राजवर्धन जी की आँखों से पश्चाताप के गर्म आँसू बह निकले। समाज की उस सड़ी-गली मानसिकता पर उन्हें आज घृणा हो रही थी, जिसका हिस्सा वह खुद बन गए थे। समाज का यह कैसा दोहरा मापदंड है? जब बात अपनी बेटी की आती है, तो हर पिता चाहता है कि ससुराल में उसे रानी बनाकर रखा जाए और मायके में भी उसका सम्मान बरकरार रहे, लेकिन जब बात अपनी बहन की आती है, तो वही इंसान भाई की भूमिका में आते ही बहन को बोझ और हिस्सा बंटाने वाली परायी औरत समझने लगता है!
अक्टूबर का महीना था, भाई दूज और दिवाली की तैयारियाँ पूरे जोरों पर थीं। घर के हर कोने को दीपों और रंगीन झालरों से सजाया जा रहा था। राजवर्धन जी की पत्नी रेणुका रसोई में मेवे भून रही थीं और उनकी चौदह साल की बेटी अनन्या ड्राइंग रूम में बैठकर अपने लिए नए लहंगे के डिजाइन देख रही थी।
तभी बारह साल का वेदांत अपने स्कूल बैग को सोफे पर पटकते हुए अंदर आया। उसके चेहरे पर बच्चों वाली चंचलता के बजाय एक गहरी उलझन थी। उसने पानी का गिलास उठाया, लेकिन पिया नहीं। वह सीधे रसोई के दरवाजे पर जाकर खड़ा हो गया और अपनी माँ को एकटक देखने लगा।
रेणुका ने बेटे को देखा तो मुस्कुराते हुए पूछा, “क्या हुआ मेरे लाल? आज स्कूल में किसी से झगड़ा हो गया क्या? मुँह क्यों फुला रखा है?”
वेदांत ने गंभीर स्वर में पूछा, “मम्मी, आज स्कूल में हमारे क्लास टीचर ने त्योहारों और पारिवारिक रिश्तों पर एक निबंध लिखने को कहा था। मेरे दोस्त बता रहे थे कि भाई दूज पर उनकी बुआ उनके घर आती हैं, उनके पापा अपनी बहनों के घर जाते हैं, उन्हें तोहफे देते हैं। मम्मी, हमारी वंदना बुआ हमारे घर क्यों नहीं आतीं? मैंने जब से होश संभाला है, उन्हें सिर्फ उस पुरानी एल्बम की तस्वीरों में ही देखा है, जो दादाजी की अलमारी में रखी है। क्या हमारी कोई बुआ नहीं है?”
रेणुका के हाथ से कलछी छूटते-छूटते बची। चेहरे का रंग अचानक बदल गया। उन्होंने तुरंत खुद को संभालते हुए बात टालने की कोशिश की, “अरे बेटा, तुम्हारी बुआ अजमेर में रहती हैं। वहाँ से यहाँ आना-जाना थोड़ा मुश्किल होता है, और फिर उनके अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ भी तो हैं। समय नहीं मिल पाता होगा।”
वेदांत आज जैसे किसी और ही मिट्टी का बना हुआ था। वह माँ की इस बनावटी दलील से संतुष्ट नहीं हुआ। वह रसोई के अंदर आया और स्लैब के सहारे टिककर बोला, “मम्मी, अजमेर कोई सात समंदर पार तो नहीं है। पापा तो अपने बिजनेस के सिलसिले में हर महीने दिल्ली और मुंबई जाते हैं। और अगर बुआ नहीं आ सकतीं, तो क्या वह फोन भी नहीं कर सकतीं? पिछले आठ सालों में मैंने कभी पापा को उनसे फोन पर बात करते नहीं देखा। न दिवाली पर, न राखी पर। आप मुझसे झूठ क्यों बोल रही हो मम्मी? आखिर बात क्या है?”
रेणुका ने देखा कि वेदांत की आँखों में सवालों का एक ऐसा समंदर था, जिसे अब और झूठ के बाँध से नहीं रोका जा सकता था। उन्होंने एक बार बाहर की ओर देखा। राजवर्धन जी अभी ऑफिस से नहीं लौटे थे, या शायद उन्हें ऐसा लगा कि वह घर पर नहीं हैं। दरअसल, राजवर्धन जी कुछ देर पहले ही घर आ चुके थे और रसोई के ठीक बगल वाले अपने अध्ययन कक्ष में बैठे अपनी फाइलें देख रहे थे। दरवाजा अधखुला होने के कारण माँ-बेटे की सारी बातें उनके कानों में साफ पड़ रही थीं।
वेदांत की जिद के आगे हार मानकर रेणुका ने गैस बंद की और आंचल से हाथ पोंछते हुए वहीं रखी कुर्सी पर बैठ गईं। एक गहरी सांस लेकर उन्होंने अतीत के उस पन्ने को खोला, जिसे इस घर में खोलना वर्जित था।
“बेटा वेदांत,” रेणुका ने धीमे स्वर में कहना शुरू किया, “आज से करीब आठ साल पहले जब तुम्हारे दादाजी, यानी हरिवंश बाबूजी का देहांत हुआ था, तब तुम बहुत छोटे थे। दादाजी के जाने के कुछ ही महीनों बाद तुम्हारे फूफाजी शरद जी को उनके कपड़ों के व्यापार में बहुत बड़ा घाटा हुआ। कर्जदारों ने उनका जीना मुहाल कर दिया था। उनकी दुकान बिकने की नौबत आ गई थी और सिर से छत छिनने का खतरा मंडरा रहा था। चारों तरफ से निराश होकर तुम्हारी वंदना बुआ यहाँ आई थीं।”
वेदांत बड़े ध्यान से सुन रहा था। अनन्या भी अपना फोन छोड़कर रसोई के दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गई थी।
रेणुका ने आगे कहा, “उस वक्त दादाजी की वसीयत नहीं खुली थी, लेकिन उनकी छोड़ी हुई करोड़ों की पुश्तैनी जमीन और यह घर तुम्हारे पापा की देखरेख में था। तुम्हारी बुआ ने बड़े संकोच और आँसुओं के साथ तुम्हारे पापा से कहा था कि ‘भैया, इस वक्त हम बहुत बड़ी मुसीबत में हैं। बाबूजी की जो पुश्तैनी जमीन शहर के बाहर पड़ी है, उसमें से थोड़ा सा हिस्सा या उसके बराबर की रकम मुझे दे दो, ताकि तुम्हारे जीजाजी का कर्ज उतर सके और हम सड़क पर आने से बच जाएं। मैं अपना पूरा हक नहीं मांग रही, बस इस बुरे वक्त में अपने पिता की संपत्ति में से थोड़ा सा सहारा मांग रही हूँ।'”
“तो फिर पापा ने मदद कर दी होगी ना?” वेदांत ने मासूमियत से पूछा।
रेणुका की आँखें झुक गईं। “नहीं बेटा। यह बात सुनते ही तुम्हारे पापा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने और हमारे रिश्तेदारों ने मिलकर तुम्हारी बुआ को बहुत भला-बुरा कहा। पापा ने गुस्से में कह दिया कि ‘शादी में इतना सोना-चांदी और दहेज दिया था, क्या वह कम था जो अब मायके की जमीन पर भी नजर गड़ाए बैठी हो? एक बार लड़की की डोली घर से उठ गई, तो उसका पिता की संपत्ति से नाता खत्म हो जाता है। अच्छे घर की बेटियाँ मायके से हिस्सा नहीं मांगतीं।'”
“बुआ ने बहुत समझाने की कोशिश की कि वह लालच में नहीं, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य को बचाने की मजबूरी में हाथ फैला रही हैं, लेकिन पापा ने एक न सुनी। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि आज के बाद अगर संपत्ति की बात करनी हो, तो इस घर की दहलीज मत लांघना। तुम्हारी बुआ बहुत स्वाभिमानी थीं। अपने सगे भाई के मुँह से अपने लिए ‘लालची’ और ‘परायी’ जैसे शब्द सुनकर उनका दिल टूट गया। वह रोते हुए खाली हाथ लौट गईं। बाद में पता चला कि उन्होंने अपने गहने बेचकर और छोटे-मोटे काम करके अपनी गृहस्थी को फिर से संभाला, लेकिन उस दिन के बाद से उन्होंने कभी इस घर की तरफ मुड़कर नहीं देखा। और तुम्हारे पापा ने भी अपने अहंकार में कभी उनकी सुध नहीं ली।”
कहानी खत्म होते ही रसोई में एक गहरा सन्नाटा पसर गया। चौदह साल की अनन्या की आँखों में नमी तैर गई थी, और बारह साल का वेदांत जैसे किसी गहरी सोच में डूब गया था।
कुछ पल की खामोशी के बाद वेदांत ने जो कहा, उसने न केवल रेणुका को, बल्कि अध्ययन कक्ष में छुपकर सुन रहे राजवर्धन जी को भी भीतर तक हिलाकर रख दिया।
वेदांत ने अपनी बहन अनन्या की तरफ देखा और फिर अपनी माँ से बिल्कुल सपाट लहजे में बोला, “मम्मी, तो इसका मतलब यह हुआ कि इस घर में, पापा के बिजनेस में और दादाजी की जमीन में अनन्या दीदी का कोई हक नहीं है? यह सब कुछ सिर्फ मेरा है?”
रेणुका चौंक पड़ीं, “यह कैसी बात कर रहे हो वेदांत? अनन्या तुम्हारी सगी बहन है, इस घर की बेटी है!”
वेदांत ने तुरंत तर्क दिया, “तो वंदना बुआ कौन थीं मम्मी? क्या वह दादाजी की सगी बेटी नहीं थीं? क्या वह पापा की सगी बहन नहीं थीं? अगर दादाजी की संपत्ति पर बुआ का हक नहीं था और उनका मुसीबत में हिस्सा मांगना अपराध था, तो कल को जब मैं बड़ा हो जाऊंगा और अनन्या दीदी की शादी हो जाएगी, तब अगर कभी जीजाजी पर कोई मुसीबत आई और दीदी ने मुझसे मदद के तौर पर पापा की प्रॉपर्टी में से अपना हिस्सा मांगा, तो मैं भी उन्हें धक्के मारकर घर से निकाल दूंगा! मैं भी कह दूंगा कि तुम्हारी शादी में पापा ने खर्चा कर दिया था, अब तुम परायी हो और मेरी संपत्ति पर नजर मत डालो। तब आपको और पापा को कैसा लगेगा मम्मी? क्या तब भी पापा यही कहेंगे कि वेदांत ने बिल्कुल सही किया?”
“वेदांत! चुप हो जाओ!” रेणुका की आवाज कांप उठी।
लेकिन अध्ययन कक्ष में खड़े राजवर्धन जी के पैरों तले तो जैसे जमीन ही खिसक गई थी। उनके हाथ से फाइल छूटकर नीचे गिर पड़ी। वेदांत के एक-एक शब्द ने उनके सीने पर हथौड़े की तरह चोट की थी। उन्होंने दरवाजे की झिरी से देखा—उनकी लाडली बेटी अनन्या, जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा चाहते थे, जिसकी एक मुस्कान के लिए वह दुनिया भर की दौलत लुटाने को तैयार रहते थे, वह इस वक्त सहमी हुई सी दीवार के सहारे खड़ी थी।
राजवर्धन जी की कल्पना में अचानक भविष्य का एक भयानक दृश्य कौंध गया। उन्हें लगा जैसे वह इस दुनिया में नहीं हैं, और उनकी अनन्या किसी बड़ी मुसीबत में घिरकर अपने भाई वेदांत के सामने हाथ फैलाए खड़ी है, और वेदांत उसे ‘लालची’ कहकर दरवाजे से भगा रहा है। यह दृश्य सोचते ही राजवर्धन जी की रूह कांप उठी। उनके माथे पर पसीना छलक आया और दिल की धड़कनें तेज हो गईं। नहीं! उनकी अनन्या के साथ ऐसा कभी नहीं हो सकता! अनन्या तो उनके कलेजे का टुकड़ा है, उनकी कमाई की पाई-पाई पर जितना हक वेदांत का है, उतना ही हक अनन्या का भी है।
तभी उनके अंतर्मन से एक आवाज उठी—“तो फिर वंदना कौन थी राजवर्धन? क्या वह बाबूजी के कलेजे का टुकड़ा नहीं थी?”
राजवर्धन जी वहीं कुर्सी पर ढह से गए। आँखों के सामने से अहंकार और लोभ का वह पर्दा, जो पिछले आठ सालों से पड़ा हुआ था, आज उनके बारह साल के बेटे ने एक झटके में नोचकर फेंक दिया था। उन्हें अपना बचपन याद आने लगा। वंदना उनसे तीन साल छोटी थी, लेकिन हमेशा उनकी परछाई बनकर रहती थी।
उन्हें याद आया कि कैसे स्कूल के दिनों में जब बाबूजी दोनों को मेले में जाने के लिए पांच-पांच रुपये देते थे, तो वंदना अपने पैसे कभी खर्च नहीं करती थी। जब राजवर्धन के पैसे खत्म हो जाते और उनका मन किसी खिलौने या मिठाई पर आ जाता, तो वंदना अपनी मुट्ठी खोलकर अपने बचाए हुए पैसे भाई की हथेली पर रख देती थी और कहती थी, “भैया, तुम ले लो, मुझे भूख नहीं है।”
उन्हें वह रात भी याद आई जब उन्हें मलेरिया हुआ था और तेज बुखार में वह तप रहे थे। तब चौदह साल की वंदना ने पूरी रात जागकर उनके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखी थीं। जिस बहन ने बचपन से लेकर अपनी शादी तक, हर दुआ में सिर्फ अपने भाई की सलामती और तरक्की मांगी, जब वक्त की मार ने उसे घुटनों पर ला दिया और उसने अपने ही पिता की छोड़ी हुई अकूत संपत्ति में से थोड़ा सा सहारा मांगा, तो उन्होंने क्या किया?
मिट्टी के कुछ टुकड़ों और कागज के कुछ नोटों के लिए उन्होंने अपनी सगी बहन के चरित्र पर उंगली उठा दी? उसे ‘परायी’ और ‘मतलबी’ कह दिया?
राजवर्धन जी की आँखों से पश्चाताप के गर्म आँसू बह निकले। समाज की उस सड़ी-गली मानसिकता पर उन्हें आज घृणा हो रही थी, जिसका हिस्सा वह खुद बन गए थे। समाज का यह कैसा दोहरा मापदंड है? जब बात अपनी बेटी की आती है, तो हर पिता चाहता है कि ससुराल में उसे रानी बनाकर रखा जाए और मायके में भी उसका सम्मान बरकरार रहे, लेकिन जब बात अपनी बहन की आती है, तो वही इंसान भाई की भूमिका में आते ही बहन को बोझ और हिस्सा बंटाने वाली परायी औरत समझने लगता है!
वह भूल गए थे कि वंदना ने हिम्मत जुटाकर किसी गैर से भीख नहीं मांगी थी, उसने अपने उस भाई से अधिकार मांगा था, जिसकी कलाई पर उसने पच्चीस सालों तक रक्षासूत्र बांधा था। और रक्षासूत्र का अर्थ ही होता है—हर संकट में रक्षा का वचन। लेकिन जब वंदना पर सबसे बड़ा आर्थिक और मानसिक संकट आया, तो रक्षा करने के बजाय उन्होंने उसके आत्मसम्मान की ही हत्या कर दी।
आठ साल! पूरे आठ साल उन्होंने इस झूठे दंभ में गुजार दिए कि गलती वंदना की थी। इस बीच न जाने वंदना और उसके परिवार ने कैसे-कैसे दिन देखे होंगे। शरद जी ने कैसे अपना कर्ज चुकाया होगा? वंदना ने अपनी गृहस्थी चलाने के लिए क्या-क्या कष्ट सहे होंगे? यह सोचकर ही राजवर्धन जी का कलेजा फटने को हो आया।
वह भारी कदमों से चलते हुए अध्ययन कक्ष से बाहर निकले। उन्हें अचानक सामने देखकर रेणुका, वेदांत और अनन्या तीनों सकपका गए। वेदांत को लगा कि शायद पापा ने उसकी बात सुन ली है और अब वह उस पर बहुत गुस्सा करेंगे। वह डर के मारे अपनी माँ के थोड़ा करीब खिसक गया।
लेकिन राजवर्धन जी के चेहरे पर क्रोध नहीं था। उनकी आँखें लाल थीं और गालों पर आँसुओं की लकीरें साफ दिख रही थीं। परिवार में किसी ने भी राजवर्धन जैसे सख्त और रौबदार इंसान को कभी इस तरह रोते हुए नहीं देखा था।
राजवर्धन जी सीधे वेदांत के पास गए और अपने घुटनों के बल उसके सामने बैठ गए। उन्होंने वेदांत के दोनों छोटे-छोटे हाथों को अपने हाथों में लिया और रुंधे हुए गले से बोले, “बेटा, आज तूने सिर्फ अपनी माँ से सवाल नहीं पूछा, बल्कि अपने इस अंधे हो चुके बाप की आँखें खोल दी हैं। मैं उम्र में तुझसे बहुत बड़ा हूँ वेदांत, लेकिन आज समझदारी और इंसाफ की जो बात तूने कही है, उसके सामने मेरा सारा ज्ञान और तजुर्बा बौना पड़ गया है।”
वेदांत और रेणुका अवाक होकर उन्हें देख रहे थे।
राजवर्धन जी ने खड़े होकर अपनी बेटी अनन्या को अपने सीने से लगा लिया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए वह बोले, “अनन्या बेटा, तेरे भाई ने जो कहा था, वह कभी सच नहीं होगा। इस घर की हर ईंट पर, मेरी हर सांस और मेरी हर संपत्ति पर तेरा उतना ही अधिकार है, जितना वेदांत का है। और यह अधिकार सिर्फ तेरा ही नहीं, तेरी वंदना बुआ का भी है, जिसे मैंने अपने लालच और अहंकार में छीन लिया था।”
रेणुका की आँखों से भी आँसू बहने लगे। वह कब से चाहती थीं कि ननद और भाई के बीच की यह दीवार गिरे, लेकिन पति के क्रोध के आगे वह हमेशा बेबस रहीं।
राजवर्धन जी ने अपने आँसू पोंछे और अपनी पत्नी से कहा, “रेणुका, आज भाई दूज के लिए मिठाई तुम नहीं बनाओगी। आज हम सब मिलकर अजमेर चलेंगे। आठ साल से मैंने अपनी बहन के जिन आँसुओं का कर्ज अपने सिर पर लाद रखा है, आज उसे उतारने का वक्त आ गया है। मैं नहीं जानता कि वह मुझे माफ करेगी या नहीं, लेकिन मैं उसके पैरों में गिरकर अपनी भूल की क्षमा जरूर मांगूंगा।”
अगले ही दिन सुबह, राजवर्धन जी ने अपने वकील को घर बुलाकर सबसे पहले बाबूजी की उस पुश्तैनी जमीन का आधा हिस्सा कानूनी तौर पर अपनी बहन वंदना के नाम करवाया। इतना ही नहीं, पिछले आठ सालों में उस जमीन से जो भी आमदनी हुई थी, उसका पूरा हिसाब लगाकर एक बैंक ड्राफ्ट तैयार करवाया।
दोपहर होते-होते राजवर्धन जी की गाड़ी अजमेर की सड़कों पर दौड़ रही थी। गाड़ी में रेणुका, अनन्या और वेदांत भी बैठे थे। ढाई घंटे के सफर में राजवर्धन जी पूरे रास्ते खामोश रहे। उनके मन में एक अजीब सी घबराहट थी। आठ साल पहले उन्होंने जिस बहन को दरवाजे से लौटाया था, आज उसी की दहलीज पर वह किस मुँह से जाएंगे?
अजमेर की एक साधारण सी कॉलोनी में गाड़ी रुकी। पहले वंदना का परिवार एक बड़े बंगले में रहता था, लेकिन कर्ज चुकाने के लिए उन्हें वह बंगला बेचना पड़ा था और अब वे इस छोटे से पर साफ-सुथरे मकान में रहते थे। यह देखकर राजवर्धन जी का दिल और भी कचोट उठा। जहाँ वह उदयपुर की हवेली में ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहे थे, वहीं उनकी बहन ने इस छोटे से घर में संघर्ष के दिन काटे थे।
कांपते हाथों से राजवर्धन जी ने दरवाजे की घंटी बजाई। कुछ पल बाद दरवाजा खुला। सामने वंदना खड़ी थी। आठ सालों में वंदना के बालों में सफेदी आ चुकी थी, चेहरे पर वक्त के थपेड़ों और संघर्ष की झुर्रियाँ साफ दिख रही थीं, लेकिन आँखों में वही पुरानी सौम्यता थी।
दरवाजे पर अपने भाई और भाभी को देखकर वंदना को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। उसके हाथ में पूजा की थाली थी, शायद वह मंदिर जाने की तैयारी कर रही थी। भाई को देखते ही उसके होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाए, लेकिन आवाज गले में ही अटक गई। आठ साल का दर्द, अपमान और साथ ही भाई से बिछड़ने की तड़प—सब कुछ एक साथ उसकी आँखों में उमड़ आया।
इससे पहले कि वंदना कुछ समझ पाती, राजवर्धन जी ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथ जोड़ दिए और फूट-फूटकर रो पड़े।
“मुझे माफ कर दे वंदना… अपने इस पापी और स्वार्थी भाई को माफ कर दे गुड़िया!” राजवर्धन जी की आवाज पूरे आँगन में गूंज उठी और वह झुककर अपनी छोटी बहन के पैर छूने लगे।
“भैया! यह क्या कर रहे हो आप!” वंदना ने तड़पकर पूजा की थाली वहीं मेज पर रखी और भाई को कंधों से पकड़कर उठा लिया। भाई के आँसू देखकर वंदना के भीतर जमा आठ सालों की सारी शिकायतों की बर्फ एक पल में पिघलकर बह गई। वह भाई के सीने से लगकर बच्चों की तरह सिसक-सिसक कर रोने लगी।
“भैया, आप बड़े हो, पिता समान हो मेरे लिए… मुझे पाप का भागीदार मत बनाओ भैया!” वंदना रोते हुए बोली।
“पिता समान होने का फर्ज कहाँ निभा पाया मैं वंदना?” राजवर्धन जी ने बहन के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बाबूजी ने तो मरते दम तक तुझे पलकों पर बिठाकर रखा, और मैंने? मैंने चंद जमीन के टुकड़ों के लिए अपनी उस बहन को ठुकरा दिया, जिसने अपने हिस्से की खुशियां हमेशा मेरी झोली में डालीं। मैं अंधा हो गया था गुड़िया। मुझे माफ कर दे।”
तभी अंदर से शरद जी भी बाहर आ गए। राजवर्धन जी ने आगे बढ़कर शरद जी को भी गले से लगा लिया और उनसे अपनी पिछली कड़वी बातों के लिए हाथ जोड़कर माफी मांगी। शरद जी भी एक सुलझे हुए इंसान थे, उन्होंने पुरानी बातों को भुलाकर साले साहब को आदर सहित अंदर बिठाया।
रेणुका ने आगे बढ़कर वंदना को गले लगाया और फिर वेदांत और अनन्या को आगे किया। वंदना ने जब दोनों बच्चों को देखा तो उसकी आँखें चमक उठीं। उसने दोनों को अपने सीने से भींच लिया और उनके माथे चूम लिए।
जब सब लोग बैठ गए और माहौल थोड़ा शांत हुआ, तो राजवर्धन जी ने अपने बैग से जमीन के कागजात और बैंक ड्राफ्ट निकालकर वंदना के हाथों में रख दिए।
वंदना ने चौंककर कागजात देखे और फिर भाई की तरफ देखते हुए बोली, “भैया, इसकी अब कोई जरूरत नहीं है। भगवान की दया से अब सब ठीक है। आपके जीजाजी का व्यापार फिर से पटरी पर आ गया है और हम संतुष्ट हैं। उस वक्त मेरी मजबूरी थी, इसलिए मैं आपके पास आई थी। आज मुझे संपत्ति नहीं, सिर्फ मेरा भाई चाहिए, जो मुझे आज मिल गया है। आप ये कागज वापस रख लीजिए।”
राजवर्धन जी ने वंदना के हाथों को अपने हाथों में थामते हुए कहा, “वंदना, यह कोई एहसान या मदद नहीं है, जिसे तू मना कर रही है। यह हमारे बाबूजी की अमानत है, जिसमें तेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। अगर आज तूने इसे स्वीकार नहीं किया, तो मैं जीते-जी कभी खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा। और फिर, यह सिर्फ मेरा फैसला नहीं है, यह तेरे इस भतीजे वेदांत का फैसला है।”
राजवर्धन जी ने जब वंदना और शरद जी को कल शाम रसोई में हुई वेदांत की बातों के बारे में बताया, तो वंदना की आँखें एक बार फिर छलक आईं। उसने वेदांत को अपने पास बुलाया और उसे गले से लगाते हुए कहा, “आज तूने सिर्फ बुआ-भतीजे का रिश्ता नहीं जोड़ा बेटा, बल्कि इस समाज को एक बहुत बड़ा आईना दिखाया है।”
उस शाम अजमेर के उस छोटे से घर में जो रौनक थी, वह किसी महल से कम नहीं थी। आठ साल बाद भाई-बहन ने एक साथ बैठकर खाना खाया, बचपन की यादें ताजा कीं और खूब हंसे। रिश्तों पर जमी आठ साल पुरानी धूल आज एक बच्चे की निश्छल समझदारी और न्यायप्रियता से पूरी तरह साफ हो चुकी थी। राजवर्धन जी ने तय किया कि इस बार दिवाली और भाई दूज का त्योहार वंदना और उसका पूरा परिवार उदयपुर की हवेली में ही मनाएगा, क्योंकि बेटियाँ कभी परायी नहीं होतीं, वे तो हर आँगन की असली रौनक होती हैं।
आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
क्या वाकई शादी के बाद पिता की संपत्ति या मायके के अधिकारों से बेटियों का नाता खत्म हो जाना चाहिए? जब हम अपनी बेटी के लिए हर सुख चाहते हैं, तो अपनी बहन को उसका जायज हक देने में हमारे कदम क्यों पीछे हट जाते हैं? वेदांत की किस बात ने आपके दिल को सबसे ज्यादा छुआ? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपकी एक राय समाज की सोच बदल सकती है!
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मूल लेखिका : प्राची अग्रवाल