ममता के आंसू

“पल्लवी, तुम इतना सब क्यों करती हो? इस घर ने तुम्हें दिया ही क्या है?” देवांश ने बहुत धीमी आवाज में पूछा।

पल्लवी ने उठकर बैठते हुए मुस्कुरा कर कहा, “यह मेरा घर है देवांश जी। जब अपने घर की छत टपकती है, तो घर छोड़कर भागा नहीं जाता, बल्कि मिलकर छत की मरम्मत की जाती है। और फिर मुझे किसी से कुछ पाने की चाह नहीं, बस इस परिवार का सुख ही मेरा सुख है।”

देवांश का दिल तो आज भी उसी तान्या के खयालों में अटका था, जिसके साथ उसने इंजीनियरिंग के चार साल सपने बुनते हुए बिताए थे। तान्या एक बड़े रईस कारोबारी की इकलौती लाडली थी। वह महंगी गाड़ियों में घूमती, ब्रांडेड कपड़ों में महकती और हवा में वादे करती। देवांश ने उसे अपनी पूरी रूह से चाहा था, लेकिन जब जीवन के असली फैसले की घड़ी आई, तो तान्या ने पलक झपकते ही देवांश के सामान्य मध्यवर्गीय परिवार को ठुकरा दिया और अपने पिता की मर्जी से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के बड़े हिस्सेदार से शादी रचाकर विदेश उड़ गई। देवांश टूटकर बिखर चुका था। वह तान्या की इस बेरहम बेवफाई को भी अपनी ही किस्मत की खता मानकर उसी के गम के साए में जीने लगा था।

जब देवांश की उदासी और टूटन उसके माता-पिता, उमाकांत जी और शारदा जी से देखी न गई, तो उन्होंने एक सुलझे हुए और संस्कारी परिवार की बेटी पल्लवी से उसका रिश्ता तय कर दिया। पल्लवी एक बेहद सादगी पसंद, नम्र और मृदुभाषी लड़की थी, जो स्कूल में कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपने पिता का हाथ बंटाती थी। पल्लवी को शादी के चंद दिनों बाद ही घर की हवाओं और देवांश की बेरुखी से सब समझ आ गया कि उसका पति किसी और के गम की चिता पर बैठा है। लेकिन पल्लवी ने अपने दिल को मजबूत किया। उसने खुद से कहा कि तान्या देवांश का बीता हुआ कल थी, लेकिन आज और आने वाला कल मैं हूं; यदि देवांश का मन आज मुझसे नहीं जुड़ पा रहा है, तो इसमें उनकी टूटन जिम्मेदार है, कोई दुर्भावना नहीं।

मगर पल्लवी के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल देवांश का मौन नहीं था, बल्कि उस विशाल संयुक्त परिवार के बाकी सदस्यों की नफरत और तंज थे। उस घर में देवांश के बड़े भाई आलोक, भाभी नीलिमा, दो भतीजे, बुआ मालती देवी, दादी जी और छोटी बहन नंदिनी सब एक साथ रहते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बीते कुछ सालों से काफी डांवाडोल चल रही थी। उमाकांत जी की सरकारी नौकरी की पेंशन से इतने बड़े कुनबे का खर्च खींचतान कर चलता था। घर के बाकी लोगों को उम्मीद थी कि देवांश की शादी जब किसी बड़े रईस घराने में होगी, तो छप्पर फाड़कर दहेज आएगा, बड़ी-बड़ी गाड़ियां और नोटों की गड्डियां आएंगी, जिससे घर की तंगहाली एक झटके में दूर हो जाएगी।

जब पल्लवी खाली हाथ, केवल अपने संस्कार और एक छोटा सा बक्सा लेकर आई, तो पूरे परिवार के अरमानों पर पानी फिर गया। बुआ मालती देवी बात-बात पर ताना मारतीं, “लाए भी तो क्या, एक फकीर की बेटी! न कोई गहना, न कोई ठाठ। सोचा था छोटे की बहू आएगी तो घर की काया पलट जाएगी, यहां तो खाने वाला एक पेट और बढ़ गया।”

जेठानी नीलिमा भी अपनी खीझ पल्लवी पर ही उतारती। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के बर्तनों तक का सारा भार धीरे-धीरे पल्लवी के कंधों पर डाल दिया गया। पल्लवी सुबह चार बजे उठकर सबके लिए चाय बनाती, झाड़ू-पोंछा करती, सबके कपड़े धोती और फिर रसोई में जाकर रोटियां सेकती। उसके हाथ का बना खाना जब मेज पर आता, तो कोई उसमें नमक तेज बताकर थाली खिसका देता, तो कोई दाल में पानी ज्यादा होने का ताना देकर उठ जाता।

पूरे घर में सिर्फ सास शारदा जी और ससुर उमाकांत जी ही ऐसे थे, जो पल्लवी के दर्द को समझते थे। शारदा जी अक्सर रात को रसोई में आकर पल्लवी के सिर पर हाथ फेर देतीं और भरभराई आवाज में कहतीं, “बहू, मुझे माफ कर देना। हम जानते हैं कि इस घर के लोग तेरे साथ कितना बुरा कर रहे हैं। तंगी ने इनके दिमाग को संकीर्ण बना दिया है और लालच ने इनकी आंखों पर पट्टी बांध दी है। तू इनकी कड़वी बातों को दिल पर मत लगाना, समय सब ठीक कर देगा।”

पल्लवी अपनी सास के आंसुओं को पोंछते हुए धीमी सी मुस्कान के साथ कहती, “मां जी, आप चिंता क्यों करती हैं? ये सब मेरे अपने ही तो हैं। जब परिवार तंगहाली से जूझ रहा हो, तो मन में झुंझलाहट आना स्वाभाविक है। मैं कोई पराई थोड़ी हूं, देखिएगा, एक दिन सब ठीक हो जाएगा।”

कहना जितना सरल था, हर दिन उस विष को घूंट-घूंट पीना उतना ही कठिन था। कई बार रात को जब देवांश कमरे में आकर करवट बदलकर सो जाता, तो पल्लवी अपने आंसुओं को तकिए में दबाकर सिसकती। वह सोचती कि दुनिया की हर मुश्किल सही जा सकती है, पर जब अपना जीवनसाथी ही आपके अस्तित्व से बेखबर हो, तो इंसान किसके सहारे जिए? मगर पल्लवी ने हार मानने के बजाय अपनी परिस्थितियों से लड़ने का फैसला किया।

उसने देखा कि घर की आर्थिक हालत सचमुच बहुत खस्ता है। बड़े भैया आलोक की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई और ट्यूशन में चला जाता था, जिसके कारण भाभी नीलिमा हमेशा तनाव में रहती थीं। पल्लवी ने चुपचाप अपनी पुरानी पढ़ाई की किताबें निकालीं और दोनों बच्चों को खुद रोज शाम को दो-दो घंटे पढ़ाना शुरू कर दिया। बच्चे जो पहले स्कूल के टेस्ट में फेल होते थे, पल्लवी की लगन से कक्षा में अव्वल आने लगे। इससे बच्चों के ट्यूशन के भारी-भरकम पैसे बचने लगे। भाभी नीलिमा ने मुंह से तो कुछ नहीं कहा, पर अब उनके तानों में पहले जैसी चुभन नहीं रह गई थी। कभी-कभार वे भी पल्लवी के लिए चाय का एक कप रसोई में छोड़ आती थीं।

पल्लवी यहीं नहीं रुकी। उसने देखा कि घर के आंगन में धूप अच्छी आती है। उसने पड़ोस की औरतों से बात करके सिलाई-कढ़ाई का काम पकड़ना शुरू किया। वह दिन भर का काम निपटाकर दोपहर में जब सब सो जाते, तो मशीन पर बैठकर सूट सिलती। इसके साथ ही उसने अपनी मां के हाथ के सिखाए पारंपरिक आम, नींबू और आंवले के स्वादिष्ट अचार और पापड़ बनाने शुरू किए। मोहल्ले की महिलाओं को जब उसका बनाया अचार चखाया गया, तो सब उंगलियां चाटती रह गईं। धीरे-धीरे डिब्बों के ऑर्डर आने लगे। जो थोड़ी-बहुत आमदनी होती, पल्लवी उसे चुपचाप महीने के अंत में अपनी सास शारदा जी के हाथ में रख देती ताकि घर के राशन और दवाओं का खर्च आसानी से निकल सके।

दादी जी जो अक्सर घुटनों के दर्द से कराहती रहती थीं, पल्लवी रात को सोने से पहले उनके पैरों में तिल के गरम तेल की मालिश करती, उनके मैले कपड़े खुद धोती और उन्हें रामायण की चौपाइयां पढ़कर सुनाती। दादी का दिल भी पल्लवी की इस निस्वार्थ सेवा से पिघलने लगा था। वे छुपकर उसके सिर पर हाथ रखकर दिल से दुआएं देतीं, “जीती रह बिटिया, भगवान तुझे अखंड सौभाग्यवती रखे।”

इधर देवांश भी पत्थर का नहीं था। वह हर रोज अपनी आंखों से पल्लवी का संघर्ष देख रहा था। उसने देखा कि जिस लड़की को इस घर ने सिवाय उपेक्षा और अपमान के कुछ नहीं दिया, वह इस परिवार को संभालने के लिए दिन-रात एक कर रही है। पल्लवी की उंगलियों में सुई चुभने के निशान, पसीने से भीगा उसका माथा, और फिर भी उसके चेहरे पर खिली रहने वाली वह शांत, शीतल मुस्कान देवांश के सीने में बरसों से जमे तान्या के झूठे प्यार के बर्फ को धीरे-धीरे पिघलाने लगी।

एक शाम, जब पल्लवी मशीन पर कपड़े सिलते-सिलते वहीं मेज पर सिर रखकर थककर सो गई थी, देवांश कमरे में आया। उसने देखा कि पल्लवी के चेहरे पर गहरी थकान थी, लेकिन फिर भी एक मासूमियत थी। देवांश ने पहली बार अपने हाथों से एक चादर उठाई और धीरे से पल्लवी के ऊपर ओढ़ा दी। पल्लवी की आंख खुली तो उसने देवांश को अपने सामने खड़े देखा। देवांश की आंखों में आज खालीपन नहीं था, बल्कि एक गहरा पश्चाताप और आदर का भाव था।

“पल्लवी, तुम इतना सब क्यों करती हो? इस घर ने तुम्हें दिया ही क्या है?” देवांश ने बहुत धीमी आवाज में पूछा।

पल्लवी ने उठकर बैठते हुए मुस्कुरा कर कहा, “यह मेरा घर है देवांश जी। जब अपने घर की छत टपकती है, तो घर छोड़कर भागा नहीं जाता, बल्कि मिलकर छत की मरम्मत की जाती है। और फिर मुझे किसी से कुछ पाने की चाह नहीं, बस इस परिवार का सुख ही मेरा सुख है।”

उस दिन के बाद से देवांश के व्यवहार में जमीन-आसमान का फर्क आ गया। उसने पल्लवी से बात करना शुरू किया, उसके काम में हाथ बंटाया और दफ्तर से लौटते वक्त कभी उसके लिए गजरा तो कभी उसकी पसंद की मिठाई लाने लगा। देवांश के दिल में अब तान्या का नामो-निशान तक नहीं बचा था; उसकी जगह पल्लवी के प्रति एक गहरा, अटूट और सच्चा प्रेम अंकुरित हो चुका था। पल्लवी को लगा कि उसकी तपस्या अब रंग ला रही है। उसने मन ही मन सोचा कि बस किसी तरह ननद नंदिनी और बुआ जी का दिल जीत लूं, तो यह घर सचमुच एक मंदिर बन जाएगा।

मगर नंदिनी के मन में भाभी के लिए अब भी कड़वाहट थी। नंदिनी कॉलेज में पढ़ती थी, बेहद खूबसूरत और चंचल स्वभाव की थी। अमीर सहेलियों के बीच अपनी झूठी शान बनाए रखने के चक्कर में वह कॉलेज के एक बिगड़ैल और अय्याश रईस लड़के रोमित के जाल में फंस चुकी थी। रोमित केवल अपनी ऐयाशी और रौब के लिए जाना जाता था, उसका चरित्र ठीक नहीं था। नंदिनी उसके महंगे तोहफों और चिकनी-चुपड़ी बातों में इतनी अंधी हो चुकी थी कि उसे अपने भले-बुरे की कोई सुध नहीं थी।

एक दिन दोपहर को पल्लवी छत पर कपड़े सुखाने गई थी। तभी उसने सीढ़ियों के पास नंदिनी को फोन पर फुसफुसाते हुए सुना। नंदिनी घबराए हुए स्वर में कह रही थी, “रोमित, तुम सच कह रहे हो न? हम शादी कर लेंगे न? ठीक है, आज रात ठीक एक बजे जब सब सो जाएंगे, मैं पीछे वाले बगीचे के दरवाजे से अपना बैग लेकर निकल आऊंगी। तुम गाड़ी लेकर गली के मोड़ पर तैयार रहना।”

पल्लवी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह समझ गई कि नंदिनी अपनी नासमझी में कितनी बड़ी खाई में कूदने जा रही है। रोमित जैसा आवारा लड़का कभी किसी का सगा नहीं हो सकता था; वह नंदिनी की जिंदगी बर्बाद करके उसे सड़क पर छोड़ देता। पल्लवी ने तुरंत जाकर यह बात सास शारदा जी और ससुर उमाकांत जी को बताई।

उमाकांत जी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वे अपनी पगड़ी और कुल की मर्यादा को लेकर बेहद सख्त इंसान थे। उन्होंने उसी वक्त नंदिनी को बुलाकर जमकर डांट लगाई और उसका फोन छीन लिया। घर के मुख्य दरवाजे पर ताला जड़ दिया गया और पूरे परिवार को सख्त हिदायत दी गई कि नंदिनी की हर हरकत पर चौबीसों घंटे पहरा रखा जाए। इस पूरे हंगामे के बीच दादी जी ने गुस्से में नंदिनी से कह दिया, “अरे कलमुंही, शुक्र मना इस बहू पल्लवी का, जिसने वक्त रहते तेरी बात सुन ली, वरना कल सुबह तक तो हमारी पगड़ी नाली में मिल चुकी होती!”

दादी की यह बात सुनकर नंदिनी के दिल में पल्लवी के प्रति नफरत की आग और भड़क उठी। उसे लगा कि पल्लवी ने उसकी जासूसी की है और उसकी आजादी छीन ली है। उसने पल्लवी को अपनी सबसे बड़ी दुश्मन मान लिया। वह यह समझने को तैयार ही नहीं थी कि पल्लवी ने उसे एक दरिंदे के चंगुल में फंसने से बचाया था।

नंदिनी ने हार नहीं मानी। उसने किसी तरह अपनी सहेली के जरिए रोमित तक संदेश भिजवाया और दो दिन बाद फिर से भागने की साजिश रची।

उस रात घटाटोप अंधेरा छाया हुआ था और बाहर तेज आंधी-तूफान चल रहा था। रात के ठीक डेढ़ बजे थे। पूरा घर गहरी नींद में डूबा था। नंदिनी ने दबे पांव अपने कमरे से एक छोटा सा बैग उठाया और पिछले दरवाजे की ओर बढ़ी। लेकिन उमाकांत जी, जिन्हें नंदिनी की बेचैनी से कुछ अनहोनी का अंदेशा पहले से था, वे जाग रहे थे। जैसे ही नंदिनी ने दरवाजे की कुंडी धीरे से खोली, उमाकांत जी हाथ में छड़ी लिए तूफान की तरह सामने आ गए। उनकी आंखें गुस्से से लाल थीं।

“नंदिनी! तू फिर वही नीच हरकत करने जा रही थी!” उमाकांत जी की दहाड़ से सन्नाटा कांप उठा। उनकी आवाज सुनकर पूरे घर की बत्तियां जल गईं। बड़े भैया आलोक, भाभी नीलिमा, बुआ और शारदा जी सब बदहवास होकर आंगन में दौड़ पड़े।

नंदिनी के चेहरे का रंग उड़ गया, उसका शरीर थर-थर कांपने लगा। उमाकांत जी का गुस्सा बेकाबू हो चुका था। उन्होंने छड़ी ऊपर उठाई और चीखे, “आज मैं अपने हाथों से इस कुलक्षणी का अंत कर दूंगा, जिसने हमारे पूरे खानदान की इज्जत को बाजार में नीलाम करने की ठान ली है!”

उमाकांत जी की छड़ी जैसे ही नंदिनी पर पड़ने वाली थी, पल्लवी हवा की तरह बीच में आई और उसने नंदिनी को अपने पीछे खींचकर खुद छड़ी के आगे अपनी पीठ कर दी। छड़ी पल्लवी के कंधे पर जोर से लगी। दर्द से पल्लवी की चीख निकल गई, पर उसने नंदिनी को मजबूती से अपने आंचल के पीछे छिपाए रखा।

पूरा आंगन स्तब्ध रह गया। उमाकांत जी के हाथ से छड़ी छूटकर नीचे गिर गई। वे हक्के-बक्के रह गए।

“बहू! यह क्या कर रही हो तुम?” उमाकांत जी भारी आवाज में बोले।

पल्लवी ने अपने आंसू दबाते हुए हाथ जोड़े और कांपती आवाज में कहा, “बाबूजी, मुझे क्षमा कर दीजिए! कसूर नंदिनी का नहीं, मेरा है। आज शाम से मेरे पेट में बहुत तेज दर्द और मरोड़ उठ रही थी। घर में कोई दवा नहीं थी। मैंने ही नंदिनी से मिन्नत की थी कि पीछे के रास्ते से जाकर नुक्कड़ वाले चौबे जी के मेडिकल स्टोर से मेरे लिए कोई दर्द की गोली ले आए। नंदिनी तो सिर्फ मेरी बीमारी की वजह से बाहर जा रही थी। अगर सजा देनी है, तो मुझे दीजिए, नंदिनी बिल्कुल बेकसूर है!”

आंगन में सन्नाटा पसर गया। उमाकांत जी ने अविश्वास से पूछा, “दवा? तो तूने देवांश को क्यों नहीं जगाया?”

“देवांश जी आज दिन भर के सफर से थके हुए आए थे और बहुत गहरी नींद में थे, मैं उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी। बाबूजी, मेरी गलती है, आप नंदिनी पर गुस्सा मत कीजिए।” पल्लवी ने पूरी सच्चाई को अपने सिर पर ओढ़ लिया था।

उमाकांत जी का क्रोध पल्लवी की इस बात से शांत हो गया। उन्हें लगा कि शायद वे ही शक के मारे अंधे हो रहे थे। उन्होंने एक गहरी सांस ली, नंदिनी को डांटकर अंदर जाने को कहा और सबको सोने के लिए भेज दिया।

जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए, तो नंदिनी पिछले बरामदे के अंधेरे में दीवार से टिककर फूट-फूटकर रोने लगी। पल्लवी उसके पास आई और बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।

नंदिनी ने झटके से अपना सिर उठाया और पल्लवी के पैरों में गिर पड़ी। उसने पल्लवी के पैरों को अपने आंसुओं से भिगो दिया।

“भाभी! मुझे माफ कर दीजिए भाभी!” नंदिनी सिसकते हुए बोली, “जिस भाभी को मैंने दिन-रात कोसा, जिसके आने पर मैंने तानें मारे, उसी भाभी ने आज अपनी देह पर लाठी खाकर मेरी जान और इस घर की इज्जत बचा ली! अगर आज बाबूजी को सच पता चल जाता, तो वे जीते-जी मर जाते और मुझे भी मार डालते। मैं कितनी अंधी थी भाभी, मैं उस रोमित के झूठे वादों में आकर अपना सब कुछ लुटाने जा रही थी।”

पल्लवी ने झुककर नंदिनी को उठाया और उसे अपनी छाती से भींच लिया। पल्लवी की आंखों से भी ममता के आंसू बह निकले। उसने नंदिनी के आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली, तू इस घर की बेटी है और मेरी छोटी बहन जैसी है। जब कोई अपनी राह से भटकता है, तो उसे धक्का देकर खाई में नहीं गिराया जाता, बल्कि हाथ पकड़कर सही रास्ते पर लाया जाता है। मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं है। बस तू मुझसे एक वादा कर।”

नंदिनी ने हिचकियों के बीच पूछा, “कैसा वादा भाभी?”

“वादा कर कि आज के बाद तू उस लड़के की तरफ मुड़कर भी नहीं देखेगी। अपनी पढ़ाई पूरी करेगी और बाबूजी जहां तेरी शादी तय करेंगे, तू पूरे मान-सम्मान के साथ, अपनी मर्जी और खुशी से वहीं ब्याह करेगी।” पल्लवी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा।

नंदिनी ने पल्लवी के दोनों हाथ चूम लिए और भरे गले से बोली, “मैं अपने भगवान की कसम खाकर वादा करती हूं भाभी, जब आप मेरे लिए इतना बड़ा त्याग कर सकती हैं, अपनी पीठ पर वार सह सकती हैं, तो क्या मैं अपने परिवार के लिए अपनी एक जिद नहीं छोड़ सकती? आज से मैं वही करूंगी जो आप कहेंगी। आज मुझे समझ आया कि असली मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, रक्षा करने वाली भाभी भी मां का ही रूप होती है।”

उस रात के बाद उस घर की तकदीर का पन्ना हमेशा के लिए पलट गया। नंदिनी अब एक पल भी पल्लवी से दूर नहीं रहती थी। वह घर के सारे कामों में पल्लवी का हाथ बंटाती, उसके साथ बैठकर आचार-पापड़ पैक करती और उससे सिलाई सीखती। ननद और भाभी का यह निस्वार्थ प्रेम देखकर बुआ मालती देवी और जेठानी नीलिमा के दिल का मैल भी पूरी तरह धुल गया। वे दोनों भी समझ गईं कि पल्लवी कोई साधारण बहू नहीं, बल्कि इस घर को जोड़ने वाली वह मजबूत कड़ी है जिसके बिना यह परिवार तिनके की तरह बिखर जाता।

समय का पहिया घूमा। पल्लवी के बनाए आचार और पापड़ का काम इतना बढ़ गया कि उसने मोहल्ले की कई अन्य जरूरतमंद औरतों को भी अपने साथ जोड़ लिया। घर की माली हालत अब पूरी तरह सुधर चुकी थी। आलोक भैया और देवांश दोनों के चेहरे पर अब निश्चिंतता की मुस्कान रहती थी।

दो साल बाद, जब नंदिनी की शादी एक बेहद संस्कारी, पढ़े-लिखे और सम्मानित परिवार के लड़के से तय हुई, तो पूरा घर खुशियों के दीपों से जगमगा उठा। मंडप में विदाई के वक्त जब नंदिनी ने अपने माता-पिता के पैर छुए, तो वह सीधे जाकर पल्लवी के गले से लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

ससुर उमाकांत जी ने हाथ जोड़कर पूरी बारात और रिश्तेदारों के सामने कहा, “आज अगर मेरी बेटी की डोली इतने सम्मान और शान से इस चौखट से उठ रही है, तो इसका सारा श्रेय मेरी बड़ी बहू पल्लवी को जाता है। यह इस घर की बहू बनकर नहीं, साक्षात अन्नपूर्णा और लक्ष्मी बनकर आई थी, जिसने अपनी ममता और धैर्य से हमारे इस वीरान घर को सचमुच का स्वर्ग बना दिया।”

देवांश ने अपनी पत्नी पल्लवी की ओर देखा, उसकी आंखों में अपनी अर्धांगिनी के लिए असीम गर्व और प्रेम था। पल्लवी ने अपने आंचल से आंखें पोंछीं और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसकी तपस्या, उसका धैर्य और उसका त्याग आखिरकार सफल हो गया था।

एक औरत चाहे तो अपनी समझदारी, धैर्य और निस्वार्थ प्रेम से नफरत से भरे आंगन को भी खुशियों का उपवन बना सकती है। क्या आपको भी लगता है कि हर टूटते परिवार को बचाने के लिए पल्लवी जैसी समझदार और त्याग की मूरत बहू की जरूरत होती है? अपनी अनमोल राय हमें नीचे लिखकर अवश्य बताएं।

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