यशोदा जी ने आगे बढ़कर उनके जुड़े हुए हाथ थाम लिए और स्नेह से कहा, “भाई साहब, शर्मिंदा मत होइए। जब सुबह का भूला शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। आज हमारा परिवार सचमुच संपूर्ण हो गया।”
प्रियांशु और प्रगति ने दौड़कर अपनी दीदी और जीजाजी को घेर लिया। “दीदी, हमें माफ़ कर दो! हम अपनी पढ़ाई और नासमझी में यह समझ ही नहीं पाए कि आप अकेले कितना बड़ा दर्द झेल रही थीं।”
उस भव्य सभागार में उस रात केवल तालियों की गड़गड़ाहट नहीं गूँजी थी, बल्कि वहाँ मानवीय संवेदनाओं, अगाध प्रेम और संस्कारों की वह पावन विजय हुई थी जो पीढ़ियों को रास्ता दिखाती है। अवंतिका के माथे का सिंदूर आज अपने पूर्ण गौरव के साथ दमक रहा था। जो विवाह कल तक एक मजबूरी और अकेलेपन की छाया में हुआ लग रहा था, आज वह माता-पिता के आंसुओं से धुले सच्चे आशीष का पावन उत्सव बन चुका था।
शहर के मध्य स्थित एक छोटे से बैंक्वेट हॉल के सजे-धजे कमरे में आंसुओं और मुस्कान का विचित्र संगम बह रहा था। शीशे के सामने लाल चुनरी ओढ़े बैठी अवंतिका की कांपती उँगलियाँ अपनी चूड़ियों को सहला रही थीं। कल कोर्ट मैरिज के कानूनी कागज़ात पर दस्तखत हो चुके थे। आज पूरे रीति-रिवाज से सात फेरों की रस्म होनी थी।
अवंतिका के भीतर विचारों का ज्वार उमड़ रहा था। पापा का वो आखिरी वाक्य उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह बार-बार गूँज रहा था—”तूने मेरी पगड़ी को समाज के चौराहे पर उछाल दिया अवंतिका! अपनी मर्जी चलाकर तूने साबित कर दिया कि तूने बेटी होने का फर्ज नहीं निभाया।”
“फर्ज नहीं निभाया पापा?” अवंतिका की बंद आँखों से दो बूँद आँसू लुढ़ककर उसके गालों पर ठहर गए। आठ साल… पूरे आठ साल उसने और मयंक ने केवल और केवल पिता की एक हामी के लिए तपस्या की थी। न कोई बगावत की, न कोई उतावली दिखाई। हर मोड़ पर पापा की रज़ामंदी को सबसे ऊपर रखा। पर क्या संतानों की भावनाओं, उनके वर्षों के विश्वास और धैर्य की कोई कीमत नहीं होती? जब जीवन के सबसे सुनहरे और पावन दिन पर अपनी ही जन्मदात्री माँ और जन्म देने वाले पिता की छाँव सिर पर न हो, तो उस सूनेपन का दंश केवल वही बेटी जान सकती है जो उस वेदना से गुज़रती है।
कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। अवंतिका की सबसे प्रिय छात्रा सलोनी और कॉलेज की सहकर्मी विनीता मैम हाथों में फूलों का गजरा लिए भीतर आईं। “अवंतिका मैम, देखिए तो कितनी सुंदर लग रही हैं आप! बाहर बारात मंडप के दरवाज़े तक आ पहुँची है। मयंक सर और उनका पूरा परिवार आपकी एक झलक पाने को बेताब है।” सलोनी ने बड़े प्यार से अवंतिका के माथे पर टीका लगाते हुए कहा।
अवंतिका ने अपनी रुलाई को रोकते हुए एक फीकी मुस्कान बिखेरी। विगत घटनाक्रम किसी चलचित्र की भाँति उसकी स्मृति के पटल पर घूमने लगे।
वह सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता (एसई) हरिमोहन जी की सबसे बड़ी संतान थी। माँ उर्मिला जी एक सरकारी कन्या विद्यालय में प्रधानाध्यापिका थीं, जिन्होंने कुछ वर्ष पूर्व स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। अवंतिका से छोटे दो जुड़वाँ भाई-बहन थे—प्रियांशु और प्रगति। अवंतिका बचपन से ही पढ़ाई में विलक्षण थी। कक्षा में हमेशा प्रथम आना, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में पदक जीतना उसकी आदत थी। इसके ठीक विपरीत, प्रियांशु और प्रगति का मन किताबों में कभी नहीं रमा; वे दोनों अपनी ही दुनिया में मस्त रहते थे।
दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में स्वर्ण पदक पाने के बाद अवंतिका उच्च अध्ययन के लिए विदेश गई। वहीं एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के दौरान उसकी भेंट मयंक से हुई थी। मयंक स्वभाव से अत्यंत गंभीर, भद्र और संवेदनशील व्यक्तित्व का धनी था। दोनों के बीच विचारों का सामंजस्य कब प्रगाढ़ प्रेम में बदल गया, पता ही नहीं चला। बाद में अवंतिका ने विधि संकाय से कानून की डिग्री भी ली। जब वह भारत लौटी, तो उसने दो प्रमुख विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में पढ़ाना शुरू किया। उसका सरल स्वभाव, कठिन से कठिन आर्थिक सिद्धांतों को सरलता से समझा देने की शैली और छात्रों के प्रति ममता ने उसे परिसर में सबका चहेता बना दिया।
उधर मयंक भी अपनी योग्यता के बल पर केंद्रीय विश्वविद्यालय में स्थायी प्रवक्ता नियुक्त हो गया। जब वैश्विक महामारी का दौर आया, तो अवंतिका ने ग्रामीण क्षेत्रों के वंचित छात्रों के लिए निःशुल्क ऑनलाइन कक्षाएं शुरू कीं। मयंक ने तकनीकी और शैक्षणिक रूप से उसका पूरा सहयोग किया। अवंतिका आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुकी थी। उसने अपने पिता के परामर्श से शहर के बाहरी इलाके में एक सुंदर डुप्लेक्स मकान भी अपने नाम पर खरीदा था।
मयंक का परिवार ग्वालियर के ही एक शांत उपनगर में रहता था। उसके पिता, स्वर्गीय परशुराम जी, एक सेवानिवृत्त डाकपाल थे। सीधा-साधा, आत्मीय और संस्कारों से भरा परिवार। जब मयंक अवंतिका को पहली बार अपने घर ले गया था, तो परशुराम जी ने उसके सिर पर हाथ रखकर भरे मन से कहा था, “बेटी अवंतिका, तुम जैसी विदुषी और संस्कारी बेटी अगर इस चौखट की लक्ष्मी बनेगी, तो हमारा यह छोटा सा घर तीरथ बन जाएगा। बस जल्दी से हमारे आंगन को धन्य कर दो।”
अवंतिका शर्म से दोहरी हो गई थी। मयंक के पिता ने कई बार कहा कि वे खुद चलकर हरिमोहन जी से रिश्ते की बात करें, पर अवंतिका ने हमेशा हाथ जोड़कर मना कर दिया था, “नहीं बाबूजी, मेरे पापा थोड़े स्वाभिमानी और कड़े उसूलों वाले हैं। उन्हें लगेगा कि मैं उन पर दबाव बना रही हूँ। मुझे थोड़ा वक्त दीजिए, मैं खुद उन्हें मना लूँगी।”
किंतु विधाता की योजना कुछ और ही थी। लगभग दो वर्ष पूर्व अचानक दिल का दौरा पड़ने से परशुराम जी का देहांत हो गया। अवंतिका उस दिन फफक-फफक कर रोई थी कि वह उस पुण्यात्मा की आखिरी इच्छा उनके जीते-जी पूरी नहीं कर सकी। पिता के जाने के बाद मयंक की बूढ़ी माँ यशोदा जी की आँखों में केवल एक ही आस बची थी कि मयंक का घर बस जाए।
मयंक ने एक दिन बहुत भारी मन से अवंतिका से कहा, “अवंतिका, आठ वर्ष बीत गए। हम अपनी जवानी के सबसे खूबसूरत साल केवल एक इंतज़ार में गुज़ार चुके हैं। अब माँ का शरीर भी साथ नहीं दे रहा। एक बार अंतिम प्रयास करो, अपने पापा से खुलकर बात करो।”
अवंतिका ने घर जाकर जब पापा के सामने हाथ जोड़कर मयंक के साथ विवाह की बात रखी, तो हरिमोहन जी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उनके मन में प्रशासनिक रुतबे और जागीरदाराना ठसक का ऐसा भूत सवार था कि वे एक सीधे-साधे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को अपने दामाद के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अवंतिका की एक न सुनी। हद तो तब हो गई जब हरिमोहन जी ने अवंतिका की सहमति के बिना, राज्य पुलिस सेवा में चयनित एक डीएसपी के साथ उसकी सगाई की तारीख तक तय कर दी।
उस दिन अवंतिका की आत्मा भीतर तक लहूलुहान हो गई। जहाँ वह आठ साल से उनके एक स्नेहिल ‘हाँ’ की प्रतीक्षा कर रही थी, वहीं पिता ने उसे बिना किसी संवेदना के अपनी झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा की भेंट चढ़ाने का निर्णय ले लिया था।
उस रात अवंतिका ने भारी मन से अपनी कुछ जरूरी किताबें और कपड़े समेटे और घर की चौखट लांघ दी। उसने एक कामकाजी महिला छात्रावास में शरण ली। मयंक और उसने कानूनी रूप से कोर्ट मैरिज की अर्ज़ी दाखिल कर दी।
कोर्ट मैरिज संपन्न हो चुकी थी। मयंक के बड़े भाई, भाभी, बहन और बहनोई पूरे मान-सम्मान के साथ अवंतिका को अपनी कुलवधू मान चुके थे। आज शाम सामाजिक रीति-रिवाजों से विवाह होना था। बैंक्वेट हॉल की पूरी सजावट, खान-पान और बारात के स्वागत की व्यवस्था अवंतिका के विश्वविद्यालय के सहकर्मियों और उसके प्रिय विद्यार्थियों ने मिलकर संभाली थी।
हल्दी और मेहंदी की रस्मों में खूब हंसी-ठिठोली हुई थी। पर अवंतिका का मन हर पल दरवाज़े की ओर ताकता रहता था। उसे छुप-छुप कर फोन करने वाली माँ ने रोते हुए कहा था, “अवंतिका, तेरे पापा ने कसम दी है कि अगर मैं तेरी शादी की चौखट पर गई, तो वे अपना प्राण त्याग देंगे। मैं विवश हूँ मेरी बच्ची… मेरा कलेजा फटा जा रहा है।”
अवंतिका ने अपनी दोनों आँखें कसकर बंद कर लीं। मन के किसी गुप्त कोने में अब भी एक नन्हीं सी लौ टिमटिमा रही थी—काश पापा अपनी इस ज़िद को छोड़ देते! काश माँ आकर उसके सिर पर पल्लू सही करती! काश छोटा भाई प्रियांशु दूल्हे की सालियों के साथ मिलकर मयंक के जूते चुराता और प्रगति अपनी दीदी के आंचल में लावे मिलाती!
पर यथार्थ बहुत कठोर था। घड़ी की सुइयाँ रात के आठ बजा चुकी थीं। शहनाई की पावन गूँज के बीच बारात का स्वागत हुआ।
लड़की पक्ष की ओर से विश्वविद्यालय के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर, डॉक्टर त्रिवेदी सर और उनकी धर्मपत्नी आगे आए। उन्होंने मयंक का तिलक किया और उसे आदरपूर्वक मंडप में बैठाया। जब कन्यादान का क्षण आया, तो डॉक्टर त्रिवेदी और उनकी पत्नी ने अवंतिका का हाथ मयंक के हाथ में सौंपते हुए अपने आँसू पोंछे। त्रिवेदी सर की आवाज़ भर्रा गई, “मयंक बेटा, हमने अपनी कोई सगी बेटी नहीं विदा की, पर आज ईश्वर ने हमें अवंतिका के रूप में जो कन्यादान का पुण्य दिया है, वह हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। इस अनमोल रत्न का सदैव मान रखना।”
अवंतिका के सहकर्मी राहुल ने भाई बनकर लावे मिलाने की रस्म पूरी निष्ठा से निभाई। सलोनी, कृतिका, दिव्या, पल्लवी और ऋचा जैसी छात्राओं ने अपनी सगी बहनों से बढ़कर एक-एक नेग निभाया। दूल्हे के जूते चुराए गए, नोक-झोंक हुई, ठहाके लगे। मयंक ने अवंतिका की मांग में सुर्ख सिंदूर भरा और उसके गले में मंगलसूत्र पहनाया।
सारे संस्कार संपन्न हो गए। परायों ने उस रात जो अपनापन उंडेला था, उसने अवंतिका के दिल के कई ज़ख्मों पर मरहम लगा दिया था। सच ही तो है, कभी-कभी खून के रिश्ते मर्यादा और अहंकार के बंधनों में बंधकर पराए हो जाते हैं, और आत्मा से जुड़े पराए लोग अपनों से भी बढ़कर ढाल बन जाते हैं।
अगली सुबह विदाई की बेला थी।
शहर के प्रतिष्ठित सभागार में शाम को मयंक के परिवार द्वारा एक भव्य रिसेप्शन का आयोजन किया गया था। मंडप से जब अवंतिका की डोली विदा होने लगी, तो पूरा हॉल आंसुओं से भीग गया। डॉक्टर त्रिवेदी सर और उनकी पत्नी ऐसे बिलख रहे थे मानो उनकी अपनी कोख जाई विदा हो रही हो। छात्र-छात्राएं हाथ जोड़े खड़े थे।
अवंतिका जब ससुराल पहुँची, तो गृहप्रवेश के समय सास यशोदा जी ने सोने के कंगन उसकी कलाई में पहनाए और अपने सीने से चिपका लिया। अवंतिका ने सबसे पहले बैठक में टंगी स्वर्गीय परशुराम जी की तस्वीर के आगे नतमस्तक होकर प्रणाम किया। तस्वीर के भीतर से झांकती वे सौम्य आँखें जैसे कह रही थीं—’सदा सुहागन रहो बेटी, आज मेरा घर पूरा हो गया।’
शाम को रिसेप्शन पार्टी थी। अवंतिका ने गहरे मैरून रंग का पारंपरिक लहंगा पहना था। चेहरे पर नई नवेली दुल्हन की लज्जा थी, पर दिल के किसी सूने आले में मायके की याद का दीया अब भी सुलग रहा था। भाभी ने कमरे में आकर कहा, “अवंतिका, चलो नीचे हॉल में। मेहमान आने शुरू हो गए हैं।”
मयंक और अवंतिका जब मंच पर जाकर सोफे पर बैठे, तो बधाई देने वालों का तांता लग गया। विश्वविद्यालय के कुलपति, साथी शिक्षक और शहर के कई गणमान्य लोग पुष्पगुच्छ भेंट कर रहे थे।
रात के करीब नौ बजे अचानक मुख्य द्वार पर एक अजीब सी सुगबुगाहट हुई।
अवंतिका ने अनायास ही नज़रें उठाईं। सामने का दृश्य देखकर उसकी साँसें जहाँ की तहाँ थम गईं। उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं और वह अचेत सी होकर खड़ी हो गई।
सभागार के मुख्य द्वार पर उसके पिता हरिमोहन जी खड़े थे। उनके साथ माँ उर्मिला जी, भाई प्रियांशु और बहन प्रगति भी थीं।
हरिमोहन जी के हाथ में चाँदी का एक बड़ा थाल था, जिस पर शगुन की चुनरी, नारियल और मिठाइयाँ सजी थीं। पर उनका वह रौबदार, अहंकारी चेहरा आज पूरी तरह टूटा हुआ था। उनकी आँखें झुकी हुई थीं और शरीर में एक अजीब सा कंपन था।
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। मयंक ने तुरंत अवंतिका का हाथ थामा और दोनों मंच की सीढ़ियों से नीचे उतरे।
अवंतिका अपने कदमों पर काबू नहीं रख पा रही थी। वह लगभग दौड़ती हुई अपने पिता के सामने पहुँची और बिना कुछ बोले सीधे उनके चरणों में गिर पड़ी। उसकी हिचकियाँ बंध गईं।
“पापा…” अवंतिका के कंठ से केवल यही एक शब्द फूट सका।
हरिमोहन जी के हाथ से वह चाँदी का थाल छूटते-छूटते बचा, जिसे पीछे खड़े प्रियांशु ने लपक कर संभाल लिया। हरिमोहन जी ने अपने दोनों घुटने ज़मीन पर टिका दिए। उन्होंने अपनी दोनों कांपती हथेलियों से अवंतिका का सिर उठाया और उसे अपने सीने से भींच लिया। एक कड़क, प्रशासनिक अधिकारी समाज के तमाम लोगों के सामने बच्चों की तरह दहाड़ मारकर रो पड़ा।
“मेरी बच्ची… मेरी लाडो! मुझे क्षमा कर दे!” हरिमोहन जी की आवाज़ आंसुओं में डूब गई। “मैं अंधा हो गया था अवंतिका… अपनी झूठी पद-प्रतिष्ठा और समाज के खोखले दर्जे के नशे में मैं यह भूल ही गया था कि दुनिया की कोई भी दौलत और रुतबा मेरी इस देवी जैसी बेटी की खुशियों से बड़ा नहीं हो सकता।”
उर्मिला जी ने आगे बढ़कर दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया। माँ की आँखें आंसुओं से अविरल बह रही थीं।
हरिमोहन जी ने नम आँखों से सिर उठाकर सामने खड़े मयंक को देखा। मयंक ने आगे बढ़कर बहुत ही आदर से उनके चरण छुए। हरिमोहन जी ने मयंक को खींचकर गले लगा लिया।
“मयंक बेटा… तुमने आठ साल तक मेरी कड़वाहट, मेरे अपमान और मेरी ज़िद को सहा, पर कभी मेरी बेटी का हाथ गलत रास्ते पर नहीं खींचा। तुमने जिस धैर्य और संस्कार से मेरी अवंतिका के सम्मान की रक्षा की है, उसने आज मेरे अहंकार के हर टुकड़े को चकनाचूर कर दिया। आज सुबह जब त्रिवेदी जी मेरे घर आए और उन्होंने मुझे मंडप की तस्वीरें दिखाईं, उन्होंने जब मुझे बताया कि कैसे पूरे विश्वविद्यालय ने मिलकर मेरी बेटी का कन्यादान किया क्योंकि उसका अभागा बाप अपने दंभ में अंधा था… तो मुझे अपनी ही सांसों से घिन आने लगी।”
हरिमोहन जी ने हाथ जोड़कर मयंक के परिवार की ओर देखा, “समधिन जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं उस योग्य नहीं था कि इस पावन रिश्ते को समझ पाता।”
यशोदा जी ने आगे बढ़कर उनके जुड़े हुए हाथ थाम लिए और स्नेह से कहा, “भाई साहब, शर्मिंदा मत होइए। जब सुबह का भूला शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। आज हमारा परिवार सचमुच संपूर्ण हो गया।”
प्रियांशु और प्रगति ने दौड़कर अपनी दीदी और जीजाजी को घेर लिया। “दीदी, हमें माफ़ कर दो! हम अपनी पढ़ाई और नासमझी में यह समझ ही नहीं पाए कि आप अकेले कितना बड़ा दर्द झेल रही थीं।”
उस भव्य सभागार में उस रात केवल तालियों की गड़गड़ाहट नहीं गूँजी थी, बल्कि वहाँ मानवीय संवेदनाओं, अगाध प्रेम और संस्कारों की वह पावन विजय हुई थी जो पीढ़ियों को रास्ता दिखाती है। अवंतिका के माथे का सिंदूर आज अपने पूर्ण गौरव के साथ दमक रहा था। जो विवाह कल तक एक मजबूरी और अकेलेपन की छाया में हुआ लग रहा था, आज वह माता-पिता के आंसुओं से धुले सच्चे आशीष का पावन उत्सव बन चुका था।
अवंतिका ने मंच पर रखी स्वर्गीय ससुर जी की तस्वीर और सामने खड़े अपने माता-पिता को एक साथ देखा। उसके भीतर का हर खालीपन भर चुका था। रिश्ते मान-अपमान की संकीर्ण दीवारों से बहुत परे होते हैं; जब नीयत में खोट न हो और प्रेम में मर्यादा हो, तो वक्त का पहिया हर रूठे हुए अपने को वापस उसी स्नेहिल आंगन में ला खड़ा करता है।
प्रिय पाठकों,
क्या संतानों द्वारा अपनी पसंद से किया गया विवाह हमेशा माता-पिता के सम्मान की अवहेलना होता है, या फिर अवंतिका और मयंक की तरह वर्षों का धैर्य और शालीन आचरण यह सिद्ध करता है कि सच्चा प्रेम परिवार को तोड़ता नहीं, बल्कि अंततः जोड़ता ही है? इस भावनात्मक और मर्मस्पर्शी पारिवारिक दास्तान ने आपके भीतर क्या विचार जगाए, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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