आंसुओं का मोल

“नहीं, हमारी परवरिश में कोई खोट नहीं थी,” जानकी जी ने समझाते हुए कहा, “खोट उस अंधी दौड़ में है, जहां इंसान रिश्तों से बड़ा पैसों को समझने लगता है। लेकिन अब हम रोएंगे नहीं। हमने अपनी पूरी जिंदगी चिन्मय के भविष्य को बनाने में लगा दी, अपनी सारी खुशियां उस पर न्योछावर कर दीं। पर अब हम अपने लिए जिएंगे। हमारे पास आपकी पेंशन है, हमारा यह छोटा सा घर है, और सबसे बढ़कर हमारे पास यह सच्चा, प्यार करने वाला समाज और पड़ोस है।

  साठ पार की उम्र में दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे का सबसे बड़ा संबल थे। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उनका इकलौता बेटा चिन्मय था, जिसे उमाशंकर जी ने अपनी पूरी जमा-पूंजी, पेंशन का एक-एक पैसा और यहां तक कि पुश्तैनी जमीन का एक हिस्सा बेचकर अमेरिका के कैलिफोर्निया में सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा के लिए भेजा था।

चिन्मय होनहार था, इसमें कोई दोराय नहीं थी। पढ़ाई पूरी होते ही उसे सिलिकॉन वैली की एक जानी-मानी कंपनी में लाखों के पैकेज पर नौकरी मिल गई। शादी भी उसने अपनी ही पसंद से वहीं काम करने वाली एक लड़की से कर ली थी। शुरुआत में तो वह हर हफ्ते वीडियो कॉल करता, त्योहारों पर बातें होतीं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसकी जिंदगी की व्यस्तताएं बढ़ती गईं। धीरे-धीरे वे बातें पंद्रह दिनों में और फिर महीनों के फासले में बदल गईं। पिछले छह सालों से वह एक बार भी भारत नहीं लौटा था। हर बार मां-बाप के पूछने पर उसके पास प्रोजेक्ट की डेडलाइन, ग्रीन कार्ड का झंझट या फ्लाइट टिकटों की व्यस्तता जैसे दर्जनों बहाने तैयार रहते।

उमाशंकर जी और जानकी देवी मन मारकर रह जाते। वे अपने खाली हो चुके घोंसले में चिन्मय की बचपन की तस्वीरों, उसकी जीती हुई ट्रॉफियों और उसकी पुरानी किताबों को छू-छूकर अपनी ममता की प्यास बुझाते थे। जानकी जी जब भी पड़ोस में किसी बच्चे को अपने माता-पिता का हाथ पकड़कर चलते देखतीं, तो उनका दिल भर आता, लेकिन वे अपने पति के सामने कभी रोती नहीं थीं ताकि उनका दिल कमजोर न पड़े।

उस दिन भी कार्तिक का महीना था और हल्की-हल्की ठंडक घुलने लगी थी। दोपहर के करीब दो बज रहे थे। जानकी देवी रसोई में उमाशंकर जी के लिए दाल-चावल परोसने की तैयारी कर रही थीं। उमाशंकर जी अपने अध्ययन कक्ष में बैठकर गीता का पाठ कर रहे थे। अचानक ही अध्ययन कक्ष से किसी भारी चीज के गिरने की तेज आवाज आई—धड़ाम! साथ ही पीतल की घंटी और पानी के लोटे के फर्श पर लुढ़कने की तीखी खड़खड़ाहट गूंज उठी।

जानकी जी के हाथ से करछुल छूट गई। उनके भीतर कोई अनजाना सा भय कौंधा। वे कांपते पैरों से दौड़ती हुई अध्ययन कक्ष की ओर भागीं। जैसे ही उन्होंने कमरे की दहलीज पर कदम रखा, उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई।

उमाशंकर जी कालीन पर औंधे मुंह गिरे पड़े थे। उनका शरीर पूरी तरह शिथिल था, चेहरे पर नीलापन उतर आया था और वे अपनी बाईं छाती को दोनों हाथों से भींचकर सांस लेने के लिए बुरी तरह तड़प रहे थे। उनके होंठ हिले, लेकिन आवाज नहीं निकल सकी।

“अरे भगवान! यह क्या हो गया! सुनिए… आंखें खोलिए!” जानकी जी चीख पड़ीं। उन्होंने उमाशंकर जी का सिर अपनी गोद में उठाया। उनके हाथ-पैर ठंडे पड़ चुके थे। जानकी जी का दिल इतनी जोर से धड़क रहा था मानो सीना फाड़कर बाहर आ जाएगा। उस वक्त घर में कोई नहीं था, और हाथ-पांव फूल जाने की उस घबराहट में उन्हें समझ नहीं आया कि वे क्या करें।

वे बदहवास हालत में बाहर गली की तरफ दौड़ीं और दरवाजे पर खड़े होकर पागलों की तरह पुकारने लगीं, “महेश भैया! अरे कोई है? बचाओ… मेरे घर में कोई आओ… पंडित जी को कुछ हो गया है!”

चीख सुनकर सामने रहने वाले शिक्षक महेश बाबू और पास की परचून की दुकान चलाने वाले युवा राजेश तुरंत दौड़कर आए। कमरे की हालत देखते ही महेश बाबू समझ गए कि मामला गंभीर है। उन्होंने बिना एक पल गंवाए कहा, “भाभी जी, समय मत गंवाइए। यह दिल का दौरा है। एम्बुलेंस आने का इंतजार करेंगे तो देर हो जाएगी। राजेश, जल्दी अपनी गाड़ी निकालो, हम इन्हें तुरंत जिला अस्पताल लेकर चलते हैं।”

राजेश और महेश बाबू ने उमाशंकर जी को सहारा देकर उठाया और गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाया। जानकी जी अपने गीले आंचल और कांपते हाथों के साथ उनके सिरहाने बैठ गईं। वे लगातार उमाशंकर जी की छाती सहला रही थीं और महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर रही थीं, “हे महाकाल, मेरे सुहाग की रक्षा करना… मैं इनके बिना इस दुनिया में जी नहीं पाऊंगी।”

अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचते ही डॉक्टरों की एक टीम उमाशंकर जी की जांच में जुट गई। ईसीजी और अन्य परीक्षणों के बाद मुख्य हृदय रोग विशेषज्ञ ने बाहर आकर गंभीर चेहरे से कहा, “माता जी, इन्हें बहुत बड़ा मैसिव हार्ट अटैक आया है। इनके दिल की दो मुख्य नसें शत-प्रतिशत ब्लॉक हो चुकी हैं। हालत बहुत नाजुक है। हमें तुरंत आईसीयू में शिफ्ट करके इमरजेंसी एंजियोप्लास्टी या फिर जरूरत पड़ने पर बाईपास सर्जरी की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। आपको अभी के अभी सहमति पत्र पर दस्तखत करने होंगे और तुरंत तैयारी करनी होगी।”

यह सुनते ही जानकी जी दीवारों का सहारा लेकर जमीन पर बैठ गईं। आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। अस्पताल के गलियारे में बजती मशीनों की आवाजें उनके कानों में मौत की दस्तक जैसी लग रही थीं। वे जीवन के ऐसे दोराहे पर खड़ी थीं, जहां हर तरफ अंधेरा था। महेश बाबू ने आगे बढ़कर उन्हें संभाला और पानी का गिलास थमाते हुए कहा, “भाभी जी, धीरज रखिए। डॉक्टर साहब अपना काम कर रहे हैं। आप चिन्मय को फोन कीजिए। बेटा बड़ा है, बाहर रहता है, ऐसे वक्त में उसका यहां होना जरूरी है। वही सब संभालेगा।”

‘चिन्मय!’ यह नाम सुनते ही जानकी जी की सुन्न पड़ चुकी उंगलियों में थोड़ी हरकत हुई। हां, उनका बेटा! उनका इकलौता चिन्मय! वह जिसे उन्होंने अपनी छाती से लगाकर पाला था, जिसके माथे पर जरा सा बुखार आ जाने पर वे रात-रात भर जागती थीं। आज उसके पिता जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। वह जरूर सब छोड़कर भागा चला आएगा।

जानकी जी ने कांपते हाथों से मोबाइल निकाला और चिन्मय का नंबर मिलाया। अमेरिका में उस वक्त देर रात थी। पहली दो बार घंटी बजती रही, फोन नहीं उठा। तीसरी बार में फोन उठा, लेकिन उस पार से कोई चिंता या स्नेह नहीं, बल्कि नींद में डूबी एक झुंझलाई हुई आवाज आई, “हेलो मां! क्या है? तुम्हें पता भी है यहां रात के दो बज रहे हैं? इतनी रात को फोन क्यों कर रही हो? कोई जरूरी बात है क्या?”

जानकी जी की हिचकियां बंध गईं। वे रोते हुए बोलीं, “बेटा चिन्मय… तेरे बाबूजी… उन्हें बहुत बड़ा दिल का दौरा पड़ा है। हम अस्पताल के आईसीयू के बाहर खड़े हैं। डॉक्टर कह रहे हैं हालत बहुत नाजुक है… कभी भी कुछ भी हो सकता है। तू पहली फ्लाइट पकड़कर आजा बेटा… तेरे बाबूजी बार-बार बेहोशी में तेरा ही नाम ले रहे हैं। आजा मेरे बच्चे, मुझे बहुत डर लग रहा है…”

फोन के उस पार कुछ पलों का सन्नाटा रहा। जानकी जी को लगा कि शायद बेटा सदमे में आ गया होगा और अब कहेगा कि मां, मैं अभी एयरपोर्ट के लिए निकल रहा हूं। लेकिन जो जवाब उस पार से आया, उसने जानकी जी के दिल पर बिजली गिरा दी।

चिन्मय की आवाज में कोई बेचैनी नहीं थी, बल्कि एक सपाट और व्यावहारिक ठंडापन था। वह बोला, “ओह… यह तो बहुत बुरा हुआ मां। लेकिन तुम समझो, मैं इस वक्त कैसे आ सकता हूं? मेरा यहां एच-1बी वीजा रिन्यूअल की प्रक्रिया में फंसा हुआ है। अगर मैंने अभी देश छोड़ा, तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। अगले हफ्ते मेरी एक बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है। मैं इतनी जल्दी छुट्टी लेकर भारत नहीं आ सकता।”

जानकी जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने रोते हुए गिड़गिड़ाकर कहा, “बेटा, तू नौकरी की बात कर रहा है? यहां तेरे पिता की सांसें उखड़ रही हैं! पैसे, नौकरी, वीजा… ये सब बाद में भी हो जाएंगे। अगर उन्हें कुछ हो गया तो तू जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाएगा। आजा बेटा, मुझे इस बुढ़ापे में अकेला मत छोड़।”

चिन्मय ने चिढ़ते हुए गहरी सांस छोड़ी और बोला, “मां, तुम हमेशा इमोशनल ड्रामा शुरू कर देती हो। मेरे वहां आने से क्या डॉक्टर का इलाज बदल जाएगा? इलाज तो डॉक्टर ही करेंगे ना! तुम बताओ कितने पैसों की जरूरत है? पांच लाख? दस लाख? बीस लाख? मैं अभी आधे घंटे के अंदर तुम्हारे खाते में इंटरनेशनल ट्रांसफर कर देता हूं। किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल के वीआईपी वार्ड में शिफ्ट करवा लो। पैसों की कोई कमी नहीं होगी, तुम बस इलाज में कोई कसर मत छोड़ना। बाकी मैं फोन पर अपडेट लेता रहूंगा। अभी मुझे सोने दो, सुबह मुझे जल्दी ऑफिस जाना है।”

और इसके साथ ही फोन कट गया। ‘टूट-टूट-टूट’ की आवाज जानकी जी के कान में गूंजती रही।

जानकी जी का हाथ नीचे गिर गया। फोन उनकी हथेली से फिसलकर फर्श पर जा गिरा। उनका पूरा अस्तित्व जैसे अंदर से चटक गया था। उस पल अस्पताल की सफेद दीवारें, डॉक्टरों की भागदौड़, दवाइयों की तीखी गंध—सब कुछ एक अजीब से शून्य में बदल गया।

डॉलर… उसने पैसों की बात की थी! जिस बेटे को पालने के लिए उमाशंकर जी ने फटी बनियान में कई सर्दियां निकाल दी थीं, जिस बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने कभी अपनी बीमारी में दवाई तक नहीं खरीदी थी ताकि फीस के पैसे कम न पड़ें, वही बेटा आज अपने मरते हुए पिता के लिए केवल डॉलर फेंक रहा था!

जानकी जी ने मन ही मन सोचा—”क्या इसीलिए हमने औलाद मांगी थी? क्या ममता की कीमत सिर्फ बैंक का बैलेंस होती है? जब पिता की ठंडी पड़ती हथेलियों को बेटे के स्पर्श की जरूरत हो, जब मां के कांपते कंधों को बेटे के सहारे की तलाश हो, तब वह कागज के टुकड़ों से हमारी सांसें खरीदना चाहता है? क्या वह मेरा बेटा है, या केवल मेरे सपनों की चिता पर खड़ा एक अजनबी?”

उस क्षण जानकी जी की आंखों के आंसू सूख गए। उनके भीतर एक ऐसी मां ने जन्म लिया जो अब लाचार नहीं थी। उन्होंने अपने आंचल से चेहरा पोंछा, अपनी रीढ़ सीधी की और खड़ी हो गईं। उन्होंने समझ लिया था कि जिस बेटे को वे अपना अभिमान समझती थीं, वह अब उनका नहीं रहा। अब इस लड़ाई को उन्हें खुद ही लड़ना होगा।

वे सीधे आईसीयू के काउंटर पर पहुंचीं। उन्होंने डॉक्टर से कहा, “डॉक्टर साहब, मेरे पति का इलाज तुरंत शुरू कीजिए। यह फॉर्म दीजिए, मैं दस्तखत करती हूं।”

अस्पताल के रिसेप्शनिस्ट ने कहा, “माता जी, ऑपरेशन के लिए तुरंत दो लाख रुपये जमा करने होंगे।”

जानकी जी ने बिना एक पल गंवाए अपने कानों के सोने के कुंडल और गले की मंगलसूत्र की चेन उतारी, जो उमाशंकर जी ने शादी के समय उन्हें पहनाई थी। उन्होंने वे गहने काउंटर पर रखते हुए कहा, “बेटा, मेरे पास अभी खाते में पेंशन के पचास हजार हैं, बाकी यह मेरे गहने रखो। यह शुद्ध सोने के हैं। मेरे पति की जान बचनी चाहिए, मैं अपने सुहाग के लिए अपनी जान भी बेच दूंगी, लेकिन किसी के आगे भीख नहीं मांगूंगी।”

यह देखकर वहां खड़े महेश बाबू और राजेश की आंखें भर आईं। महेश बाबू ने आगे बढ़कर जानकी जी का हाथ रोका और गहने वापस उनकी हथेली में रखते हुए कहा, “भाभी जी, यह क्या कर रही हैं आप? जब तक आपका यह भाई जिंदा है, आपको गहने बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मोहल्ले के चार लोग और आ चुके हैं। हम सबने मिलकर अस्पताल में पैसे जमा करवा दिए हैं। उमाशंकर जी सिर्फ आपके पति नहीं हैं, हमारे मोहल्ले के आदर्श हैं। आप बस भगवान से प्रार्थना कीजिए।”

उमाशंकर जी का ऑपरेशन शुरू हुआ। चार घंटे तक चली लंबी और जटिल सर्जरी के दौरान जानकी जी आईसीयू के बाहर हाथ जोड़कर भगवान शिव की प्रतिमा के सामने बैठी रहीं। न उन्होंने पानी की एक बूंद पी, न अपनी पलकें झपकाईं। आखिरकार, रात के करीब ग्यारह बजे डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर थकान थी, लेकिन साथ ही एक राहत भरी मुस्कान भी थी।

“माता जी, बधाई हो। ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा। ब्लॉकेज हटा दिए गए हैं और स्टेंट डाल दिया गया है। खतरा टल चुका है। आपके पति होश में हैं और खतरे से बाहर हैं।”

यह सुनते ही जानकी जी के मुंह से केवल एक शब्द निकला—”हे महाकाल!” और वे फर्श पर झुककर ईश्वर को धन्यवाद देने लगीं।

अगले दिन सुबह जब उमाशंकर जी को सामान्य वार्ड में शिफ्ट किया गया, तो उनकी आंखें खुलीं। सामने जानकी जी बैठी थीं, जिनकी आंखें रात भर जागने के कारण लाल थीं, लेकिन चेहरे पर अपने पति को वापस पा लेने का असीम संतोष था। पास ही महेश बाबू और मोहल्ले के अन्य लोग खड़े थे।

उमाशंकर जी ने लड़खड़ाती आवाज में सबसे पहले पूछा, “चिन्मय… चिन्मय आया क्या?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। महेश बाबू ने नजरें झुका लीं।

जानकी जी ने धीरे से अपने पति का हाथ अपने दोनों हाथों में थामा। उन्होंने उमाशंकर जी के माथे को सहलाते हुए बेहद शांत और गंभीर आवाज में कहा, “सुनिए… चिन्मय अब नहीं आएगा। और सच कहूं, तो अब हमें उसकी जरूरत भी नहीं है।”

उमाशंकर जी ने चौंक कर अपनी पत्नी की ओर देखा। उनकी आंखों में एक अनकहा सवाल था।

जानकी जी ने भरे गले से, लेकिन पूरी दृढ़ता के साथ कहा, “कल रात जब आपकी सांसें उखड़ रही थीं, तो आपके बेटे ने कहा कि वह अपनी नौकरी और अपनी ऐश-ओ-आराम छोड़कर नहीं आ सकता, पर हां, वह पैसे भेज देगा। उसने समझ लिया कि रिश्ते सिर्फ रुपयों से खरीदे जाते हैं। उसने अपनी जिम्मेदारी की कीमत लगा दी।”

उमाशंकर जी की आंखों के कोरों से दो बूंद आंसू ढुलक कर तकिए में समा गए। उनका दिल अपने ही बेटे के इस व्यवहार से एक बार फिर टूट गया।

जानकी जी ने उनके आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “दुखी मत होइए। कल रात जब हमारा अपना खून हमसे मुंह मोड़ चुका था, तब यह महेश भैया, यह राजेश और हमारे मोहल्ले के वे लोग, जिनसे हमारा कोई खून का रिश्ता नहीं था, पूरी रात अस्पताल के फर्श पर जागते रहे। इन्होंने अपनी जेब से पैसे लगाए, दवाइयां दौड़-दौड़ कर लाए और आपके लिए खून का इंतजाम किया। कल रात भगवान ने मेरी आंखें खोल दीं। परिवार वह नहीं होता जो सिर्फ पेट से जन्म लेता है, परिवार वह होता है जो जरूरत पड़ने पर ढाल बनकर खड़ा होता है।”

उमाशंकर जी ने भर्राई आवाज में कहा, “जानकी… तो क्या हमारी सारी परवरिश, हमारा सारा त्याग व्यर्थ चला गया?”

“नहीं, हमारी परवरिश में कोई खोट नहीं थी,” जानकी जी ने समझाते हुए कहा, “खोट उस अंधी दौड़ में है, जहां इंसान रिश्तों से बड़ा पैसों को समझने लगता है। लेकिन अब हम रोएंगे नहीं। हमने अपनी पूरी जिंदगी चिन्मय के भविष्य को बनाने में लगा दी, अपनी सारी खुशियां उस पर न्योछावर कर दीं। पर अब हम अपने लिए जिएंगे। हमारे पास आपकी पेंशन है, हमारा यह छोटा सा घर है, और सबसे बढ़कर हमारे पास यह सच्चा, प्यार करने वाला समाज और पड़ोस है। आज से हम यह उम्मीद छोड़ते हैं कि कोई सात समंदर पार से आकर हमारी लाठी बनेगा। हम दोनों एक-दूसरे की लाठी बनेंगे।”

उमाशंकर जी ने अपनी पत्नी के हाथों को जोर से दबा लिया। उनके चेहरे पर छाई निराशा अब एक नई शक्ति और आत्मसम्मान में बदलने लगी थी।

तीन दिन बाद जब उमाशंकर जी को अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी, तभी जानकी जी के फोन पर चिन्मय का फोन आया। स्क्रीन पर उसका नाम चमक रहा था। जानकी जी ने फोन उठाया और लाउडस्पीकर ऑन कर दिया।

“हेलो मां! मैंने अकाउंट में पंद्रह लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए हैं। उम्मीद है पैसे मिल गए होंगे। डैड कैसे हैं अब? क्या सर्जरी हो गई?” चिन्मय ने औपचारिकता निभाते हुए पूछा।

जानकी जी की आवाज में एक अलौकिक गंभीरता और ठहराव था। उन्होंने कहा, “चिन्मय बेटा, तुम्हारे पैसे बैंक में आ गए थे, लेकिन मैंने आज सुबह ही बैंक जाकर वे सारे पैसे उसी खाते में वापस लौटा दिए हैं जहां से वे आए थे।”

“क्या? मां, तुम पागल हो गई हो क्या? इतने पैसे वापस क्यों कर दिए?” चिन्मय लगभग चिल्लाया।

जानकी जी ने शांति से जवाब दिया, “क्योंकि बेटा, तुम्हारे पिता की जान तुम्हारे उन कागजी डॉलरों से नहीं, बल्कि इन पड़ोसियों के खून, डॉक्टरों की मेहनत और मेरी प्रार्थनाओं से बची है। जिस वक्त तुम्हारे पिता को अपने बेटे के हाथ के स्पर्श की जरूरत थी, उस वक्त तुम अपनी सुख-सुविधाओं का हिसाब लगा रहे थे। बेटा, याद रखना, पैसे से दुनिया का सबसे महंगा अस्पताल और सबसे महंगे डॉक्टर तो खरीदे जा सकते हैं, लेकिन किसी के सीने में धड़कता हुआ सच्चा प्यार और अपनत्व नहीं खरीदा जा सकता।”

चिन्मय उस पार पूरी तरह सन्न रह गया। उसकी जुबान से कोई शब्द नहीं निकला।

जानकी जी ने अपनी बात जारी रखी, “तुमने अपनी जिम्मेदारियों की कीमत लगा दी थी चिन्मय, लेकिन हमारे स्वाभिमान की कोई कीमत नहीं है। आज के बाद हमें पैसे भेजने का कष्ट मत करना। तुम वहां अपने करियर, अपनी दौलत और अपनी दुनिया में खुश रहो। हम दोनों यहां महाकाल के साए में और अपने सच्चे अपनों के बीच बेहद खुश और सुरक्षित हैं। ईश्वर करे तुम्हें कभी उस अकेलेपन का अहसास न हो, जो तुमने आज हमें दिया है।”

इतना कहकर जानकी जी ने फोन काट दिया और हमेशा के लिए उस नंबर को ब्लॉक कर दिया। उन्होंने एक बहुत भारी बोझ अपने सीने से उतार फेंका था।

जब उमाशंकर जी अस्पताल के मुख्य दरवाजे से बाहर निकले, तो बाहर हल्की धूप खिली हुई थी। ताजी हवा का एक झोंका उनके चेहरे को छूकर गुजरा। सामने महेश बाबू, उनकी पत्नी और मोहल्ले के कई नौजवान हाथ में फूलों का गुलदस्ता लिए मुस्कुराते हुए खड़े थे।

उमाशंकर जी ने जानकी जी का हाथ अपने हाथ में लिया। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा। उन आंखों में अब किसी दूर बैठे बेटे की बेरुखी का कोई मलाल नहीं था, बल्कि अपनी शेष जिंदगी को आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और सच्चे रिश्तों के साथ शान से जीने का एक अटूट, सकारात्मक संकल्प था। ‘सदाशिव कुटीर’ की देहरी आज फिर से अपने स्वाभिमानी बुजुर्गों का स्वागत करने के लिए बाहें फैलाए खड़ी थी।

आपके विचार हमारे लिए बेहद अनमोल हैं: क्या आज की पीढ़ी के लिए विदेश की चकाचौंध और करियर की अंधी दौड़ इतनी बड़ी हो गई है कि वे अपने जन्मदाता माता-पिता के आंसुओं और उनकी अंतिम उम्मीदों को भी भूल जाते हैं? क्या जानकी देवी का बेटे के भेजे पैसों को लौटाकर अपने आत्मसम्मान और स्थानीय रिश्तों को चुनना एक सही फैसला था? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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