नंदिनी एकदम चौंक गई। उसने फौरन झुककर अपनी सास के हाथ पकड़े और उन्हें उठाया, “मम्मी जी, यह आप क्या कर रही हैं? आप मेरी माँ के समान हैं, मुझसे बड़ी हैं। इस तरह हाथ जोड़कर मुझे पाप का भागी मत बनाइए। लेकिन… आज मैं आपसे एक सवाल जरूर पूछना चाहती हूँ।”
नंदिनी की आवाज भर्रा गई, “आखिर आपने और पापा जी ने मेरे सीधे-सादे माता-पिता के साथ ऐसा क्यों किया? उन्होंने अपने जीवन भर की जमा-पूंजी और अपने दिल का टुकड़ा यह सोचकर आपको सौंप दिया कि उनकी बेटी एक सुरक्षित और खुशहाल घर में जा रही है। अगर उन्हें पता चला कि यहाँ मेरे रिश्ते का सच क्या है, तो उनका दिल टूट जाएगा। वे जीते जी मर जाएंगे। मैं उन्हें कैसे संभालूँगी?”
‘शांति निकेतन’ की देहरी आज गेंदे और चमेली के ताजे फूलों की महक से महक रही थी। घर के मुख्य द्वार पर रंग-बिरंगी रंगोली सजी थी और रिश्ते-नातेदारों की चहल-पहल से पूरा वातावरण जीवंत हो उठा था। कल्याणी जी के चेहरे पर आज एक अलग ही तेज और संतोष था। हाथों में आरती की सजी हुई थाली लिए वह दरवाजे पर खड़ी थीं। उनके बगल में उनके पति उमाकांत जी भी खड़े थे, जिनके चेहरे पर मुस्कान तो थी, मगर आँखों के किसी कोने में एक हल्की सी चिंता की लकीर रह-रहकर उभर आती थी।
गाड़ी का दरवाजा खुला और लाल जोड़े में लिपटी, सोने के हल्के गहनों से सजी नंदिनी ने कदम बाहर निकाला। घूंघट की ओट से जब उसने पहली बार अपने ससुराल की जमीन पर कदम रखा, तो कल्याणी जी की आँखें खुशी से भर आईं। नंदिनी रूप-रंग और संस्कारों का ऐसा संगम थी, जिसे देखकर किसी भी माँ का दिल गदगद हो जाए। कल्याणी जी को लगा कि उनके घर की सारी पुरानी उलझनें अब समाप्त हो जाएंगी। उन्हें पूरा भरोसा था कि नंदिनी की सौम्यता और समझदारी उनके इकलौते बेटे शौर्य की हर नाराजगी और उसकी लापरवाह आदतों को हमेशा के लिए बदल देगी।
“अरे कल्याणी भाभी! अब किस सोच में डूब गईं? जरा आरती तो उतारिए, दुल्हन को कब तक दरवाजे पर खड़ा रखेंगी?” पास खड़ी मौसी ने चुटकी लेते हुए कहा तो सब हंस पड़े। कल्याणी जी ने खुद को संभाला, प्यार से नंदिनी के माथे पर कुमकुम का तिलक लगाया, आरती उतारी और चावल का कलश पैर से धीरे से गिराते हुए नंदिनी का गृहप्रवेश कराया।
अंदर आते ही जब कजिन्स ने शौर्य और नंदिनी को घेरना चाहा और हंसी-मजाक की शुरुआत की, तभी शौर्य ने अचानक अपना हाथ छुड़ा लिया। शेरवानी की बटन खोलते हुए वह भारी कदमों से सीधे सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगा।
“अरे शौर्य भैया! इतनी क्या जल्दी है? अभी तो अंगूठी ढूंढने वाली रस्म बाकी है, इतनी आसानी से भाभी को कमरे में नहीं ले जाने देंगे!” उसकी चचेरी बहन श्वेता ने हंसते हुए रास्ता रोका।
शौर्य का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने ऊंची और कड़क आवाज में कहा, “मुझे किसी रस्म-वस्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। तमाशा बंद करो। मैं बहुत बुरी तरह थक चुका हूँ और सोने जा रहा हूँ। कोई मेरे कमरे में न आए।”
इतना कहकर वह धड़धड़ाते हुए ऊपर चढ़ गया और कमरे का दरवाजा जोर से बंद कर लिया। उस भारी आवाज की गूंज पूरे हॉल में सन्नाटा खींच गई। हंसते-खिलखिलाते चेहरे अचानक बुझ गए। कल्याणी जी और उमाकांत जी के सिर शर्मिंदगी से झुक गए। शादी के पहले ही दिन, सबके सामने बेटे की इस बदतमीजी ने बड़ों के मान-सम्मान को ठेस पहुँचाई थी। कल्याणी जी ने किसी तरह बात संभालते हुए रिश्तेदारों को समझाया, फिर ऊपर जाकर शौर्य की मान-मनौव्वल की। बहुत मिन्नतों के बाद शौर्य नीचे आया और बेमन से, बिना किसी की तरफ देखे, औपचारिकता पूरी करके वापस चला गया। नंदिनी ने चुपचाप अपनी पलकें झुका रखी थीं। वह नई नवेली दुल्हन थी, जिसके मन में दांपत्य जीवन के अनगिनत सुंदर सपने थे, मगर पहले ही दिन मिले इस बर्ताव ने उसके कोमल दिल को अंदर तक आहत कर दिया था। उसने सब कुछ देखा, समझा, पर मर्यादा और लाज के कारण एक लफ्ज भी नहीं कहा।
अगली सुबह नंदिनी के बड़े भाई और भाभी उसे पहली पगफेरे की रस्म के लिए मायके ले जाने आए। यह तय हुआ कि दो दिन मायके में रहने के बाद ससुराल वाले शौर्य के साथ उसे लेने प्रयागराज जाएंगे। विदाई के समय भी शौर्य औपचारिकता निभाते हुए सिर्फ चंद सेकंड के लिए सामने आया और फोन पर बात करने का बहाना बनाकर हट गया।
जब नंदिनी अपने मायके पहुँची, तो वहाँ का माहौल उत्सव जैसा था। पिता गिरीश जी, माँ मालती और परिवार के अन्य सदस्य दरवाजे पर ही उसका इंतजार कर रहे थे। बेटी को देखते ही पिता ने उसे गले से लगा लिया। उस आत्मीय स्पर्श को पाते ही नंदिनी के भीतर दबा हुआ दर्द आंसुओं का सैलाब बनकर छलक पड़ा। वह माँ से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगी।
“क्या हुआ मेरी बच्ची? तबीयत तो ठीक है? किसी ने कुछ कहा क्या?” मालती जी घबराकर पूछने लगीं।
नंदिनी ने जल्दी से अपने आंसू पोंछे और चेहरे पर झूठी मुस्कान लाते हुए बोली, “अरे माँ, कुछ भी तो नहीं हुआ। बस आप सबकी बहुत याद आ रही थी, इसलिए खुद को रोक नहीं पाई।” उसने अपने ससुराल की कड़वी सच्चाई को अपने आंचल में ही समेट लिया ताकि मायके वालों की खुशी में खलल न पड़े।
दो दिन बीत गए। तय समय के अनुसार ससुराल से गाड़ी आई, मगर गाड़ी से केवल उमाकांत जी और कल्याणी जी उतरे। शौर्य उनके साथ नहीं था। नए दामाद के स्वागत के लिए गिरीश जी ने दरवाजे से लेकर ड्राइंग रूम तक पलक-पांवड़े बिछा रखे थे। कई तरह के व्यंजन बने थे, आस-पड़ोस के लोग भी दामाद जी से मिलने का इंतजार कर रहे थे। शौर्य को न पाकर पूरे घर का रंग उड़ गया। माहौल में एक असहज चुप्पी छा गई।
गिरीश जी ने हाथ जोड़ते हुए बहुत ही संजीदगी से कहा, “उमाकांत जी, क्षमा कीजिएगा, लेकिन आज पगफेरे के बाद पहली बार दामाद जी का अपनी ससुराल आना एक महत्वपूर्ण परंपरा थी। हमने बहुत उम्मीदों, बड़े नाजों और अरमानों के साथ अपनी बेटी को आपके घर सौंपा है। बस इतना ही निवेदन है कि उसके स्वाभिमान और भावनाओं को कोई ठेस न पहुंचे।”
उमाकांत जी ग्लानि से भर गए। उन्होंने नजरें चुराते हुए बात बनाई, “अरे गिरीश भाई साहब, ऐसी कोई बात नहीं है। शौर्य तो पूरी तैयारी कर चुका था, मगर अचानक सुबह उसका सिर बहुत तेज दर्द करने लगा, चक्कर भी आ रहे थे। हमने ही उसे जबरदस्ती आराम करने के लिए रोक दिया। आप चिंता मत कीजिए, दो-चार दिन में जैसे ही वह ठीक होता है, हम दोनों को एक साथ आपके यहाँ भेजेंगे। नंदिनी अब सिर्फ आपकी नहीं, हमारी भी बेटी है। हम उस पर कोई आंच नहीं आने देंगे।”
औपचारिक विदाई हुई और नंदिनी वापस ससुराल आ गई। पूरे रास्ते गाड़ी में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहा। सास-ससुर दोनों में से किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वे नंदिनी से नजरें मिला सकें या कोई बात शुरू कर सकें। घर पहुँचने पर पता चला कि शौर्य घर पर ही नहीं है, वह दोस्तों के साथ बाहर गया हुआ था। नंदिनी खामोशी से अपने कमरे में चली गई और उसने अपनी पीड़ा को अपने भीतर ही दबाए रखा।
उधर अपने शयनकक्ष में जाते ही उमाकांत जी का सब्र टूट गया। वह कल्याणी जी पर बरस पड़े, “मैंने तुमसे सैकड़ों बार कहा था कि उसकी शादी की जिद छोड़ दो! जो लड़का खुद अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझता, अपने करियर और जीवन को लेकर लापरवाह है, किसी बेकसूर की बेटी की जिंदगी दांव पर लगाकर तुम क्या हासिल करना चाहती थीं? तुम्हें तो बस अपनी पसंद की बहू लाने की धुन सवार थी। अब देखो, हम रोज उस मासूम लड़की के सामने अपनी ही नजरों में गिर रहे हैं!”
कल्याणी जी रोते हुए बोलीं, “मुझे क्या पता था बात इतनी बिगड़ जाएगी? समाज में हर कोई कहता है कि लड़का शादी के बाद सुधर जाता है, जिम्मेदार हो जाता है। मुझे लगा था नंदिनी जैसी सुलझी हुई लड़की आएगी तो शौर्य भी रास्ते पर आ जाएगा। मैं खुद अंदर ही अंदर घुट रही हूँ।”
देखते ही देखते शादी को दो महीने बीत गए। इस दौरान नंदिनी ने हर संभव कोशिश की कि वह शौर्य के स्वभाव को समझ सके, उसके साथ संवाद स्थापित कर सके। उसने सोचा था कि वह अपने प्यार और धैर्य से शौर्य के मन की उलझनों को दूर कर देगी और फिर दोनों साथ मिलकर मायके जाएंगे। इधर मायके से लगातार फोन आ रहे थे। पिता गिरीश जी हर दूसरे दिन पूछते कि दामाद जी कब आ रहे हैं। नंदिनी हर बार कोई न कोई नया बहाना बनाकर बात टाल देती, मगर अंदर ही अंदर वह एक भयंकर मानसिक द्वंद्व से गुजर रही थी।
एक दिन जब उमाकांत जी ने शौर्य को बैठाकर समझाने और डांटने की कोशिश की, तो शौर्य ने साफ शब्दों में कह दिया, “पापा, मैंने आपसे और माँ से पहले ही कह दिया था कि मैं अभी शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहता। मुझे अपनी आजादी प्यारी है। लेकिन माँ को तो घर में बहू लाने का शौक चढ़ा हुआ था। जब फैसले आपके थे, तो अब मुझसे उम्मीदें मत रखिए। मुझे बार-बार टोकना बंद कीजिए।”
यह बात कल्याणी जी के कानों में पड़ गई। उनका कलेजा छलनी हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि एक लड़के को सुधारने का झूठा सामाजिक भ्रम पालकर उन्होंने एक अनजान, भोली लड़की का जीवन अंधकार में धकेल दिया था।
अगली दोपहर, जब शौर्य घर पर नहीं था, कल्याणी जी भारी कदमों से नंदिनी के कमरे में गईं। नंदिनी खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। कल्याणी जी उसके पास पहुँचीं और बिना कुछ कहे नंदिनी के सामने हाथ जोड़कर बैठ गईं। उनकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली।
“बेटा नंदिनी, मुझे माफ कर दो… मैं तुम्हारी बहुत बड़ी गुनहगार हूँ। मेरी नासमझी और जिद की सजा आज तुम भुगत रही हो। मुझे लगा था कि शादी के बाद मेरा बेटा सुधर जाएगा, मगर मेरी उस गलत सोच ने तुम्हारी जिंदगी उलझा दी।”
नंदिनी एकदम चौंक गई। उसने फौरन झुककर अपनी सास के हाथ पकड़े और उन्हें उठाया, “मम्मी जी, यह आप क्या कर रही हैं? आप मेरी माँ के समान हैं, मुझसे बड़ी हैं। इस तरह हाथ जोड़कर मुझे पाप का भागी मत बनाइए। लेकिन… आज मैं आपसे एक सवाल जरूर पूछना चाहती हूँ।”
नंदिनी की आवाज भर्रा गई, “आखिर आपने और पापा जी ने मेरे सीधे-सादे माता-पिता के साथ ऐसा क्यों किया? उन्होंने अपने जीवन भर की जमा-पूंजी और अपने दिल का टुकड़ा यह सोचकर आपको सौंप दिया कि उनकी बेटी एक सुरक्षित और खुशहाल घर में जा रही है। अगर उन्हें पता चला कि यहाँ मेरे रिश्ते का सच क्या है, तो उनका दिल टूट जाएगा। वे जीते जी मर जाएंगे। मैं उन्हें कैसे संभालूँगी?”
कल्याणी जी सिसकते हुए बोलीं, “तुम बिल्कुल सच कह रही हो बेटा। समाज के इस ढकोसले ने मेरी मति मार दी थी कि शादी होते ही लड़का सुधर जाता है। मैं आज ही तुम्हारे पिता को फोन करती हूँ और सबके सामने अपनी गलती मानकर माफी मांगती हूँ। जो सजा वो मुझे देंगे, मुझे मंजूर होगी।”
“नहीं मम्मी जी!” नंदिनी ने दृढ़ता से अपनी सास के कंधे थामे, “आप ऐसा बिल्कुल नहीं करेंगी। इससे मेरे मायके वाले बिखर जाएंगे। जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब हमें इसे संभालना है। मैं अपने माता-पिता से बात करूंगी, उन्हें समझाऊंगी। आप खुद को दोषी मानकर घुटिए मत।”
दोनों सास-बहू एक-दूसरे को पकड़कर रो पड़ीं। उसी समय कमरे के बाहर से गुजर रहे शौर्य के कदम ठिठक गए। उसने दरवाजे की ओट से अपनी माँ के पश्चाताप भरे आंसू और नंदिनी का यह अगाध बड़प्पन देख लिया था।
शौर्य के सीने पर जैसे किसी ने भारी पत्थर रख दिया हो। जिस लड़की को वह पिछले दो महीनों से नजरअंदाज कर रहा था, जिसे उसने एक बार भी अपने जीवनसाथी का दर्जा नहीं दिया था, वही लड़की आज उसके परिवार की इज्जत और उसकी माँ के स्वाभिमान को बचाने के लिए अपने आंसुओं का घूंट पी रही थी। उसने सोचा, “जो लड़की अभी कुछ ही हफ्ते पहले इस घर में आई है, वह मेरे माता-पिता के सम्मान की इतनी चिंता कर रही है, और मैं? उनका अपना खून होकर, सिर्फ अपने अहं और जिद में सबको तिल-तिल कर मार रहा हूँ।” उस पल शौर्य के भीतर का स्वार्थ और बचपना टूटकर बिखर गया। पहली बार उसे अपनी जिम्मेदारियों का सच्चा अहसास हुआ।
अगली सुबह का सूरज एक नया उजाला लेकर आया। हमेशा देर से उठने वाला शौर्य आज समय पर तैयार होकर नीचे आया। उसके चेहरे पर रोज की खीझ या गुस्सा नहीं था, बल्कि एक शांत और गंभीर सौम्यता थी। वह सीधे डाइनिंग टेबल पर आया जहाँ सब नाश्ता कर रहे थे।
शौर्य ने नंदिनी की तरफ देखा और बहुत ही सहज स्वर में कहा, “नंदिनी, अगर तुम तैयार हो सको तो आज दोपहर में हम दोनों प्रयागराज चलें? बाबूजी और माँ जी से मिले काफी दिन हो गए हैं, उन्हें भी अच्छा लगेगा।”
डाइनिंग टेबल पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। उमाकांत जी, कल्याणी जी और नंदिनी ने एक साथ नजर उठाकर शौर्य को देखा। सबकी आँखों में हैरानी और अपार खुशी का सैलाब था।
“सच कह रहे हो शौर्य?” कल्याणी जी और नंदिनी के मुंह से एक साथ निकला।
शौर्य ने अपनी माँ का हाथ अपने हाथ में लिया और नंदिनी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। घर की चौखट पर आज सच्चे अर्थों में खुशियों का सवेरा हुआ था।
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मूल लेखिका : गुरविंदर टुटेजा