वही नखरे वाली गुड़िया रहूँगी!” तन्वी ने आँसू पोंछते हुए कहा और तुरंत रसोई में जाकर बिना किसी से पूछे फ्रिज से आइसक्रीम का पूरा डिब्बा निकाला और सोफे पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गई।
उस शाम लॉन के उसी पुराने झूले पर बैठकर तन्वी अपने पापा के साथ आइसक्रीम खा रही थी और अपनी कंपनी के किस्से सुना रही थी। अरविंद जी और वंदना जी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। आज उन्होंने अपनी बेटी को ‘मेहमान’ बनने से बचा लिया था और यह साबित कर दिया था कि बेटियाँ दहलीज के उस पार जाएं या इस पार रहें, माता-पिता के घर और दिल पर उनका अधिकार कभी समाप्त नहीं होता।
दोस्तों, यह कहानी हर उस बेटी के दिल का हाल है जो शादी के बाद अपने ही मायके में खुद को मेहमान समझने लगती है, और हर उस माता-पिता की व्यथा है जो अपनी बेटी को पराई होते देखते हैं। क्या आपने भी कभी अपने मायके में या अपनी बेटी के व्यवहार में यह बदलाव महसूस किया है? एक बेटी को मायके में कभी परायापन महसूस न हो, इसके लिए माता-पिता को क्या करना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें!
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लेखक : मुकेश पटेल