प्यारा ससुराल

सुनैना ने रुंधे हुए गले से लेकिन दिल की असीम गहराइयों से मुस्कुराते हुए कहा, “आनंद, आप मेरी चिंता बिल्कुल छोड़ दीजिए। मुझे अब समझ आया कि ईश्वर ने मुझे विदेश आने में देरी क्यों कराई। अगर मैं तुरंत आपके साथ चली जाती, तो मैं कभी जान ही नहीं पाती कि मुझे दुनिया का सबसे अनमोल, समझदार और प्यारा ससुराल मिला है। यहाँ मुझे सास में माँ, जेठानी में बड़ी बहन और जेठ जी में एक पिता तुल्य अभिभावक मिला है। मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ आनंद, बहुत ज्यादा खुशकिस्मत।”

  कमरे के बड़े से शीशे के सामने खड़ी सुनैना अपनी नई लाल चूड़ियों को कलाई पर ऊपर-नीचे खिसकाते हुए गहरी सांस ले रही थी। विवाह को अभी मुश्किल से तीन महीने ही बीते थे। उसका विवाह आनंद के साथ पूरे रीति-रिवाजों और खुशियों के माहौल में संपन्न हुआ था। आनंद एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट था और उसकी पोस्टिंग हैदराबाद में थी। शादी के तुरंत बाद दोनों वहीं चले गए थे और अपने छोटे से आशियाने को बड़े चाव से सजाने में जुटे थे।

सब कुछ किसी खूबसूरत सपने जैसा चल रहा था, तभी आनंद की कंपनी ने उसे छह महीने के एक विशेष प्रोजेक्ट के लिए जर्मनी भेजने का निर्णय लिया। आनंद चाहता था कि सुनैना भी उसके साथ चले, लेकिन विवाह के बाद सुनैना के कागजातों में उपनाम बदलने और पासपोर्ट नवीनीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी। सरकारी दफ्तर से नया पासपोर्ट आने में कम से कम दो-तीन महीने का समय लगना तय था। ऐसे में आनंद को अकेले ही निकलना पड़ा। यह तय हुआ कि जब तक कागजात तैयार होते हैं, सुनैना कुछ हफ्ते अपने मायके जबलपुर में बिताएगी और फिर बाकी समय भोपाल में अपने ससुराल में रहेगी।

मायके में बीस दिन कब पंख लगाकर उड़ गए, पता ही नहीं चला। माँ का दुलार, पिता का स्नेह और बचपन का वही बेफिक्र माहौल सुनैना के दिल को सुकून दे रहा था। लेकिन जब ससुराल जाने का दिन आया, तो एक अनजाना सा डर और झिझक उसके मन में बैठ गई। ससुराल उसके लिए बिल्कुल नई जगह थी। शादी के समय घर में इतनी चहल-पहल और रिश्तेदार थे कि वह सास-ससुर और परिवार के बाकी सदस्यों के स्वभाव को गहराई से समझ ही नहीं पाई थी।

ससुराल का परिवार काफी भरा-पूरा और मर्यादित था। घर में सास यशोदा जी थीं, जो पुराने उसूलों की पक्की लेकिन दिल की बहुत साफ़ थीं। ससुर जी का देहांत कुछ वर्ष पहले हो चुका था। आनंद के बड़े भाई यानी सुनैना के जेठ प्रभात जी शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर थे—गंभीर, शांत, कम बोलने वाले लेकिन बेहद सुलझे हुए इंसान। उनकी पत्नी यानी सुनैना की जेठानी शालिनी एक कुशल गृहिणी थीं, जो पूरे घर की जिम्मेदारी हंसते-मुस्कुराते संभालती थीं। उनके दो छोटे बच्चे थे, सात साल का आरव और पाँच साल की नन्हीं परी।

जब सुनैना भोपाल के उस बड़े से पैतृक मकान की दहलीज पर पहुंची, तो उसकी हथेलियां पसीने से भीग रही थीं। उसे लग रहा था कि पता नहीं लोग उसे कैसे परखेंगे, उसकी किसी आदत से कोई नाराज न हो जाए। लेकिन घर में कदम रखते ही शालिनी ने जिस गर्मजोशी से उसे गले लगाया और आरती उतारकर स्वागत किया, उससे सुनैना के दिल का आधा बोझ तो वहीं उतर गया। सासू माँ यशोदा जी ने भी सिर पर हाथ रखकर खूब आशीष दिया। प्रभात जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “स्वागत है सुनैना, यह तुम्हारा ही घर है। सफर में कोई परेशानी तो नहीं हुई ना?” सुनैना ने बस धीरे से सिर हिलाकर ‘जी भैया’ कह दिया।

शुरुआती दो दिन बहुत सामान्य और अच्छे बीते। सुनैना घर के तौर-तरीके समझने की कोशिश कर रही थी। वह सुबह जल्दी उठ जाती, शालिनी के साथ रसोई में हाथ बंटाने पहुंच जाती। शालिनी स्वभाव से बहुत मेहनती और परंपराओं को पूरी निष्ठा से मानने वाली महिला थी। वह सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक बिना थके घर के काम में जुटी रहती थी। सुनैना को लगता कि उसे भी अपनी जेठानी की तरह ही हर काम में अव्वल दिखना चाहिए, ताकि किसी को यह न लगे कि छोटे बेटे की बहू में सलीका नहीं है।

तीसरे दिन घर में एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान और लगातार दो दिनों का व्रत आ पड़ा। शालिनी ने सुबह चाय बनाते हुए बताया, “सुनैना, आज और कल हमारे कुल की परंपरा के अनुसार बड़ा उपवास रहता है। इसमें शाम को पूजा के बाद ही फलाहार लिया जाता है।”

सुनैना ने तुरंत कहा, “दीदी, मैं भी यह व्रत रखूंगी। मायके में भी माँ यह उपवास करती थीं और मैं उनके साथ हमेशा रहा करती थी।”

शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे वाह, यह तो बहुत अच्छी बात है। जब दोनों बहुएं मिलकर पूजा करेंगी तो माँ जी को भी बहुत खुशी होगी।”

व्रत का पहला दिन शुरू हुआ। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर दोनों बहुओं ने स्नान किया, नए वस्त्र पहने और पूरे घर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र किया। इसके बाद शालिनी और सुनैना पास के प्राचीन शिव मंदिर में पूजा की थाली लेकर गईं। मंदिर में काफी भीड़ थी, कतार में खड़े-खड़े ही सुबह के नौ बज गए। जब वे लौटकर आईं, तो घर में बच्चों के स्कूल और प्रभात जी के कॉलेज जाने की तैयारी का समय हो गया था।

सुनैना मायके में जब भी व्रत रखती थी, तो उसकी माँ सुबह की पूजा खत्म होते ही एक कटोरी में भीगे हुए बादाम, मखाने और ताजे कटे सेब उसके हाथ में थमा देती थीं। माँ हमेशा कहती थी, “भगवान भूखे रहने से नहीं, मन के सच्चे भाव से प्रसन्न होते हैं। शरीर को कष्ट देकर पूजा नहीं की जाती।” लेकिन यहाँ ससुराल का माहौल अलग था। शालिनी सुबह से एक घूंट पानी तक पिए बिना घर की साफ-सफाई, बच्चों का नाश्ता और दोपहर के फलाहार की तैयारियों में जुट गई थी।

सुनैना को भी संकोच होने लगा। वह कैसे कह देती कि उसे भूख लग रही है? वह चुपचाप शालिनी के पीछे-पीछे रसोई में खड़ी रही। कभी आलू उबालती, कभी साबूदाना धोती, तो कभी सेंधा नमक और हरी मिर्च काटकर रखती। दोपहर के बारह बज गए। सुनैना के सिर में हल्का-हल्का दर्द उठने लगा। उसका शरीर उपवास में भूखा रहने का आदी तो था, लेकिन इस तरह लगातार खड़े रहकर काम करने की आदत उसे नहीं थी।

दोपहर करीब एक बजे यशोदा जी रसोई में आईं। उन्होंने देखा कि दोनों बहुएं काम में लगी हैं। यशोदा जी ने बड़े प्यार से सुनैना से कहा, “अरे सुनैना बहू, तूने तो सुबह से कुछ नहीं लिया। जा, टोकरी में से केले और चीकू रखे हैं, थोड़े से काट कर खा ले। नया शरीर है, कमजोरी आ जाएगी।”

सुनैना का मन तो किया कि वह फल खा ले, लेकिन उसने देखा कि जेठानी शालिनी अभी भी चूल्हे के सामने खड़ी सिंघाड़े के आटे की पूरियां तल रही थी और उसने अपने लिए पानी का एक गिलास तक नहीं छुआ था। सुनैना को लगा कि अगर जेठानी भूखी रहकर काम कर रही है और वह बैठकर खाने लगेगी, तो यह कितनी अशोभनीय बात होगी। सासू माँ भले ही प्यार से कह रही हों, लेकिन मन में सोचेंगी कि बड़ी बहू कितनी त्यागी है और छोटी बहू खाने के लिए उतावली हो रही है। इसी संकोच और झिझक में सुनैना ने मुस्कुराते हुए सिर झुकाकर कह दिया, “नहीं माँ जी, अभी भूख नहीं है। दीदी का काम पूरा हो जाए, फिर हम दोनों साथ में ही फलाहार कर लेंगे।”

यशोदा जी कमरे में चली गईं। दोपहर के डेढ़ बजते-बजते फलाहार बनकर तैयार हुआ। शालिनी ने सबसे पहले थालियां सजाईं। प्रभात जी उस दिन कॉलेज से जल्दी आ गए थे। शालिनी ने पहले अपने पति, सासू माँ और बच्चों को डाइनिंग टेबल पर फलाहार परोसा। सबने आराम से बैठकर खाया। सुनैना एक कोने में खड़ी पंखा झल रही थी और पानी के गिलास भर रही थी। उसकी आँखें थकान से भारी हो रही थीं और पेट में चूहे कूद रहे थे। जब सब खा चुके, तब करीब ढाई बजे शालिनी और सुनैना रसोई के चबूतरे पर बैठकर ठंडी हो चुकी पूरियां और साबूदाने की खिचड़ी खाने बैठीं। सुनैना ने जैसे-तैसे खाना निगला, लेकिन उसके मन में मायके की याद इतनी गहरी हो गई कि आँखें छलकने को आतुर हो उठीं। वह सोचने लगी कि काश वह इस समय अपने घर पर होती, तो माँ ने उसे इस तरह भूखा रहने ही नहीं दिया होता।

जैसे-तैसे वह दिन बीता। रात को आनंद से फोन पर बात करते हुए भी उसने अपनी यह तकलीफ जाहिर नहीं होने दी। वह नहीं चाहती थी कि परदेस में बैठा उसका पति किसी उलझन या चिंता में पड़े।

अगली सुबह जब नींद खुली, तो सुनैना का शरीर दर्द से टूट रहा था। आज व्रत का दूसरा दिन था और नियम और भी कड़े थे। आज केवल एक बार शाम को ही फलाहार करना था। सुनैना भारी मन से उठी, नहाया और फिर मंदिर जाने की तैयारी करने लगी। मंदिर से लौटते-लौटते धूप तेज हो चुकी थी और उसके गले में सूखापन बढ़ गया था।

घर आकर सुनैना पूजा का सामान समेटने लगी। शालिनी बच्चों को नहलाने के लिए ऊपर चली गई थी। हॉल में केवल प्रभात जी बैठे थे, जो हाथ में अखबार लिए कुछ पढ़ रहे थे। सुनैना चुपचाप सिर पर पल्लू ठीक करते हुए रसोई की ओर बढ़ने लगी ताकि दोपहर की तैयारी शुरू कर सके। उसकी चाल में कमजोरी और चेहरे पर फीकापन साफ दिखाई दे रहा था।

“सुनैना…”

एक गंभीर लेकिन बेहद आत्मीय आवाज ने उसके कदमों को रोक दिया। सुनैना ने चौंककर पीछे मुड़कर देखा। प्रभात जी अखबार मेज पर रखकर खड़े हो गए थे।

सुनैना ने संकोच से नजरें नीची करते हुए कहा, “जी भैया, कुछ चाहिए आपको?”

प्रभात जी रसोई की चौखट के पास आए। उन्होंने सुनैना के सूखे होंठों और थकी हुई आँखों को बहुत ध्यान से देखा। उनके चेहरे पर एक बड़े भाई की गहरी चिंता और समझदारी के भाव थे।

उन्होंने बहुत धीमे और सहज स्वर में कहा, “सुनैना, मैं कल से देख रहा हूँ कि तुम बहुत संकोच में जी रही हो। तुम शायद यह भूल रही हो कि यह घर सिर्फ हमारा नहीं, तुम्हारा भी उतना ही है जितना हम सबका। विवाह के बाद एक लड़की अपना सब कुछ, अपने बचपन की आदतें, अपनी माँ की गोद छोड़कर एक अनजान चौखट पर आती है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह यहाँ आकर अपनी तकलीफों को दबाना और खुद को मिटाना सीखे।”

सुनैना की आँखें अचानक भर आईं। वह स्तब्ध होकर अपने जेठ जी को सुनने लगी।

प्रभात जी ने आगे कहा, “शालिनी इस घर में दस सालों से है। उसकी शारीरिक क्षमता और व्रत करने की आदत अलग है। माँ पुराने विचारों की हैं, लेकिन उनका दिल बहुत साफ है। पर तुम इन सबके बीच खुद को जबरदस्ती किसी सांचे में ढालने की कोशिश मत करो। भक्ति मन की शांति के लिए होती है, शरीर को सजा देने के लिए नहीं। व्रत रखना या न रखना तुम्हारी अपनी निजी आस्था है, इस पर परिवार का कोई दबाव नहीं हो सकता। और अगर व्रत रखा भी है, तो खुद को भूखा मारना कोई समझदारी नहीं है।”

प्रभात जी ने खुद फ्रिज खोला। उन्होंने उसमें से दूध की बोतल, कुछ ताजे आम और मेवे निकाले। उन्होंने मिक्सी के जार में दूध और फल डाले और अपने हाथों से एक बड़ा गिलास मैंगो शेक तैयार किया। उन्होंने वह भरा हुआ गिलास सुनैना के हाथों में थमा दिया।

सुनैना के हाथ कांप रहे थे। उसने कहा, “भैया… पर अभी तो पूजा की बाकी रस्में बची हैं… और दीदी ने भी…”

“दीदी ने क्या किया या माँ क्या सोचेंगी, इसकी चिंता तुम बिल्कुल मत करो,” प्रभात जी ने एक पिता जैसी दृढ़ता और वात्सल्य से कहा। “घर के नियम इंसानों की सहूलियत के लिए होते हैं, इंसान नियमों की बलि चढ़ने के लिए नहीं बनते। तुम पहले चुपचाप यह शेक पूरा पियो। इस घर के फ्रिज, इस रसोई और इस पूरे आंगन पर तुम्हारा पूरा हक है। तुम्हें जब भूख लगे, तुम बेझिझक जो चाहो निकाल कर खा सकती हो। अगर कभी कोई संकोच हो, तो सीधे मुझसे या शालिनी से कह सकती हो। तुम इस घर की बहू बाद में हो, पहले आनंद की अर्धांगिनी और मेरी छोटी बहन जैसी हो। एक बात हमेशा याद रखना, अगर तुम खुश और स्वस्थ रहोगी, तभी यह घर खुशहाल रहेगा।”

सुनैना की आँखों से आंसू की दो बूंदें छलक कर उसके गालों पर आ गिरीं। उसने कांपते हाथों से वह गिलास अपने होठों से लगाया। उस मीठे शेक की हर घूंट में उसे केवल दूध और फल का स्वाद नहीं आ रहा था, बल्कि अपनेपन, सम्मान और सच्चे परिवार की मिठास घुलती हुई महसूस हो रही थी। जो बोझ उसके सीने पर पिछले तीन दिनों से पत्थर की तरह रखा था, वह एक ही पल में पिघल कर बह गया था।

उसी समय शालिनी सीढ़ियों से नीचे उतरी और रसोई की तरफ आई। उसने जब सुनैना के हाथ में गिलास और प्रभात जी को वहां खड़े देखा, तो वह सब समझ गई। शालिनी आगे बढ़ी और उसने बड़े प्यार से सुनैना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “देखा सुनैना, मैंने कहा था ना कि हमारे घर के बड़े बहुत समझदार हैं। मुझे खुद कल रात से लग रहा था कि तुम बहुत कमजोर महसूस कर रही हो, लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा था कि तुम्हें कैसे कहूं ताकि तुम्हें बुरा न लगे। भैया ने बिल्कुल सही कहा। चलो, अब जल्दी से इसे खत्म करो, और आज दोपहर का कोई काम तुम नहीं करोगी। तुम सीधे जाकर आराम करोगी।”

यशोदा जी भी अपने कमरे से बाहर आ चुकी थीं। उन्होंने जब यह सारा दृश्य देखा, तो उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान खिल गई। उन्होंने कहा, “प्रभात ने मेरे मन की बात कह दी। बहुएं तो घर की लक्ष्मी होती हैं, उन्हें भूखा रखकर कौन सा पुण्य मिलने वाला है। सुनैना बेटा, अब कोई संकोच मत पालना।”

उस दोपहर जब सुनैना अपने कमरे में पंखे की ठंडी हवा में लेटी, तो उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति और मुस्कान थी। उसने अपने फोन पर आनंद का नंबर मिलाया।

आनंद ने फोन उठाते ही पूछा, “कैसी हो सुनैना? सब ठीक तो है ना? माँ या भैया से कोई परेशानी तो नहीं? तुम परदेस में नहीं आ पाईं, मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही थी।”

सुनैना ने रुंधे हुए गले से लेकिन दिल की असीम गहराइयों से मुस्कुराते हुए कहा, “आनंद, आप मेरी चिंता बिल्कुल छोड़ दीजिए। मुझे अब समझ आया कि ईश्वर ने मुझे विदेश आने में देरी क्यों कराई। अगर मैं तुरंत आपके साथ चली जाती, तो मैं कभी जान ही नहीं पाती कि मुझे दुनिया का सबसे अनमोल, समझदार और प्यारा ससुराल मिला है। यहाँ मुझे सास में माँ, जेठानी में बड़ी बहन और जेठ जी में एक पिता तुल्य अभिभावक मिला है। मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ आनंद, बहुत ज्यादा खुशकिस्मत।”

उस दिन सुनैना ने महसूस किया कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच और आपसी समझ से बड़े बनते हैं। जब परिवार का हर सदस्य दूसरे के दर्द को बिना कहे समझ ले, तो पराए भी अपने हो जाते हैं और वह मकान सचमुच एक स्वर्ग बन जाता है।

दोस्तों, जब एक नई बहू अपने मायके की चौखट लांघकर ससुराल आती है, तो वह केवल अपना घर नहीं बदलती, बल्कि उसकी पूरी दुनिया बदल जाती है। ऐसे नाज़ुक समय में अगर ससुराल के लोग, विशेषकर घर के पुरुष और बड़े, प्रभात जी की तरह समझदारी और संवेदनशीलता दिखाएं, तो किसी भी बेटी को कभी अपने मायके के छूटने का मलाल नहीं होगा। परंपराएं और रीतियां अपनी जगह हैं, लेकिन इंसानियत और अपनों की परवाह उनसे कहीं ऊपर है।

क्या आपको भी लगता है कि हर ससुराल में ऐसी ही खुली और मानवीय सोच होनी चाहिए जहाँ बहुओं को संकोच के बंधनों से मुक्त कर सच्चा मान-सम्मान मिले? इस संवेदनशील विषय पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।

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